वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८६ ] [ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण ] [ अध्याय २१३
किरणोंवाले सूर्यके समान प्रकाश फैल रहा था। वे प्रभाके पुञ्ज प्रतीत हो रहे थे। जटाएँ उनके सिरकी छवि बढ़ा रही थीं और चन्द्रमा ललाटको सुशोभित कर रहे थे। भगवान् शंकरके दो नेत्र परम प्रकाशमान थे तथा तीसरा नेत्र अग्निके समान धधक रहा था। कमलकी माला उनके पवित्र अङ्गपर विराजमान थी। हाथमें कमण्डलु लिये हुए थे। शरीरपर बाघाम्बर था। सर्पका यज्ञोपवीत धारण किये हुए थे। ऐसे भगवान् महादेवका दर्शन पाते ही महान् तपस्वी नन्दीको रोमाञ्च हो आया।
राजन्! वे प्रभु सनातन परब्रह्म परमात्माके ही रूपान्तर थे। उनका दर्शन प्राप्त होनेपर मुनिवर नन्दीने अञ्जलि बाँध ली और प्रभुकी इस प्रकार स्तुति करने लगे—'जो स्वयं प्रकट होकर जगत्का धारण एवं पोषण करते हैं तथा वर देना जिनका स्वभाव है, उन प्रभुके लिये मेरा नमस्कार है। जो 'त्रिनेत्र', 'शिव', 'शंकर' एवं 'भव' नामसे विख्यात हैं, संसारका संहार एवं पालन भी जिनके ऊपर निर्भर है तथा जो चर्ममय वस्त्र धारण करनेवाले एवं मुनिरूप हैं, उन प्रभुके लिये नमस्कार है। जो नीलकण्ठ, भीम, भूत, भव्य, भव, प्रलम्बभुज, कराल, हरिनेत्र, कपर्दी, विशाल, मुञ्जकेश, धीमान्, शूल, पशुपति, विभु, स्थाणु,गणोंके पति, स्रष्टा, संक्षेप्ता, भीषण, सौम्य, सौम्यतर, त्र्यम्बक, श्मशाननिवास, वरद, कपालमाली एवं 'हरितश्मश्रुधर' अधिनामोंसे सम्बोधित होते हैं, उन भगवान् रुद्रके लिये नमस्कार है। जो भक्तोंको सदा प्रिय हैं, उन परमात्मा शंकरको हमारा बार-बार नमस्कार है।'
इस प्रकार विप्रवर नन्दीने भगवान् रुद्रकी स्तुति की और उनकी सम्यक् प्रकारसे आराधना कर सिर झुकाकर बार-बार नमस्कार किया तथा पुष्पाञ्जलि अर्पित की। भगवान् शंकर ब्राह्मणश्रेष्ठ नन्दीपर संतुष्ट हो गये और उन वरद प्रभुने स्वयं ऋषिसे यह वचन कहा—'विप्रवर! वर माँगो। महामुने! तुम्हारे मनमें जो भी अभिलषित हो, वह सभी मैं देनेके लिये उद्यत हूँ। अतः तुम्हारी जो अभिलाषा हो, वह मुझसे कहो।'
राजन्! जब भगवान् शंकरने उन मुनिवर नन्दीसे इस प्रकार कहा, तब उनका अन्तःकरण प्रसन्नतासे भर गया और उन्होंने भगवान् शंकरसे कहा—'प्रभो! मुझे प्रभुत्व, देवत्व, इन्द्रत्व, ब्रह्मत्व, लोकपालत्व, अपवर्ग, अणिमादि आठों सिद्धियाँ, ऐश्वर्य या गाणपत्य—इनमेंसे एक भी पदार्थ नहीं चाहिये। देवेश्वर! आप कल्याणस्वरूप हैं और अपने भक्तोंका कल्याण करनेमें सदा संलग्न रहते हैं, अतः यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो सुरेश्वर! आप कृपापूर्वक मुझे अपनी भक्ति प्रदान करें। महेश्वर! आपके अतिरिक्त अन्य किसी देवतामें मेरी भक्ति न हो और सम्पूर्ण प्राणियोंको आश्रय देनेवाले आप प्रभुमें ही भक्ति सदा स्थिर रहे—यही मेरी सच्ची हार्दिक अभिलाषा है, जिसके फलस्वरूप मैं आपके लिये सदा तपमें संलग्न रह सकूँ और मेरे इस कार्यमें विघ्न न उपस्थित हो। मैं रात-दिन आपका ही नाम जपता रहूँ, मैं यही चाहता हूँ।'
राजन्! विप्रवर नन्दीकी यह बात सुनकर भगवान् शंकरके मुखपर हँसी छा गयी। वे प्रसन्न होकर मधुर वाणीमें नन्दीसे कहने लगे—'विप्रर्षे! उठो। सुव्रत! तुम्हारी इस तपस्यासे मैं परम प्रसन्न हो गया हूँ। महाभाग! तुमने बड़े शुद्ध चित्तसे भक्तिपूर्वक मेरी आराधना की है। तपोधन! तुम्हारी तपश्चर्यासे मुझे परम संतोष हुआ है। वत्स! तुम मेरी आराधनामें दत्तचित्तसे निरन्तर लगे रहे। रुद्रोंके समक्ष तुमने मेरे लिये तीन करोड़ जप किये हैं। महामुने! पूरे एक हजार वर्षोंतक तुमने तीव्र तपस्या की है। ऐसी तपस्या आजसे पहले किसी भी देवता, दानव अथवा ऋषिने नहीं की है। तुम्हारा किया हुआ यह