भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१२०- उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन

अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५३

गये थे, उसने वीणा उठायी और भक्ति-गीत गाते हुए भ्रमण करना प्रारम्भ किया। इसी बीच उसे एक ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया। चण्डाल बेचारा निर्बल था और ब्रह्मराक्षस अत्यन्त बली, अतः वह अपनेको उससे छुड़ा न सका और दुःख एवं शोकसे व्याकुल होकर वह निश्चेष्ट-सा हो गया। फिर उस ब्रह्मराक्षससे कहने लगा— 'अरे! मुझसे तुम्हारा क्या अभीष्ट सिद्ध होनेवाला है, जो तुम इस प्रकार मुझपर चढ़ बैठे हो?' उसकी यह बात सुनकर मनुष्योंके मांसके लोभी ब्रह्मराक्षसने चण्डालसे कहा—'आज दस रातोंसे मुझे कोई भोजन नहीं मिला है। ब्रह्माने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेज दिया है। आज मैं मज्जा, मांस और रक्तोंसे भरे-पूरे तेरे शरीरका भक्षण करूँगा। इससे मेरी तृप्ति हो जायगी।'

वसुंधरे! चण्डाल मेरे गुणगानके लिये लालायित था। उस व्यक्तिने ब्रह्मराक्षससे प्रार्थना की—'महाभाग! मैं तुम्हारी बात मानता हूँ। ब्रह्माने तुम्हारे खानेके लिये ही मुझे भेजा है, परंतु परम प्रभुकी भक्तिसे सम्पन्न होकर इस जागरणमें मैं देवाधिदेव जगदीश्वरके पद्यगानके लिये समुत्सुक हूँ। अतः वनमें उनके आवासस्थलके पास जाकर संगीत सुनाकर मैं लौट आऊँ, तब तुम मुझे खा लेना परंतु इस समय मुझे जाने दो, क्योंकि मैंने यह व्रत धारण कर रखा है कि निशीथ (आधी रात)-में भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न करनेके लिये भक्तिसंगीत सुनाया करूँगा। व्रत पूरा होनेपर तुम मुझे खा लेना। इसपर क्षुधार्त ब्रह्मराक्षस कठोर शब्दोंमें बोला—'"अरे मूर्ख! क्यों ऐसी झूठी बात बनाता है? तू कहता है कि 'तुम्हारे पास फिर मैं आऊँगा'। भला ऐसा कौन मनुष्य है, जो मृत्युके मुखमें पहुँचकर फिर जीवित लौट जाय? तुम ब्रह्मराक्षसके मुखमें पड़कर भी फिर जानेकी इच्छा करते हो?' चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं यद्यपि पहलेके निन्दित कर्मोंके प्रभावसे इस समय चण्डाल बना हूँ, किंतु मेरे अन्तःकरणमें धर्म स्थित है। तुम मेरी प्रतिज्ञा सुनो, मैं धर्मानुसार पुनः निश्चित आऊँगा। ब्रह्मराक्षस! अपने जागरणव्रतको पूराकर मैं लौटकर यहाँ अवश्य आऊँगा। देखो, सम्पूर्ण जगत् सत्यके आधारपर ही टिका है। अन्य सब लोक भी सत्यपर ही आधृत हैं। ब्रह्मवादी ऋषियोंने सत्यके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। कन्या सत्यप्रतिज्ञापूर्वक ही दान की जाती है। ब्राह्मणलोग भी सदा सत्य ही बोलते हैं। राजालोग सत्य-भाषण करनेके प्रभावसे ही तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करते हैं^१। स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति भी सत्यके प्रभावसे ही सुलभ होती है। सूर्य भी सत्यके प्रतापसे ही तपते हैं और चन्द्रमा भी सत्यके ही प्रभावसे जगत्‌को रञ्जित—आनन्दित करते हैं।^२ मैं सत्यतापूर्वक प्रतिज्ञा करता हूँ कि 'यदि मैं लौटकर तुम्हारे पास फिर न आऊँ तो षष्ठी, अष्टमी, अमावास्या, दोनों पक्षकी चतुर्दशी—इन तिथियोंमें जो स्नातक नहीं करता, उसकी जो दुर्गति होती है, वह गति मुझे प्राप्त हो। जो व्यक्ति अज्ञान तथा मोहमें पड़कर गुरु और राजाकी पत्नीके साथ गमन करता है, उसे जो गति मिलती है, वही गति यदि मैं फिर न लौटूँ तो मुझे प्राप्त हो। मिथ्या यज्ञ करनेवाले पुरुषोंको तथा मिथ्या भाषण करनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति यदि मैं पुनः न आ सकूँ तो मुझे प्राप्त हो। ब्राह्मणका वध करनेपर, मदिरा-पान, चोरी और


