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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३८४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय २१३

नचिकेता कहते हैं—विप्रो! इस प्रकार कहकर मुनिवर नारदने यमलोकसे प्रस्थान किया। वे मुनिवर अपनी इच्छाके अनुसार सर्वत्र विचरनेमें समर्थ हैं। जाते समय आकाश उनके तेजसे प्रकाशित हो गया, मानो वे दूसरे सूर्य हों। धर्मराज धर्मपर विशेष आस्था रखते हैं। मुनिके जानेके बाद उन्होंने फिर बड़ी प्रसन्नतासे मुझे प्रणाम किया और आदर-सत्कारपूर्वक यह प्रिय वचन कहा—'सुव्रत! अब आप भी यहाँसे पधार सकते हैं।' उस समय शक्तिशाली धर्मराजकी अन्तरात्मा प्रसन्नतासे भर चुकी थी। विप्रो! मैंने भी उन धर्मराजकी उत्तम पुरीमें देखी-सुनी अपनी जानकारीकी सभी बातें आपलोगोंको सुना दी।

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! वे सभी ब्राह्मण तपको अपना धन मानते थे। नचिकेताकी इन बातोंको सुनकर उनके मनमें प्रसन्नता छा गयी और उनकी आँखें आश्चर्यसे भर गयी थीं। उनमें कुछ मुनि तथा विप्र ऐसे थे, जिनकी देशान्तर-भ्रमणमें विशेष रुचि थी। ऐसे ही अन्य ब्राह्मण वनमें निवास करनेके विचारसे आये थे। कुछ ब्राह्मण शालीन (यायावर) एवं कपोती वृत्तिके समर्थक थे। कितने ऐसे ब्राह्मण थे, जिनके मुखसे यह शुभ वाणी निकलती रहती थी कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना कल्याणकर है। वे सभी बार-बार नचिकेताको धन्यवाद दे रहे थे। उनमेंसे कुछ ब्राह्मण शिल एवं उञ्छ^* वृत्तिवाले थे, कुछ महान् तेजस्वी ब्राह्मणोंने काष्ठवृत्तिको अपनाया था। सबकी विधियाँ भिन्न-भिन्न थीं। कुछ लोग सदा आत्म-चिन्तनमें व्यस्त रहते थे। कितने विप्रोंने मौनव्रत तथा जलाशय-व्रतको धारण कर लिया था। कुछ लोग ऊपर मुख करके सोते थे तथा कुछ ब्राह्मणोंका मृगके समान इधर-उधर स्वच्छन्द विचरण करनेका नियम था। कितने ब्राह्मण पञ्चाग्नि-व्रती तथा कुछ ब्राह्मण केवल पत्तेके आहारपर रहते थे। कुछ ब्राह्मणोंकी जीवन-यात्रा केवल जल अथवा कितनोंकी वायुपर अवलम्बित थी। कुछ लोग शाक खाकर रहते थे। इनके अतिरिक्त कुछ लोग घोर तपस्वी एवं ज्ञानयोगी थे। उनका यह कथन था कि जन्म लेने और मरनेके अतिरिक्त संसारमें अन्य कुछ बात नहीं है—वे ही बार-बार इसे दुहराते थे। उनके मनमें संसारसे सदा भय बना रहता था। अतः सावधान होकर उक्त नियमोंका सदा पालन करते थे। उद्दालक-कुमार नचिकेतामें भी धर्मकी प्रबलता थी। इन तपस्वी व्यक्तियोंको देखकर उनके मनमें अपार हर्ष हुआ और फिर उनके द्वारा सदा धर्मका चिन्तन होने लगा। मनका विषय अमित वेदार्थ, शुद्धस्वरूप श्रीहरि तथा चिन्मय भगवद्विग्रह रह गया। फिर तो धर्मात्मा नचिकेता सावधान होकर शुद्ध तपस्याके मार्गपर ही आरूढ़ हो गये।

राजन्! इस उत्तम उपाख्यानके प्रभावसे भगवान्‌में श्रद्धा उत्पन्न होती है। इसे जो सुनेगा अथवा सुनायेगा, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जायँगी।

[अध्याय २११-२१२]


गोकर्णेश्वरका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—ऋषियो! प्राचीन समयकी बात है, जब 'तारकामय' नामक घोर देवासुर-संग्राम हुआ था। उस उग्र युद्धमें देवता और दानव—दोनोंकी सेनामें एक-से-एक शूरवीर थे। युद्धके अन्तमें देवताओंने दानवोंकी सेनाको परास्त कर दिया था और इन्द्र फिरसे स्वर्गके सिंहासनपर प्रतिष्ठित हो गये। तीनों लोकोंके चर-अचर प्राणियोंमें सुख-शान्ति व्याप्त हो गयी। उन्हीं दिनों पर्वतराज मेरुके एक सुवर्णमय शिखरपर जिसकी विविध रत्न सब ओरसे शोभा बढ़ा रहे थे और कहीं-कहीं विद्रुममणिकी खान भी थी, एक विशाल कमल दिव्य आसनके रूपमें आस्तृत था। उस आसनपर


^* फसल कटनेके बाद पृथ्वीपरसे अन्न चुनकर जीविका चलाना 'शिल' एवं 'उच्छ' वृत्ति है।