भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय २११-२१२] पाप-नाशके उपायका वर्णन ३८३

मुक्ति—ये दोनों सुलभ हो जाती हैं। मुनिवर! वह भगवान् विष्णुके व्यक्त और अव्यक्त रूपकी मूर्ति है, जो मर्त्यलोकमें आयी है। इसकी उपासना करनेवालेके करोड़ों जन्मोंके अशुभ नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन समयकी बात है—भगवान् श्रीहरि वराहके रूपमें पधारे थे। ऐसे अवसरपर सम्पूर्ण संसारके कल्याणके विचारसे पृथ्वीदेवीने एकादशीको ही हृदयमें रखकर पूछा था।

धरणीने कहा—प्रभो! यह कलियुग प्रायः सभीके लिये भयानक है। इसमें मनुष्य सदा पापमें ही संलग्न रहते हैं। गुरु, ब्राह्मणका धन हड़प लेना और उनका वधतक लोगोंके लिये साधारण-सी बात हो जाती है। भगवन्! कलियुगके लोग गुरु, मित्र और स्वामीके प्रति वैर रखनेमें तत्पर रहते हैं। परायी स्त्रीसे अनुचित सम्बन्ध करनेमें भी वे लोक-परलोकका भय नहीं करते। सुरेश्वर! दूसरेकी सम्पत्तिपर अधिकार जमाना, अभक्ष्य-भक्षण कर लेना तथा देवता एवं ब्राह्मणकी निन्दा करना उनका स्वभाव बन जाता है। प्रायः कलियुगके लोग दाम्भिक एवं मर्यादाहीन होते हैं। कुछ लोग तो अनीश्वरवादीतक बन जाते हैं। इसमें मनुष्य निन्दित दान लेने और अगम्यागमनमें रुचि रखनेवाले होते हैं। विभो! वे ये तथा इनके अतिरिक्त भी अनेक पाप करते हैं, उनका श्रेय कैसे हो?

भगवान् वराहने उत्तर दिया—भगवान् विष्णु-की सर्वोत्कृष्ट शक्तिने कलियुगके नाना प्रकारके घोर पापोंमें रत मनुष्योंके कल्याणके लिये ही एकादशीका रूप धारण किया था। इसलिये सभी मासोंके दोनों पक्षोंकी एकादशीको व्रत करना चाहिये। इससे मुक्ति सुलभ होती है। एकादशीके दिन अन्न नहीं खाना चाहिये। पूर्णरूपसे उपवासकर व्रत रहना चाहिये। यदि विशेष कारणसे पूर्ण उपवास सम्भव न हो तो नक्तव्रत करे। मनुष्यको प्रबोधिनी एकादशीका व्रत तो अवश्य ही करना चाहिये। सोम-मङ्गलवार तथा पूर्व एवं उत्तर-भाद्रपद नक्षत्रोंके योगमें इस एकादशीका महत्त्व करोड़ गुना बढ़ जाता है। उस दिन स्वर्णकी प्रतिमा बनवाकर भगवान् विष्णुकी तथा उनके दस अवतारोंकी भी विधिवत् पूजा करनेका विधान है। प्रबोधिनीकी महिमा हजारों मुखसे नहीं कही जा सकती। हजारों जन्मकी शिवोपासनासे प्राप्त होनेवाली वैष्णवता विश्वमें सर्वाधिक दुर्लभ वस्तु है, अतएव विद्वान् पुरुष प्रयत्नपूर्वक विष्णुभक्त बननेकी चेष्टा करे*। इसके पाठसे दुःस्वप्न एवं सभी भय नष्ट हो जाते हैं।

यमराजने कहा—'मुने! उत्तम व्रतके पालनमें सदा तत्पर रहनेवाली महाभागा धरणीने जब भगवान् वराहकी यह बात सुनी तो वे जगत्प्रभुकी विधिवत् आराधना करके उनमें लीन हो गयीं।'

नारदजी कहते हैं—'धर्मराज! आप सम्पूर्ण धर्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ हैं। आपने जो यह दिव्य कथा कही है, यह धर्मसे ओतप्रोत है। अतः मैं भी आपद्वारा निर्दिष्ट धर्ममार्गकी व्याख्यासे संतुष्ट हो गया। अब मैं यथाशीघ्र उन लोकोंमें जाना चाहता हूँ, जहाँ मेरे मनमें आनन्दकी अनुभूति होती है। महाराज! आपका कल्याण हो।'


दक्षिणावर्तशङ्खेन कृत्वा चैव करे जलम्। शिरसा तद् गृहीत्वा तु विप्रो हृष्टमनाः शुचिः॥
तस्य जन्मकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। प्राक्स्रोतसं नदीं गत्वा नाभिमात्रजले स्थितः॥
स्नात्वा कृष्णतिलैर्मिश्रा दद्यात् सप्ताञ्जलीन्नरः। प्राणायामत्रयं कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः॥
यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। अच्छिद्रपद्मपत्रेण सर्वरत्नोदकेन तु॥
त्रिधा यस्तु नरः स्नायात् सर्वपापैः प्रमुच्यते। (२११।८—११, १३, १८)

* दुर्लभं वैष्णवत्वं हि त्रिषु लोकेषु सुन्दरि। जन्मान्तरसहस्रेषु समाराध्य वृषध्वजम्॥
वैष्णवत्वं लभेत् कश्चित् सर्वपापक्षये सति। (२११।८७-८८)