१. सत्यमूलं जगत्सर्वं लोकाः सत्ये प्रतिष्ठिताः। सत्येन दीयते कन्या सत्यं जल्पन्ति ब्राह्मणाः॥
सत्यं जयन्ति राजानस्त्रीण्येतान्यब्रुवन्नृतम्। (वराहपु० १३९।५०-५१)
२. सत्येन गम्यते स्वर्गो मोक्षः सत्येन चाप्यते। सत्येन तपते सूर्यः सोमः सत्येन रज्यते। (वराहपु० १३९।५३)

१२१- मन्दारकी महिमाका निरूपण

२५४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३१

व्रतभङ्ग करनेपर मनुष्यको जो गति प्राप्त होती है, यदि मैं पुनः न लौटूँ तो वह मुझे प्राप्त हो।'

देवि! उस समय चण्डालकी बात सुनकर वह ब्रह्मराक्षस प्रसन्न हो गया। अतः वह मधुर वाणीमें कहने लगा—'अच्छा, तुम जाओ, नमस्कार।' इस प्रकार अपने निश्चयमें अडिग चण्डाल ब्रह्मराक्षससे ऐसा कहकर मेरे संगीतमें तल्लीन हो गया। उसके नाचते-गाते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर जब वह ब्रह्मराक्षसके पास वापस चला तो इतनेमें कोई पुरुष उसके सामने आकर खड़ा हो गया और उसने उससे कहा—'साधो! तुम इतनी शीघ्रतासे कहाँ चले जा रहे हो? तुम्हें उस ब्रह्मराक्षसके पास कदापि नहीं जाना चाहिये। वह ब्रह्मराक्षस तो शवतकको खा जाता है; अतः तुम्हें वहाँ प्रत्यक्ष मृत्युमुखमें नहीं जाना चाहिये।'

चण्डालने कहा—'पहले जब मुझे ब्रह्मराक्षस खानेको तैयार था, तब मैंने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं वापस आ जाऊँगा। सत्यका पालन करना परम आवश्यक है।' इसपर उस पुरुषने उसके हितकी इच्छासे कहा—'चण्डाल! वहाँ मत जाओ; क्योंकि जीवनकी रक्षाके लिये सत्यत्यागका दोष नहीं होता।' किंतु चण्डाल अपने व्रतमें अटल था। अतः वह मधुर वाणीमें बोला—'मित्र! तुम जो कह रहे हो, वह मुझे अभीष्ट नहीं है। मुझसे सत्यका त्याग नहीं हो सकता; क्योंकि मेरा व्रत अचल है। जगत्की जड़ सत्य है और सत्यपर ही यह सारा संसार टिका है। सत्य ही परम धर्म है। परमात्मा भी सत्यपर ही प्रतिष्ठित है; अतः मैं किसी प्रकार भी असत्यका आचरण नहीं करूँगा।' इस प्रकार कहकर वह चण्डाल ब्रह्मराक्षसके पास चला गया और उसका सम्मान करते हुए बोला—'महाभाग! मैं आ गया हूँ। अब मुझे भक्षण करनेमें तुम विलम्ब न करो। तुम्हारी कृपासे अब मैं भगवान् विष्णुके उत्तम स्थानको जाऊँगा। अब तुम अपनी इच्छाके अनुसार मेरे शरीरके इन अङ्गोंको खा सकते हो।

अब वह ब्रह्मराक्षस मधुर वाणीमें कहने लगा—'साधु वत्स! साधु! मैं तुमसे संतुष्ट हो गया, क्योंकि तुमने सत्य-धर्मका भलीभाँति पालन किया है। चण्डालोंको प्रायः किसी धर्मका ज्ञान नहीं होता, पर तुम्हारी बुद्धि पवित्र है।'

