वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २१४] गोकर्णमाहात्म्य और नन्दिकेश्वरको वर-प्रदान ३८९
जानता हूँ कि वे कहाँ विराज रहे हैं। अतः वे जहाँ हों, आप सभी देवता स्वयं ही अन्वेषण कर लें।'
सनत्कुमारजीने पूछा—'भगवान्! महाभाग शंकरने नन्दीसे क्या कहा था, जिससे उन्होंने उनका पता नहीं बताया? देवेश! आप यह बात मुझे बतानेकी कृपा करें। प्रभो! भगवान् शंकरकी तो कोई भी बात गोपनीय नहीं है?'
ब्रह्माजी कहते हैं—'वत्स! शंकरने जो बातें कही हैं, उन्हें देवताओंके सामने स्पष्ट करना मेरे लिये भी उचित नहीं है। पर उन्होंने नन्दीसे जो बात कही थी, वह मैं तुम्हें बताता हूँ, सुनो। भगवान् शंकरजीने कहा था—'विप्रवर! हिमालयके उस पार पृथ्वीपर संकटगिरि नामसे विख्यात एक सिद्ध स्थान है, जिसकी अनेक वन, उपवन शोभा बढ़ाते हैं। वहाँ 'श्लेष्मातक' नामका एक श्रेष्ठ सर्प निवास करता है। उसने तीव्र तपस्या की है, जिससे उसके सभी पाप भस्म हो गये हैं। इस समय उसपर अनुग्रह करना मेरे लिये अत्यन्त आवश्यक है। वहाँ एक बहुत सुन्दर आश्रम है। वहीं निर्जन स्थानमें वह रहता है। उस दिव्य स्थानमें रहते हुए उसके बहुत-से वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पवित्र पर्वतके ऊँचे शिखरपर वह स्थान है। श्लेष्मातक सर्पका निवास होनेके कारण उसीके नामसे 'श्लेष्मातकवन' उसकी संज्ञा हो गयी है। एक समयकी बात है—मैं मृगका रूप धारणकर वहाँ विचर रहा था। मैंने देखा, देवतालोग मुझे पकड़नेके लिये प्रयास कर रहे हैं। मैं झट वहीं छिप गया। वे मुझे खोजनेमें व्यस्त हो गये। वत्स! तुम्हें यह प्रसङ्ग उन देवताओं और अप्सराओंको भी नहीं बताना चाहिये। मैंने उसे अनेक वर दिये, फिर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया।'
(सनत्कुमारके प्रति ब्रह्माजीका कथन है—)
जिस समय नन्दीको वर देकर भगवान् शंकर अन्तर्धान हो गये, उस समय उनके तेजसे सभी दिशाएँ जगमगा उठी थीं। उनके पास अनेक देवता आ गये थे। उनका दिव्य शरीर द्वितीयाके चन्द्रमाकी भाँति पूजनीय बन गयी। मरुद्गणोंको साथ लेकर इन्द्र मनोगामी (इच्छानुसार चलनेवाले) रथपर बैठे और वहाँ आ गये। उनके वहाँ पहुँचते ही पर्वत-भाग तेजसे चमचमाने लगे। विविध जलचर जीवोंके स्वामी वरुण वर देनेके विचारसे अपने गणोंको साथ लेकर वहाँ आये। उनका अत्यन्त तेजस्वी विमान वज्र एवं स्फटिकमणिके समान चमक रहा था। उस पर्वतके शिखरपर धनके स्वामी कुबेरका भी आगमन हो गया। उनका विचित्र रथ तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित था। धनाध्यक्षके साथ बहुत-से यक्ष एवं राक्षस भी आये थे। सूर्यके समान प्रकाशमान करोड़ों विमानोंसे वे आये थे। उन विमानोंकी शोभा अलौकिक थी। अपने उत्तम पुण्योंसे सुशोभित कुबेर ऐसे जान पड़ते थे, मानो दूसरे सूर्य हों। सूर्य-चन्द्रमा तथा समस्त ग्रहमण्डल एवं नक्षत्रसमूह अग्निके समान तेजस्वी विमानोंपर चढ़कर आकाशसे धरातलपर उतर आये। ग्यारह रुद्रों और बारह सूर्योंका भी वहाँ आगमन हो गया। दोनों अश्विनीकुमार उस महान् मुञ्जवान्पर्वतपर पधारे। विश्वेदेव, साध्यगण और तपस्वी बृहस्पति भी आये। विशाख नामसे विख्यात स्वामी कार्तिकेय तथा भगवान् विघ्नविनायक भी उस श्रेष्ठ पर्वतपर पधारे। वहाँ सैकड़ों मोर बोल रहे थे। नारद, तुम्बुरु, विश्वावसु, परावसु, हाहा-हूहू तथा अन्य भी अनेक प्रसिद्ध गन्धर्व इन्द्रकी आज्ञाके अनुसार