वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान [३८७
अत्यन्त कठिन तप महान् आश्चर्यजनक है। इसके प्रभावसे चर और अचर प्राणियोंसे व्याप्त ये तीनों लोक अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे हैं। तुम्हें देखनेके लिये इन्द्रके साथ सभी देवता अभी यहाँ आनेवाले हैं। सुरों और असुरोंके लिये तुम अक्षय, अव्यय तथा अतर्क्य हो। तुम्हारे शरीरसे दिव्य तेज निकल रहा है। अलौकिक आभूषणोंसे अलंकृत होकर तुम परम सुशोभित हो रहे हो। तुममें मुझ-जैसी ही शक्ति आ गयी है। देवता और दानव—ये सभी तुमको अद्वितीय पुरुष मानते हैं। अब तुम मेरे समान रूप धारण करोगे और तुम्हें मुझ-जैसा ही तेज प्राप्त होगा, तुम्हारे तीन नेत्र होंगे। सभी गुणोंकी तुममें प्रधानता रहेगी और देवता तथा दानव तुम्हारी आराधना करेंगे—इसमें कोई संदेह नहीं है। तुम इसी शरीरसे सदा अमर रहोगे। बुढ़ापा और मृत्यु तुम्हारे पास न आ सकेगी। इसको गाणेश्वरीगति कहते हैं। देवताओंके द्वारा भी यह सदाके लिये अलभ्य है। द्विजोत्तम! मेरे पार्षदोंमें तुम्हारा प्रधान स्थान होगा। तुम्हें जनता 'नन्दीश्वर' कहेगी, इसमें कोई संशय नहीं है।
'तपोधन! तुम्हें सात्त्विक ऐश्वर्य या आठों सिद्धियाँ प्राप्त होंगी और तुम मेरे ही एक दूसरे स्वरूप समझे जाओगे। देवता लोग तुम्हें नमस्कार करेंगे। मुनीश्वर! मेरी कृपासे संसारमें तुम स्वामीका पद प्राप्त करोगे। आजसे देवकार्योंमें तुम्हारी सर्वत्र प्रथम पूजा होगी और तुम मेरे पार्षदोंमें प्रधान होगे। मुझसे प्रसन्नता प्राप्त करनेवाले सभी मानव भलीभाँति तुम्हारी ही अर्चना करेंगे। तुम मेरे गण बनो, मेरे द्वारपालपदपर प्रतिष्ठित हो जाओ और विषम समयमें मेरे शरीरकी रक्षा करते रहो। तीनों लोकोंमें वज्र, दण्ड, चक्र अथवा अग्नि—इनमेंसे किसीसे भी तुम्हें कोई बाधा न होगी; देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, पन्नग, राक्षस तथा जो मेरे भक्त पुरुष हैं, वे सभी तुम्हारा आश्रय ग्रहण करेंगे। अब तुम्हारे संतुष्ट होनेपर मैं संतुष्ट हो जाऊँगा और तुम्हारे कुपित होनेपर मेरे मनमें भी क्रोधका आविर्भाव हो जायगा। द्विजवर! अधिक क्या, तुमसे बढ़कर विश्वमें मेरा दूसरा कोई प्रिय है ही नहीं।'
इस प्रकार द्विजवर नन्दीको वर देकर उमापति भगवान् शंकरने प्रसन्नतापूर्वक स्वयं आकाशको गुँजानेवाली मधुर वाणीमें स्पष्टरूपसे कहा— 'विप्रवर! तुम्हारा कल्याण हो। अब तुम कृतकृत्य हो गये। मरुद्गणोंके साथ समस्त देवता तुम्हारा दर्शन करनेके लिये यहाँ आ रहे हैं—ऐसा जान लो। वत्स! वह सभी सुरसमुदाय यहाँ आकर जबतक मुझे देख नहीं लेता, इसके पूर्व ही मैं यहाँसे अन्यत्र चला जाना चाहता हूँ।'
बस, इतनी बात कहकर भगवान् शंकर वहीं अन्तर्हित हो गये। [अध्याय २१३]
गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान
**ब्रह्माजी कहते हैं—**सनत्कुमार! जब इस प्रकार कहकर भूतभावन भगवान् शंकर वहाँ अन्तर्धान हो गये तो उसी क्षण गणोंके अध्यक्ष नन्दीका शरीर परम दिव्य हो गया। वे चार भुजाओं और तीन नेत्रोंसे सम्पन्न होकर एक दिव्य स्थानपर बैठ गये। उनके विग्रहका वर्ण भी दिव्य हो गया और उससे दिव्य अगुरुकी सुगन्ध फैलने लगी। त्रिशूल, परिघ, दण्ड और पिनाक उनके हाथोंमें सुशोभित होने लगे तथा मूँजकी मेखला कमरकी शोभा बढ़ाने लगी। अपने तेजसे