'भद्र! यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो विष्णु-मन्दिरके पास जाकर गत रातमें तुमने जो गान किया है, उसका फल मुझे दे दो, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, न तो खाऊँगा और न डराऊँगा।' ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! तुम्हारे इस वाक्यका क्या अभिप्राय है? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले 'मैं खाना चाहता हूँ'—'यह कहकर अब तुम भगवद्गुणानुवादका पुण्य क्यों चाहते हो?' चण्डालकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षस बोला—'बस, तुम अपने एक पहरके गीतका ही पुण्य मुझे दे दो। फिर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा और स्त्री-पुत्रके साथ तुम जीवित रह सकोगे।' पर उस चण्डालको गीतके पुण्यका लोभ था। अतः वह बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं संगीतका फल नहीं दे सकता। तुम अपने नियमके अनुसार मुझे खा जाओ और मनोऽभिलषित रुधिरका पान कर लो।' अब वह ब्रह्मराक्षस कहने लगा, 'तात! तुमने जो विष्णुके मन्दिरमें गायन-कार्य किये हैं, उनमेंसे केवल एक गीतका ही फल मुझे देनेकी कृपा करो। तुम्हारे इस एक गीतके फलसे ही मैं तर सकता हूँ और अपने परिवारको भी तार सकता हूँ।' इसपर चण्डालने उसे सान्त्वना देते हुए, आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा—'ब्रह्मराक्षस! तुमने कौन-सा विकृत कर्म किया है, जिस दोषसे

अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५५


तुम्हें ब्रह्मराक्षस होना पड़ा है। तुम मुझे बताओ।'

ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं पूर्वजन्ममें चरकगोत्रीय सोमशर्मा नामका एक यायावर ब्राह्मण था। मुझे यद्यपि वेदके सूत्र और मन्त्र कुछ भी ठीक-ठीक ज्ञात न थे, फिर भी यज्ञादि कर्म करानेमें लगा रहता था। लोभ और मोहसे आकृष्ट होकर फिर मैं मूर्खोँका पौरोहित्य करने लगा—उनके यज्ञ, हवन आदिका कार्य कराने लगा। एक समयकी बात है कि जब मैं संयोगवश एक 'पाञ्चरात्र' संज्ञक यज्ञ करा रहा था कि इतनेमें ही मुझे उदरशूल उत्पन्न हुआ और मेरे प्राण निकल गये। उसकी पूर्णाहुति नहीं हुई। अतः मेरी यह स्थिति हुई है। उस दूषित कर्मके प्रभावसे ही मैं ब्रह्मराक्षस हो गया। मैंने उस यज्ञमें मन्त्रहीन, स्वरहीन और नियमविरुद्ध प्राग्वंश* आदिकी स्थापना की थी, हवन भी अविधिपूर्वक ही कराया। उसी कर्म-दोषके परिणामस्वरूप मुझे यह राक्षसी योनि प्राप्त हुई है। अब तुम अपने गीतका फल देकर मेरा उद्धार करो। विष्णुगीतके पुण्यद्वारा अब मुझ अधमको शीघ्र ही इस पापसे मुक्त कर दो।'

देवि! वह चण्डाल एक उत्तमव्रती व्यक्ति था। उसने ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर उसके वचनोंका सहर्ष अनुमोदन किया, साथ ही बोला—'राक्षस! यदि मेरे गीतके फलसे तुम शुद्धमना एवं क्लेशमुक्त हो सकते हो तो लो, मैंने अत्यन्त सुन्दर स्वरोंसे जो सर्वोत्कृष्ट गान किया है, उसीका फल मैं तुम्हें प्रदान करता हूँ। जो पुरुष श्रीहरिके सामने इस भक्ति-संगीतका गान करता है, वह लोगोंको अत्यन्त कठिन परिस्थितियोंसे भी तार देता है।' ऐसा कहकर उस चण्डालने उस गीतका फल ब्रह्मराक्षसको दे दिया। भद्रे! फलतः वह ब्रह्मराक्षस तत्काल एक दिव्य पुरुषके रूपमें परिवर्तित हो गया। ऐसा जान पड़ता था, मानो वह शरद्-ऋतुका चन्द्रमा हो। मेरे गुणयुक्त गीतोंका फल अनन्त है। देवि! यह मैंने भक्ति-संगीतके गायनके श्रेष्ठ फलका वर्णन कर दिया, जिस गीतके एक शब्दके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरसे तर जाता है।

अब जो वाद्यका फल होता है, उसे बताता हूँ, इसकी सहायतासे वसिष्ठने देवताओंसे शबला गौको प्राप्त किया था। (शम्पा) झाँप और ताल अथवा इनके संयोग-प्रयोगसे मनुष्य नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक कुबेरके भवनमें जाकर इच्छानुसार आनन्दका उपभोग करता है। फिर वहाँसे अवकाश मिलनेपर झाँप और तालोंसे सम्पन्न होकर स्वतन्त्रतापूर्वक मेरे लोकोंमें पहुँच जाता है। अब जो मनुष्य मेरी आराधनाके समय नृत्य करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। इसके फलस्वरूप वह संसार-बन्धनको काटकर मेरे लोकको प्राप्त करता है।

