भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७१


शंकर, घृतसे अग्निदेव तथा खीरसे पितामह ब्रह्मा तृप्तिका अनुभव करते हैं। इनके पञ्चगव्यके प्राशनसे अश्वमेधयज्ञका पुण्य प्राप्त होता है। गौके दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, खुरके मध्यमें गन्धर्व, खुरोंके अग्रभागमें नागगण, सभी संधियोंमें साध्यगण, आँखोंमें चन्द्रमा एवं सूर्य, ककुद (मौर)-में सभी नक्षत्र, पूँछमें धर्म, अपानमें अखिल तीर्थ, योनिमें गङ्गा नदी तथा अनेक द्वीपोंसे सम्पन्न चारों समुद्र, रोमकूपोंमें ऋषि-समुदाय, गोमयमें पद्मा लक्ष्मी, रोयेंमें समस्त देवतागण तथा इनके चर्म और केशोंमें उत्तर एवं दक्षिण—दोनों अयन निवास करते हैं। इतना ही नहीं, स्थैर्य, धृति, कान्ति, पुष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, लज्जा, वपु, कीर्ति, विद्या, शान्ति, मति और संतति—ये सब गौओंके पीछे चलती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जहाँ गौओंका निवास है, वहीं सारा जगत्, प्रधान देवता, श्री-लक्ष्मी तथा ज्ञान एवं धर्म—ये सभी निवास करते हैं।*' [अध्याय २०४-२०६]

दान-धर्मका महत्त्व

**ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—**विप्रो! नारदजी यद्यपि परम सात्त्विक पुरुष हैं, किंतु उनके मनमें कलह देखनेकी भी रुचि रहती है। इसी प्रकार वे एक बार कौतूहलवश घूमते हुए धर्मराजकी सभामें पधारे, जहाँ उनका राजाने बड़ा स्वागत किया। फिर उन्होंने नारदजीसे कहा—'द्विजवर! आप यहाँ मेरे बड़े सौभाग्यसे पधारे हैं। महामुने! आप सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा गन्धर्व-विद्या एवं इतिहासके पूर्ण ज्ञाता हैं। विभो! आप यहाँ पधारे और हमें दर्शन मिल गया, इससे हम सभी पवित्र हो गये। हमारा अन्तःकरण परम शुद्ध हो गया। मुनिवर! यही नहीं, यह देश भी सब ओरसे पुनीत हो गया। भगवन्! अब आप अपने मनोरथकी बात कहें।' विप्रो! नारदजी धर्मके पूरे मर्मज्ञ हैं। धर्मराजकी उक्त बात सुनकर प्रश्नके रूपमें जो उन्होंने कहा, वह भी एक महान् गूढ़ विषय है। वही मैं तुमसे कहूँगा।

**नारदजी बोले—**भगवन्! आपका शासन धर्मके अनुसार होता है। आप सत्य, तप, शान्ति और धैर्यसे सम्पन्न हैं। सुव्रत! मेरे मनमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है, उसे आप बतानेकी कृपा करें। सुरोत्तम! मेरे संशयका विषय यह है कि 'प्राणी किस व्रत, नियम, दान, धर्म और तपस्या करनेके प्रभावसे अमरत्व प्राप्त करता है तथा उसकी क्या विधि है? बहुत-से महात्मा तो संसारमें अतुलनीय श्री, कीर्ति, महान् फल तथा परम दुर्लभ सनातन पदतक प्राप्त कर


*

दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां तु सरस्वती ।खुरमध्ये तु गन्धर्वाः खुराग्रेषु तु पन्नगाः ॥
सर्वसंधिषु साध्याश्च चन्द्रादित्यौ तु लोचने ।ककुदे तु नक्षत्राणि लाङ्गूले धर्म आश्रितः ॥
अपाने सर्वतीर्थानि प्रस्त्रावे जाह्नवी नदी ।नानाद्वीपसमाकीर्णाश्चत्वारः सागरास्तथा ॥
ऋषयो रोमकूपेषु गोमये पद्मधराणि ।रोमे वसन्ति देवाश्च त्वक्केशेष्वयनद्वयम् ॥
स्थैर्यं धृतिश्च कान्तिश्च पुष्टिर्वृद्धिस्तथैव च ।स्मृतिमैधा तथा लज्जा वपुः कीर्तिस्तथैव च ॥
विद्या शान्तिर्मतिश्चैव संततिः परमा तथा ।गच्छन्तमनुगच्छन्ति होता गावो न संशयः ॥
यत्र गावो जगत्तत्र देवदेवपुरोगमाः ।यत्र गावस्तत्र लक्ष्मीः सांख्यधर्मश्च शाश्वतः ॥

(२०६।२९-३५)

वराहपुराणका यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। ऐसा वर्णन अथर्ववेद ९।४।१—२६, ब्रह्माण्डपुराण, महाभारत १४।१०३।४५-५६, स्कन्दपुराण ५।२।८३।१०४-१२, पद्मपुराण १।४८, भविष्यपुराण ६।१५६।१६-२० आदिमें भी है। विशेष जानकारीके लिये 'कल्याण' का 'गो-अङ्क' देखना चाहिये।