वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३७४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २०८ |
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पतिव्रतोपाख्यान
**ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—**विप्रो! इसी बीच यायावर,* शिलोञ्छजीवी स्वाध्यायव्रती तपस्वी ब्राह्मणोंको अपने ऊपरसे जाते देखकर यमराज अत्यन्त उदास हो गये। ब्राह्मणो! इतनेमें ही वहाँ विमानपर सवार होकर अपने पतिदेवके साथ एक परम तेजस्विनी पतिव्रता स्त्री आ गयी। उसके साथमें बहुत-से अनुचर तथा परिकर-परिच्छद भी विराजमान थे। उस प्रियदर्शना देवीके आगमनकालमें नरसिंगे आदि वाद्योंकी विपुल ध्वनि होने लगी। जीवमात्रपर अनुग्रह रखनेवाली उस देवीको धर्मकी पूर्ण जानकारी थी। उसके सारे प्रयासमें धर्मराजका हित भरा था। इस प्रकार साधन-सम्पन्न वह शुभाङ्गना विमानपर बैठे-बैठे ही धर्मराजको तपस्वियोंसे ईर्ष्या न करने तथा उनके प्रति सद्भाव रखनेका परामर्श देकर एवं उनसे पूजित हो आकाशमें अदृश्य हो गयी—जैसे बिजली बादलमें समा जाती है। इस अवसरपर धर्मराजके द्वारा सुपूजित उस स्त्रीको देखकर नारदजीने पूछा—'राजन्! जो आपके द्वारा अर्चित होनेके बाद हितकी बात कहकर पुनः यहाँसे प्रस्थित हो गयी, वह स्त्रियोंमें सर्वोत्तम देवी कौन है? यह तो परम भाग्यशालिनी जान पड़ती है। इसका रूप बड़ा दिव्य है। अनुपम भाग्योंसे शोभा पानेवाले राजन्! मैं इस रहस्यको जानना चाहता हूँ। क्योंकि इससे मेरे मनमें महान् आश्चर्य हो रहा है। अतः इसे संक्षेपमें बतानेकी कृपा करें।'
**धर्मराजने कहा—**देवर्षे! मैंने जिस देवीकी पूजा की है, उसकी कथा परम सुखद है। उसे मैं आपके सामने विस्तारसे स्पष्ट करता हूँ। तात! पूर्व कल्पके सत्ययुगकी बात है—निमि नामसे प्रसिद्ध एक महान् तेजस्वी, सत्यवादी एवं प्रजापालक राजा थे। उनके पुत्र मिथि हुए। केवल पितासे जन्म होनेके कारण जनताने उनका नाम जनक रख दिया। उनकी पत्नीका नाम 'रूपवती' था। वह निरन्तर अपने पतिके हितमें तत्पर रहती थी। पतिकी आज्ञाका पालन करना, उनमें अपार श्रद्धा-भक्ति रखना तथा शुभ कर्मोंमें लगे रहना उसका स्वाभाविक गुण था। स्वामीके वचनानुसार अत्यन्त प्रसन्नताके साथ वह कार्यमें तत्पर रहती थी। महाराज मिथि भी महान् तपस्वी, सत्यके समर्थक तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें ही अपने सारे समयका उपयोग करते थे। वे श्रम एवं धर्मपूर्वक सम्पूर्ण भूमण्डलका पालन करते थे। उनके शासनकालमें रोग, बुढ़ापा और मृत्युकी शक्ति कुण्ठित हो गयी थी। उन परम तेजस्वी नरेशके राष्ट्रमें देवता समयानुसार सदा जल बरसाते थे। उनके राज्यमें कोई भी ऐसा व्यक्ति दृष्टिगोचर नहीं होता था, जो दुःखी, मरणासन्न या व्याधियोंसे ग्रस्त अथवा दरिद्रतासे पीड़ित हो।
विप्रवर! बहुत समय व्यतीत हो जानेके पश्चात् एक दिन उनकी रानीने उनसे नम्रतासे भरी
* 'वृत्त्या वरया यातीति यायावरत्वम्' (बौधायनधर्म-सूत्र ३।१।४, श्रौतसूत्र २४।३१) आदि वचनानुसार शिल आदि श्रेष्ठ वृत्तिसे जीवन-यापन करनेवाले ब्राह्मण 'यायावर' हैं। इस वराह तथा अन्य पुराणोंमें एवं पाणिनि ३।२।१७६, 'काव्यमीमांसा', 'बालरामायण' १।१३, 'भट्टिकाव्य' २।२० आदिमें यह शब्द इसी अर्थमें प्रयुक्त है। पाणि० ३।१।३ के अनुसार इन्हें ही 'शालीन' भी कहते हैं। 'Most probably it reffred to those householders, who like Janaka lived in their home, although following the ascetic dicipline'—'यायावरा ह वै नामर्षय आसंस्तेऽध्वन्य श्राम्यं समस्तमजुहवुः।' (श्रौ०सू०) (Agrawāla Pāṇiṇi P. 387)।