वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 396, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २१३ ] गोकर्णेश्वरका माहात्म्य [ ३८५
ब्रह्माजी चित्तको एकाग्र करके सुखपूर्वक बैठे थे। एक दिन सनत्कुमारजी वहाँ आये और आते ही उन्होंने पितामहको प्रणाम किया और 'गोकर्ण' के सम्बन्धमें इस प्रकार पूछा।
सनत्कुमारजीने पूछा—भगवन्! तत्त्वके जाननेवाले पुरुषोंमें आप शिरोमणि हैं। महाभाग! मैं आपके श्रीमुखसे ऋषियोंद्वारा कथित पुराण सुनना चाहता हूँ। विभो! उत्तर-गोकर्ण, दक्षिण-गोकर्ण* और शृङ्गेश्वर—ये तीन शिवलिङ्ग परम उत्तम बताये जाते हैं। इनकी कैसे और क्यों प्रतिष्ठा हुई है? भगवान् शंकर मृगका रूप धारण करके वहाँ क्यों विराजते हैं? प्रमुख देवता लोग वहाँ कैसे निवास करते हैं? शंकरके मृगरूप होनेका क्या कारण है? तथा उनके विग्रहकी प्रतिष्ठा किस समय हुई है?
ब्रह्माजी बोले—वत्स! यह पुराण एक रहस्यपूर्ण विषय है। मैंने जैसा सुना है, उसके अनुसार यथार्थ तुम्हें सुनाता हूँ, सुनो। गिरिराज मन्दराचलके परम पवित्र उत्तर भागमें 'मुञ्जवान्' नामसे प्रसिद्ध एक शिखर है, जिसकी शोभाको नन्दन नामक उपवन बढ़ाता रहता है। वहाँके साधारण पत्थर भी हीरा एवं स्फटिकमणिके समान हैं और कुछ (मूँगेके सदृश) लाल बालुकाओंसे सुशोभित हैं, कुछ अन्य शिलाखण्ड नीले और कुछ स्वच्छ भी हैं। वहाँ स्थान-स्थानपर श्रेष्ठ गुफाएँ तथा पानीके झरने हैं। उस पर्वतराजके सभी शिखर विचित्र फूलोंसे भरे हैं। विविध फूल-फलोंसे लदे उस शिखरकी शोभा अत्यन्त मनोमोहक है। वहाँ देवतागण अपनी स्त्रियोंके साथ विहार करते रहते हैं। डालियोंपर कूजनेवाले मतवाले पक्षी उस पर्वत-प्रवरको मुखरित एवं सुशोभित करते रहते हैं। वहाँ उपवनोंमें कहीं कचनार फूले हैं, कहीं हंस और सारस घूम रहे हैं। कहीं विकसित कमलोंवाले तालाब, जिनमें निर्मल जल भरा है, उसकी शोभा बढ़ाते रहते हैं। पशु-पक्षी-नदियोंसे सनाथ और अत्यन्त शोभाशाली उद्यानवाला वह स्थान तपस्याके लिये सर्वथा उपयुक्त है। उसे 'धर्मारण्य' कहते हैं। वहीं भगवान् 'स्थाणु महेश्वर' का स्थान है। वे प्रभु सम्पूर्ण सुरगणोंके गुरु हैं। भक्तोंपर सदा कृपा करनेवाले उन शक्तिशाली प्रभुके साथ गिरिराज-कन्या गौरी निरन्तर विराजती हैं। अपने पार्षदों और स्वामी कार्तिकेयके साथ उनका उस श्रेष्ठ पर्वतपर आसन लगा रहता है। वे देवेश्वर अजन्मा, अविनाशी और परम पूज्य हैं। उनकी सेवा करनेके विचारसे बहुतसे देवता विमानपर चढ़कर वहाँ आते हैं।
त्रेतायुगकी बात है। नन्दी नामसे विख्यात एक महान् मुनि भगवान् शंकरकी आराधना करनेकी अभिलाषासे वहाँ आकर तीव्र एवं कठिन तपस्या करने लगे। वे गरमीके दिनोंमें पञ्चाग्नि तापते और जाड़ेकी ऋतुमें पानीमें खड़ा रहकर तप करते थे। वे बिना किसी अवलम्बके खड़े होकर ऊपर हाथ उठाये तपस्या करते थे। जल, अग्नि और वायु केवल ये ही उनके सहारे थे। अनेक प्रकारके व्रतों और तपोंके नियमको वे पूर्ण करते थे। ब्राह्मणोंमें नन्दीकी बड़ी प्रतिष्ठा थी। वे समय-समयपर जल, फल एवं अन्य उचित उपहारोंसे उन प्रभुकी अर्चना करते रहते थे। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन द्विजवरने उग्र तपस्यासे अपनेपर विजय प्राप्त कर ली थी। अन्ततः भगवान् शंकर उनपर परम प्रसन्न हुए और उन्होंने मुनिवर नन्दीको साक्षात् दर्शन दिया और कहा—'मुने! मैं तुम्हें दिव्य नेत्र प्रदान करता हूँ। वत्स! अबतक तो तुम्हारे लिये मेरा रूप अदृश्य था, किंतु मैं प्रसन्न हो गया हूँ, अतः मेरा यह रूप देखो। संसारमें विद्वान् पुरुष ही मेरे इस अप्रतिम एवं ओजस्वी रूपको देख सकते हैं।'
राजन्! उस समय शंकरजीके श्रीविग्रहसे हजारों
* द्रष्टव्य 'तीर्थाङ्क'-पृ० १०९ तथा पृ० ३११। उत्तर-गोकर्ण भी दो हैं:—नेपालके पशुपतिनाथ तथा 'गोला-गोकर्णनाथ', पर यहाँ 'पशुपतिनाथ' ही अभीष्ट है।