जो मानव जागरण करके गीत और वाद्यके साथ मेरे सामने नृत्य करता है, वह जम्बूद्वीपमें जन्म पाकर, राजाओंका भी राजा होता है और सम्पूर्ण धर्मोंसे सम्पन्न होकर वह सम्पूर्ण पृथ्वीका रक्षक होता है। मेरा भक्त मुझे पुष्प और उपहार अर्पणकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। वसुंधरे! जो सत्कर्मके पथपर पैर रखकर मेरी उपासना करता है तथा जो पुष्पोंको लाकर मेरे ऊपर चढ़ाता है, वह महान् उत्तम कर्मका सम्पादन कर लेता है, अतः वह मेरे लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। वसुंधरे! जो मनुष्य प्रातःकाल


* 'प्राग्वंशशाला'—यह वेदीके पूर्व ओरमें बनी हुई पत्नी-शाला है, जिसमें घरके स्त्री, बच्चे आदि बैठते हैं। भागवत (४।५।१४)-की टीकामें अधिकांश व्याख्याताओंने इसे यज्ञशालाका बाँस माना है, पर वह ठीक नहीं लगता। द्रष्टव्य—श्रौतकोश भाग ३, 'श्रौतपदार्थनिर्वचनम्' ३।१३—१५।

१२२- सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य

२५६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १४०

उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने पूर्वकी दस तथा आगे होनेवाली दस पीढ़ियोंको तार देता है। मूर्खों एवं निन्दकोंके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। यह धर्मोंमें परम धर्म और क्रियाओंमें परम क्रिया है। शास्त्रकी निन्दा करनेवाले व्यक्तिके सामने कभी भी इसका कथन नहीं करना चाहिये। जो मुझमें श्रद्धा रखते हैं तथा जिनमें मुक्तिकी अभिलाषा है, उनके सामने ही उसका पठन-पाठन करना चाहिये।

[ अध्याय १३९ ]


कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य

पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने जिन तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया है, उन्हें मैं सुन चुकी। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप सगुण-साकार विग्रह धारणकर सदा किस क्षेत्रमें सुशोभित होते हैं; जहाँ आपका उत्तम कर्म सम्पादनकर श्रेष्ठ गति प्राप्त की जाय?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! कोकामुख-^१ तीर्थका नाम तो मैं तुम्हें पहले बता ही चुका हूँ, जो गिरिराज हिमालयकी तलहटीमें स्थित है। इसके अतिरिक्त दूसरा लोहार्गल^२ नामका एक स्थान है, जिसे मैं एक क्षण भी नहीं छोड़ता। ऐसे तो ज्ञानकी दृष्टिसे चर-अचर सारा जगत् मुझसे व्याप्त है और कोई भी स्थान मुझसे रिक्त नहीं, किंतु जो लोग मेरी गूढ़ गतिको जानना चाहते हैं, वे मेरी आराधनामें लगनेकी इच्छासे यथाशीघ्र 'कोकामुख' जानेका प्रयल करें।

धरणीने पूछा— जगत्प्रभो! जब आप सर्वत्र रहते हैं, तो आप 'कोकामुख' क्षेत्रको ही कैसे श्रेष्ठ बतलाते हैं?

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! 'कोकामुख' क्षेत्रसे बढ़कर कोई भी स्थान मेरे लिये श्रेष्ठ, पवित्र, उत्तम या प्रिय नहीं है। जो व्यक्ति 'कोकामुख' क्षेत्रमें पहुँच गया, वह पुनः इस संसारमें जन्म नहीं पाता। 'कोकामुख' क्षेत्रके समान दूसरा कोई स्थान न हुआ, न आगे होगा। वहाँ मेरी मूर्तिकी गुप्तरूपसे निवास है।

