वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३९० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २१४
विविध प्रकारके विमानोंद्वारा वहाँ आ गये। पवन-अग्नि, धर्म-सत्य, ध्रुव तथा देवर्षि, सिद्ध, यक्ष, विद्याधर एवं गुह्यकोंका समुदाय भी वहाँ पहुँच गया। कई महान् आदरणीय ऋषि भी आये। गन्धकाली, घृताची, बुद्धा, गौरी, तिलोत्तमा, उर्वशी, मेनका, रम्भा, पुञ्जिकस्थला तथा ऐसी अन्य भी बहुत-सी अप्सराएँ उस मुञ्जवान् पर्वतपर आयीं। पुलस्त्य, अत्रि, मरीचि, वसिष्ठ, भृगु, कश्यप, पुलह, विश्वामित्र, गौतम, भारद्वाज, अग्निवेश्य, वृद्ध पराशर, मार्कण्डेय, अङ्गिरा, गर्ग, संवर्त, क्रतु, जमदग्नि, भार्गव और च्यवन—ये सभी महर्षि विष्णुकी तथा स्वर्गाध्यक्ष शक्रकी आज्ञासे वहाँ सामूहिक रूपसे आये थे।
स्त्री-पुरुषका रूप धारण करके सिन्धु, महानदी सरयू, ताम्रारुणा, चारुभागा, वितस्ता, कौशिकी, पुण्या, सरस्वती, कोका, नर्मदा, बाहुदा, शतद्रू, विपाशा, गण्डकी, सरिद्वरा, गोदावरी, वेणी, तापी, करतोया, सीता, चीरवती, नन्दा, चन्दना, चर्मण्वती, पर्णाशा, देविका, प्रभास, सोम, लौहित्य तथा गङ्गासागर एवं अन्य भी जितने अनेक पुण्य तीर्थ थे, वे सब भी उस समय वहाँ पृथ्वीपर पधारे। इन्द्रकी आज्ञासे मुञ्जवान् नामक उस उत्तम पर्वतपर सबका आगमन हो गया। पर्वतोंमें उत्तम महामेरु, कैलास, गन्धमादन, हिमवान्, हेमकूट, निषध, पर्वतप्रवर विन्ध्याचल, महेन्द्र, सह्य, मलयगिरि, दर्दुर, माल्यवान्, चित्रकूट, अत्यन्त ऊँचा द्रोणाचल, श्रीपर्वत, लताओंसे परिपूर्ण पर्वतराज पारियात्र—ये सभी पर्वतोंमें उत्तम माने जाते हैं। इन सबका तथा अनेक अरण्योंका भी वहाँ आगमन हो गया। सम्पूर्ण यज्ञ, समस्त विद्याएँ, चारों वेद, धर्म, सत्य, दम, स्वर्ग, महान् ऋषि कपिल, महाभाग वासुकि, सर्पराज, अमृताशी, हजारों फणोंसे प्रकाशमान अनन्त शेषनाग, धृतराष्ट्र, सर्पोंके राजा किर्मीर, श्रीमान् अम्भोधर, महान् तेजस्वी नागराज तथा सर्पोंके अध्यक्ष, अरबों एवं खरबों सर्प वहाँ आये। विद्युज्जिह्व, द्विजिह्वेन्द्र, शङ्खवर्चा, महाद्युति, तीनों लोकोंमें विख्यात धीमान् अनिमिषेश्वर, विरोचनकुमार सत्य, स्फोटमणि, सतैचीत, पर्वतकी भाँति अचल रहनेवाले तथा सैकड़ों फणोंसे युक्त शृंग, अरिमेजयके साथ सर्पराज प्रज्ञावान् नागराज विनत, भूरि, कम्बल और अश्वतर, सर्पोंके राजा पराक्रमी एकापत्र, नागोंके अध्यक्ष कर्कोटक एवं धनंजय—इस प्रकारके महान् पराक्रमी अनेकों भुजगेन्द्र मुञ्जवान् पर्वतपर आये। दिन-रात, पक्ष-मास, संवत्सर, आकाश, पृथ्वी, दिशाएँ और विदिशाएँ वहाँ आयीं। उस समय आये हुए देवताओं, यक्षों और सिद्धोंसे उस मुञ्जवान् पर्वतका शिखर इस प्रकार भर गया, जैसे प्रलयकालमें समुद्रका किनारा जलसे परिपूर्ण हो जाता है। जब उस पर्वतराज मुञ्जवान्के सुरम्य शिखरपर देवताओंका समाज जुट गया तो वायुसे प्रेरित होकर वृक्षोंने उनपर फूलोंकी वृष्टि आरम्भ कर दी। उस समय दिव्य गन्धर्वोंने उत्तम संगीत, अप्सराओंने प्रशंसनीय नृत्य और पक्षियोंने प्रसन्न होकर मधुर स्वरसे सुन्दर शब्द करना प्रारम्भ कर दिया। पवन पुण्य गन्धोंको लेकर प्रवाहित होने लगे। उसके स्पर्शसे सबका मन मुग्ध हो जाता था। इस प्रकार भगवान् विष्णुको आगे कर सभी देवता वहाँ उपस्थित हुए और देखा कि नन्दी सामने विराजमान हैं तथा दिव्य आभासे उनकी मूर्ति विद्योतित हो रही है। अब वहाँ आये हुए गन्धर्वों और अप्सराओंके गणोंपर नन्दीकी भी दृष्टि पड़ी। उन्होंने देखा कि अन्य सभी देवता तथा देवराज इन्द्र भी एक साथ ही वहाँ पधारे हैं। फिर तो नन्दी सावधान हो गये और उन्होंने हाथ जोड़ तथा मस्तक झुकाकर उन्हें