भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३७० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २०४-२०६

करनेवाली वे मनोहारिणी गौएँ कल्पपर्यन्त इसका साथ देंगी। यह पुरुष एक कल्पतक रुद्रके लोकमें रहेगा—इसमें कोई संशय नहीं। इसने अनेक मधुर पदार्थ, सुगन्धित वस्तुएँ तथा रस-दूधसे परिपूर्ण सवत्सा गौ ब्राह्मणोंको दी थीं, जिनके सभी अङ्ग सुवर्णसे सुशोभित थे। इस महान् दानी पुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली पुस्तिका मैंने देखी है। उसमें लिखा है, तीन करोड़ वर्षोंतक यह स्वर्गमें निवास करेगा। तत्पश्चात् ऋषियोंके कुलमें इसका जन्म होगा।'

(किसी अन्य प्राणीके विषयमें) 'इसने सुवर्णका दान किया है। इसको देवताओंके पास भेज देना चाहिये। उनसे आज्ञा पाकर उमापति भगवान् रुद्रके लोकमें यह जाय। यह निश्चय ही महान् तेजस्वी जान पड़ता है। वहाँ जाकर अपनी इच्छाके अनुसार कामनाएँ पूर्ण करे।' (किन्हीं अन्य प्राणियोंको देखकर) 'इन व्यक्तियोंने दान करनेका नियम बना लिया था। अनेक प्रकारके प्राणी इनका अभिवादन करते थे। अतः ये स्वर्गमें जायें।' (किसी औरके प्रति) 'यह परम कुशल पुरुष है। इससे जनताकी आवश्यकता पूरी होती थी। सबके हित-साधनमें यह संलग्न रहता था। सभी कामनाओंको पूरा करनेवाला यह प्राणी सबके लिये आदरका पात्र था। इसने ब्राह्मणोंको पृथ्वी दान की है।' अतः स्वर्गमें जाय और वहीं बहुत दिनोंतक रहे। इसके बाद अपने अनुयायियोंके साथ ब्रह्माजीके लोकमें स्थान पावे। इस श्रेष्ठ मानवकी अनेक प्रकारके इच्छित भोगोंसे सेवा होनी चाहिये। इसका स्थान अक्षय और अजर होगा। महर्षिगण इसका आदर करेंगे।'

(किसी अन्य पुरुषको देखकर) 'यह प्राणी सभीके लिये अतिथिके रूपमें यहाँ आया है। सब इन्द्रियाँ इसके अधीन हैं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंपर कृपा करता था। प्रायः सभीको समानरूपसे अन्न-दान करनेमें इसकी प्रवृत्ति थी। परिवारमें सब भोजन कर लेते थे, तब यह अन्न ग्रहण करता था। मेरे प्रिय भृत्यो! तुम्हें इसको यहाँसे अभी विदा कर देना चाहिये। धर्मराजने ऐसा निर्णय कर दिया है।'

'इस प्राणीने कई कन्याओंका दान किया तथा यज्ञ सम्पन्न किये हैं। अतः इसे दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें सुख भोगनेका सुअवसर प्रदान करो। इसके पश्चात् यह मर्त्यलोक-निवासी किसी उत्तम कुलमें सर्वप्रथम जन्म पायगा। यह दयालु पुरुष दस हजार वर्षोंतक देवताओंके समान सुखपूर्वक स्वर्गमें विराजमान रहे, इसके बाद यह मनुष्यकी योनिमें जन्म पाये और सभी इसका सम्मान करें।' (किसी अन्यके विषयमें) 'यह वही व्यक्ति है, जिसने छाता, जूता और कमण्डलु बार-बार दान किये हैं, इसकी तुमलोग पूजा करो। जिस देशमें हजारों सभा-मण्डप हैं, उस देशमें विद्याधर बनकर यह चार महापद्म वर्षोंतक निरन्तर निवास करे।'

**नचिकेताने कहा—**विप्रो! चित्रगुप्तद्वारा कथित एक अन्य महत्त्वकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनें। वे कहते थे—'गौएँ दिव्य प्राणी हैं। इनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें सभी देवताओंका निवास है। अपने शरीरमें अमृत धारण करना और धरातलपर उसको बाँट देना इनका स्वाभाविक गुण है। ये तीर्थोंमें परम तीर्थ, पवित्र करनेवाले पदार्थोंमें परम पवित्रकर तथा पुष्टिकारकोंमें परम पुष्टिप्रद हैं। इनसे प्राणी शुद्ध हो जाता है। अतएव प्राचीन समयसे 'गौओंके दानकी परम्परा चली आ रही है। इनके दहीसे समस्त देवता, दूधसे भगवान्