पृथ्वी बोली— देवेश्वर! आप सर्वोपरि देवता हैं। भक्तोंको अभय प्रदान करना आपका स्वाभाविक गुण है। अब इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जितने गोपनीय स्थान हैं, उन्हें मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! जहाँ इसमें मुख्य पर्वतसे सदा जलकी बूँदें भूमिपर गिरती हैं, उस स्थानको 'जलबिन्दु' तीर्थ कहते हैं। वहाँ पृथ्वीपर मूसलकी तुलना करनेवाली पर्वतसे एक धारा गिरती है, जिसका नाम 'विष्णुधारा' है। जो वहाँ मात्र एक दिन-रात उपवासकर यत्नपूर्वक स्नान करता है, उसे एक हजार 'अग्निष्टोम-यज्ञों' के अनुष्ठान करनेका फल प्राप्त होता है और उसकी बुद्धिमें कर्तव्यनिर्धारणमें कभी व्यामोह नहीं होता। फिर अन्तमें वह 'विष्णुधारा' के तटपर ही मरनेका सौभाग्य प्राप्तकर नित्य मेरी इस मूर्तिक दर्शन करता रहता है, इसमें कोई संशय नहीं। उस 'कोकामुख' क्षेत्रमें एक 'विष्णुपद' नामका स्थान है। वसुंधरे! वहाँ भी मेरी मूर्ति है, किंतु इस रहस्यको कोई नहीं जानता। देवि! जो व्यक्ति वहाँ स्नानकर एक रात निवास करता है, वह मुझमें श्रद्धा रखनेवाला व्यक्ति 'क्रौञ्च' द्वीपमें जन्म पाता है और अन्तमें जब प्राणोंका त्याग


१. देखिये पृष्ठ १९७ और उसकी टिप्पणी।
२. द्रष्टव्य-अध्याय १५१ तथा पृष्ठ २६४ की टिप्पणी।

अध्याय १४० ] कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य २५७

करता है, तब आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

इसी 'कोका' मण्डलमें 'चतुर्धारा' नामक एक स्थान है। वहाँ ऊँचे पर्वतसे धाराएँ गिरती हैं। जो मानव पाँच राततक निवास करते हुए वहाँ स्नान करता है, वह कुशद्वीपमें निवास करनेके पश्चात् मेरे लोकमें स्थान पाता है। कर्मफलको सुखमें परिवर्तित करनेवाला यहाँ एक 'अनित्य' नामक प्रसिद्ध क्षेत्र है, जिसे देवतालोग भी जाननेमें असमर्थ हैं, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या? श्रेष्ठ गन्धोंवाली पृथ्वि! वहाँ एक दिन-रात निवास करके स्नान करनेवाला पुरुष पुष्करद्वीपमें जन्म पाता है और फिर वह सभी पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको जाता है। वहीं मेरा एक अत्यन्त गोपनीय 'ब्रह्मसर' नामसे प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ शिलातलपर एक पवित्र धारा गिरती है। जो मेरा भक्त पाँच राततक वहाँ निवासकर स्नान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सूर्यधाराके आश्रयमें रहनेवाला वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

देवि! यहीं मेरा एक परम गुप्त स्थान है, जिसे 'धेनुवट' कहते हैं। वहाँ ऊँची शिलासे एक मोटी धारा गिरती है। मेरे कर्ममें संलग्न जो पुरुष वहाँ प्रतिदिन स्नान करता और सात राततक रह जाता है तो उसे ऐसा माना जाता है कि उसने सातों समुद्रोंमें स्नान कर लिया है। फलतः वह मेरी उपासनामें लगा हुआ सातों द्वीपोंमें विहार करता चलता है तथा अन्तमें मेरा ध्यान-भजन करते हुए मरकर वह सातों द्वीपोंका अतिक्रमण-कर मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है। देवि! यहाँपर 'कोटिवट' नामका एक गुप्तक्षेत्र है, जहाँ वटवृक्षकी जड़से निकलकर एक धारा गिरती है। वहाँ एक राततक निवास करके स्नान करनेवाला मनुष्य मेरे उस पर्वत-शृङ्गपर वटके पत्तोंकी संख्याके हजार गुने वर्षोंतक रूप और सम्पत्तिसे सम्पन्न रहता है। फिर देवि! मृत्यु होनेपर वह अग्निके समान तेजस्वी होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

देवि! मेरे इस क्षेत्रमें 'पाप-प्रमोचन' नामका एक गुप्त स्थान है। जो कोई वहाँ एक दिन-रात रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंमें पारंगत होकर जन्म पाता है। वहीं एक कौशिकी नामकी नदी है। जो मानव वहाँ पाँच रात्रितक निवास करता हुआ स्नान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। कौशिकी नदीसे होकर वहाँ एक धारा बहती है। जो मनुष्य एक रात रहकर उसमें स्नान करता है, उसे यमलोकके घोर कष्टोंको नहीं भोगना पड़ता। मेरा वह भक्त प्राणोंका त्यागकर मेरे धाममें चला जाता है।

