वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २१४
वे ऐसे प्रतीत होने लगे, मानो दूसरे शंकर ही विराजमान हों। फिर भगवान् वामनकी भाँति उद्यत होकर उन्होंने अपना पैर ऐसे आगे बढ़ाया, मानो वे द्विजवर तीन डगोंसे पृथ्वीको नापनेका विचार कर रहे हों। उन्हें देखकर आकाशमें विचरनेवाले सम्पूर्ण देवताओंका मन आशङ्कित हो गया। उनके आश्चर्यकी सीमा नहीं रही। अतः इन्द्रको इसकी सूचना देनेके लिये वे स्वर्गकी ओर चल पड़े। देवताओंके द्वारा यह वृत्तान्त सुनकर इन्द्र तथा अन्य उपस्थित लोकपालोंको बड़ा विषाद हुआ। उनके मनमें चिन्ता व्याप्त हो गयी। उन सभीने सोचा, यह कोई ऐसा व्यक्ति है, जिसने उमाकान्त भगवान् शंकरसे वर प्राप्त कर लिया है। अतः इसमें अपार शक्ति आ गयी है। अब यह श्रीमान् पुरुष तीनों लोकोंपर अवश्य ही विजय प्राप्त कर लेगा। इसमें जैसा उत्साह, तेज और बल प्रतीत होता है, इससे सिद्ध होता है कि यह अवश्य कोई महान् पराक्रमी पुरुष ही है। यह तो देवताओंके मुख्य स्थानको भी छीन सकता है, अतः अपने तेजके प्रभावसे जबतक यह स्वर्गलोकमें नहीं आ जाता है, इसके पूर्व ही हमलोग वर देनेमें कुशल भगवान् महेश्वरको प्रसन्न करनेमें संलग्न हो जायें।
मुने! इस प्रकार परस्पर वार्तालाप करके वे सभी श्रेष्ठ देवता मेरे साथ 'मुञ्जवान्-पर्वत' के शिखरपर आ गये। वहाँ जगत्के आश्रयदाता, अपार शक्तिवाले भगवान् श्रीहरिने अपने लिये स्थान बना रखा था। जब श्रीहरिको ज्ञात हुआ कि सुरसमुदाय आ रहा है तो वे दौड़कर आगे आ गये। कारण, सबके हृदयकी बात उन्हें विदित थी। अब उनकी कृपासे देवताओं और मुनियोंकी सभी बातें स्पष्ट हो गयीं। तब स्वयं भगवान् विष्णु, देवताओंके साथ मेरी तुलना करनेवाले नन्दीके पास पहुँच गये।
नन्दीने कहा—'ओह! आज मेरा जीवन सफल हो गया। मैंने जितना परिश्रम किया है, वह आज सब सफल हो गया; क्योंकि देवताओंके अध्यक्ष इन्द्र तथा सम्पूर्ण संसारके शासक श्रीहरिके दर्शनका आज मुझे परम श्रेष्ठ सौभाग्य प्राप्त हो गया है। आज मेरे जीवनकी साध पूरी हो गयी और मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हो गये। पापोंका संहार करनेवाले भगवान् शिव शान्तस्वरूप हैं। उनकी प्रसन्नता तो मुझे प्राप्त हो ही चुकी है। उन्होंने वर देकर मुझे अपना पार्षद बना ही लिया है। मुझपर उनकी असीम कृपा है। निश्चय ही अब मेरे सारे कल्मष दूर हो गये। भगवान् शंकर बड़े महात्मा पुरुष हैं। उन्होंने देवताओंके विषयमें मेरे सामने जो बात कही है, वह परम हितकर एवं सत्य सिद्ध हो गयी। उसमें कुछ भी अन्यथा नहीं रहा। उन्होंने मुझसे स्पष्ट कहा था कि 'प्रिय नन्दिन्! देवर्षिलोग तुमपर प्रसन्न होकर तुम्हें देखने यहाँ पधार रहे हैं। आज परमेष्ठीद्वारा भी मैं आदर प्राप्त कर चुका। इससे मेरे हृदयमें अपार आनन्द भर गया है।'
देवताओंने कहा—'विप्रवर! नन्दिन्! हमलोग भी उन वरदायी भगवान् शंकरका दर्शन करना चाहते हैं। तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट होकर जिन प्रभुने तुम्हें साक्षात् दर्शन दिया है, उन्हींका अवलोकन हमें भी अभीष्ट है।' इतनी बात कहनेके पश्चात् देवताओंने द्विजवर नन्दीसे पुनः पूछा—'कपाल धारण करनेवाले महाभाग महेश्वरका दर्शन हमलोग किस स्थानपर प्राप्त कर सकेंगे?'
नन्दीने कहा—'वे प्रभु तो मुझपर कृपा करके वहीं अन्तर्धान हो गये। अब मैं नहीं