भद्रे! मेरे बदरीक्षेत्रमें एक और विशिष्ट स्थान है, जिसके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरको लाँघ जाते हैं। उसका नाम 'द्रंष्ट्राङ्कुर' है और यहीं कोका नदीका उद्गम स्थान है। इस गुह्य स्थानको जाननेमें सभी असमर्थ हैं, इस कारण लोग वहाँ जा नहीं पाते। भद्रे! वहाँ स्नान करके एक दिन-रात पवित्रभावसे निवास करनेवाला मानव 'शाल्मलि' द्वीपमें जन्म पाता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति प्राणत्याग करनेके उपरान्त 'शाल्मलि' द्वीपका भी परित्यागकर मेरे संनिकट पहुँच जाता है।

महाभागे! वहीं एक परम फलदायक दूसरा गुप्त स्थान भी है, जिसे 'विष्णुतीर्थ' कहते हैं। वहाँ पर्वतके बीचसे जलकी धारा निकलकर 'कोका' नदीमें गिरती है। उस जलको 'त्रिस्रोतस्' कहते हैं, यह सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करानेवाला है। पृथ्वीदेवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य संसारके बन्धनको काटकर वायुदेवताके लोकको प्राप्त होता है और वायुका स्वरूप धारण करके ही वह

२५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४०

वहाँ निवास करता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है, तब उस लोकसे चलकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है। यहीं 'कौशिकी' और 'कोका' के सङ्गमपर एक श्रेष्ठ स्थान है, जिसके उत्तर भागमें 'सर्वकामिका' नामकी शिला शोभा पाती है। वहाँ स्नानपूर्वक जो एक दिन-रात निवास करता है, उसकी प्रशस्त एवं विशाल कुलमें उत्पत्ति होती है और उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है (पूर्वजन्मकी सारी बातें याद रहती हैं)। इस कौशिकी-कोकासङ्गममें (सर्वकामिका शिलाके पास) स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्ग अथवा भूमण्डल जहाँ कहीं भी जाना चाहता है या जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, वह सब कुछ ही प्राप्त कर लेता है। मेरी आराधनामें तत्पर रहनेवाला मानव उस स्थानपर प्राणोंके परित्याग करनेके बाद सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो करके मेरे लोकमें चला जाता है। भद्रे! 'कोकामुख' क्षेत्रमें 'मत्स्यशिला' नामक एक गुह्य स्थान है। उस श्रेष्ठ स्थानपर कौशिकी नदीसे निकली हुई तीन धाराएँ गिरती हैं। देवि! यदि उसमें स्नान करते समय जलमें मछली दिखलायी पड़ जाय तो उसे समझना चाहिये कि स्वयं भगवान् नारायण ही मुझे प्राप्त हो गये। सुन्दरि! मत्स्यको देखनेके पश्चात् यजन (पूजन) करता हुआ पुरुष मधु और लाजा (लावा)-से समन्वित अर्घ्य प्रदान करे। देवि! जो मेरे ऐसे उत्तम एवं परम गुह्य क्षेत्रमें स्नान करता है, वह मेरुपर्वतके उत्तर भागमें 'पद्मपत्र' नामक स्थानपर निवास करता है। कुछ दिन वहाँ रहनेके पश्चात् मेरे उस गोपनीय स्थानको जब छोड़ता है, तब मेरे लोकमें चला जाता है।

वसुंधरे! पाँच योजनके विस्तारमें मेरा 'कोकामुख' नामक क्षेत्र है। उसे जाननेवाला पापकर्ममें लिप्त नहीं होता। अब एक दूसरे स्थानका परिचय सुनो। परम रमणीय इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जहाँ मैं दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके बैठता हूँ, वहीं 'शिलाचन्दन' नामका एक स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। पुरुषकी आकृतिसे सम्पन्न होनेपर भी मैं वहाँ वराहका रूप धारण करके रहता हूँ। वहाँ सुन्दर ऊँचा मुख और ऊपरतक उठे हुए दाढ़सहित मैं अखिल विश्वको देखता हूँ। देवि! जो मेरे प्रेमी भक्त मुझे स्मरण करते हैं तथा मेरे उपास्य कर्मोंमें रत रहते हैं, उनके पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है। अतः वे पवित्रात्मा पुरुष संसार-बन्धनसे छूट जाते हैं। यह महत्त्वपूर्ण 'कोकामुखस्थान' गुह्योंमें भी परम गुह्य है और सिद्धोंके लिये परम सिद्धि-प्रदाता है। साधक पुरुष सांख्ययोगके प्रभावसे जिस महान् सिद्धिको प्राप्त नहीं कर पाते, वही सिद्धि 'कोकामुख' क्षेत्रमें जानेपर सहज सुलभ हो जाती है। वसुंधरे! यह रहस्य मैं तुम्हें बता चुका।

महाभागे! तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें मैंने श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर दिया। अब तुम अन्य कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो ? पृथ्वी देवि! मेरा कहा हुआ यह 'कोकामुख' तीर्थ सर्वोत्तम स्थान है। जो वहाँ जाकर दर्शन-स्नानादि करता है, वह अपने दस पूर्वके पुरुषोंको और दस आगे होनेवाले कुटुम्बियोंको तार देता है। फिर यदि वहाँ दैवयोगसे कदाचित् शरीरका परित्याग कर देता है तो वह परम शुद्ध भगवद्भक्तके कुलमें जन्म लेता है। उसका मन एकमात्र मुझमें लगता है और वह मेरे धर्मका प्रचारक होता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा श्रवण करता है, वह शरीर त्यागनेके पश्चात् मेरे लोकमें जाता है। उसके पाँच सौ जन्मोंके सब पाप मिट जाते हैं और वह मेरा प्रिय भक्त हो जाता है। जो प्रातःकाल इस उपाख्यानको नित्य पढ़ता है, उसे मेरा उत्तम स्थान प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं।

[अध्याय १४०]

अध्याय १४१ ] 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य २५९

'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! उसी हिमालय पर्वतपर एक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इसे 'बदरिकाश्रम' कहते हैं। इसमें संसारसे उद्धार करनेकी दिव्य शक्ति है। जिनकी मुझमें श्रद्धा है, केवल वे ही उस भूमिमें पहुँचनेमें सफल होते हैं। उसे प्राप्त करनेपर मानवके सभी मनोरथ पूर्ण हो सकते हैं। उस ऊँचे पर्वतशिखरपर 'ब्रह्मकुण्ड' नामका एक प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ मैं हिममें स्थित होकर निवास करता हूँ। जो मनुष्य वहाँ तीन राततक उपवास रहकर स्नान करता है, वह 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त करता है। मेरे व्रतमें आस्था रखनेवाला जितेन्द्रिय मनुष्य यदि वहाँ प्राणोंका त्याग करता है तो वह सत्यलोकका उल्लङ्घन कर मेरे धामको प्राप्त होता है। मेरे उसी उत्तम क्षेत्रमें एक 'अग्निसत्यपद' नामक स्थान है, जहाँ हिमालयके तीन शृङ्गोंसे जलकी विशाल धाराएँ गिरती हैं। मेरे कर्ममें परायण रहनेवाला जो मानव वहाँ तीन राततक निवास कर स्नान करता है, वह सत्यवादी एवं कार्यमें परम कुशल होता है। वहाँके जलका स्पर्श करके यदि कोई प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करता है।

देवि! इसी बदरिकाश्रममें 'इन्द्रलोक' नामका भी मेरा एक प्रसिद्ध आश्रम है। वहाँ इन्द्रने मुझे भलीभाँति संतुष्ट किया था। हिमालयके शृङ्गोंसे निरन्तर वहाँ जलकी मोटी धाराएँ गिरती हैं। उस विशाल शिलातलपर मेरा धर्म सदा व्यवस्थित रहता है। जो मानव वहाँ एक रात भी रहकर स्नान करता है, वह सत्यवक्ता एवं परम पवित्र होकर 'सत्यलोक' में प्रतिष्ठा पाता है। जो वहाँ नित्य व्रत करनेके पश्चात् अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें जाता है। बदरिकाश्रमसे सम्बन्ध रखनेवाला 'पञ्चशिख' नामका एक ऐसा तीर्थ है, जहाँ हिमालयकी पाँच चोटियोंसे जलकी धाराएँ गिरती हैं। वे धाराएँ पाँच नदीके रूपमें परिवर्तित हो गयी हैं। वहाँ जो मानव स्नान करता है, वह 'अश्वमेधयज्ञ' का फल प्राप्तकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। दुष्कर तप करनेके पश्चात् यदि वहाँ कोई प्राण-त्याग करता है तो वह स्वर्गलोकका अतिक्रमण कर मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। मेरे उसी क्षेत्रमें 'चतुःस्रोत' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। जहाँ हिमालयकी चारों दिशाओंसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। जो मनुष्य एक रात भी वहाँ निवास कर स्नान करता है, वह स्वर्गके ऊर्ध्वभागमें आनन्दपूर्वक निवास करता है और वहाँसे भ्रष्ट होकर मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर मेरा भक्त होता है। फिर संसारके दुष्कर कर्म (कठिन साधना) करके प्राणोंका त्यागकर स्वर्गका अतिक्रमण कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

वसुंधरे! मेरे उसी क्षेत्रमें एक 'वेदधार' नामका तीर्थ है, जहाँ ब्रह्माजीके मुखसे चारों वेद प्रकट हुए थे। यहाँ चार विशाल जलकी धाराएँ ऊँची शिलापर गिरती हैं, जो मनुष्य चार राततक यहाँ रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंके अध्ययनका अधिकारी होता है। जो मेरा उपासक मनुष्य वहाँ अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहीं द्वादश दिव्य 'कुण्ड' नामक वह स्थान है, जहाँ मैंने बारह सूर्योंको स्थापित किया था। वहाँके पर्वत-शृङ्गकी जड़ विशाल है। इसके नीचे बहुत-सी शिलाएँ हैं। किसी भी द्वादशी तिथिको यदि कोई वहाँ स्नान करता है तो जहाँ द्वादश सूर्य रहते हैं, वह उस लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। फिर

२६०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४१

मेरे कर्ममें स्थित रहनेवाला वह मनुष्य प्राणोंका परित्याग कर आदित्योंके पाससे अलग होकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है।

यहीं 'सोमाभिषेक' नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है, जहाँ मैंने चन्द्रमाका ब्राह्मणोंके राजाके रूपमें अभिषेक किया था। उन अत्रिनन्दन चन्द्रमाने मुझे यहीं संतुष्ट किया था। वसुंधरे! चौदह करोड़ वर्षोंतक तपोऽनुष्ठान कर मेरी कृपासे चन्द्रमाको परम सिद्धि उपलब्ध हुई थी। यह सारा जगत् एवं इसकी उत्तम ओषधियाँ सब उन चन्द्रमाके ही अधिकारमें हैं। इसी स्थानपर इन्द्र, स्कन्द और मरुद्गण प्रकट और विलीन हुआ करते हैं। देवि! मुझसे सम्बन्ध रखनेवाली वहाँकी सभी वस्तुएँ सोममय होकर अन्तमें मुझमें स्थित हो जायँगी। वहाँ 'सोमगिरि' नामसे प्रसिद्ध एक ऐसा स्थान है, जहाँ भूमिपर, कुण्डमें एवं विशाल वनमें भी जलकी धाराएँ गिरती हैं। देवि! यह मैं तुम्हें बता चुका। जो मानव तीन राततक वहाँ रहकर स्नान करता है, वह सोमलोकको प्राप्तकर आनन्दका उपभोग करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं। देवि! फिर अत्यन्त कठोर तप करनेके बाद जब उसकी मृत्यु होती है तो वह चन्द्रलोकका उल्लङ्घन कर मेरे लोकको प्राप्त करता है।

देवि! मेरे इसी बदरिकाश्रमक्षेत्रमें 'उर्वशी-कुण्ड' नामक वह गुप्त क्षेत्र भी है, जहाँ उर्वशी नामकी अप्सरा मेरी दाहिनी जाँघको विदीर्ण कर प्रकट हुई थी। देवि! देवताओंका कार्य-साधन करनेके लिये मैं वहाँ (निरन्तर) तप करता रहता हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता, मैं स्वयं ही अपने-आपको जानता हूँ। वहाँ मेरे तपस्या करते हुए बहुत वर्ष बीत गये, किंतु इन्द्र, ब्रह्मा एवं महेश्वर आदि देवता भी यह रहस्य न जान सके।

देवि! 'बदरिकाश्रम' में तपका फल सुनिश्चित है, अतः स्वयं मैंने भी वहाँ रहकर बहुत वर्षोंतक तपस्या की है। पृथ्वीदेवि! वहाँपर मैं दस करोड़, दस अरब तथा कई पद्म वर्षोंतक तप करनेमें तत्पर रहा। उस समय मैं ऐसे गुप्त स्थानमें था कि देवतालोग भी मुझे देख न सके। अतः उन्हें महान् दुःख हुआ और वे अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये। वसुंधरे! मैं तो तपमें संलग्न था और सभीको देख रहा था, किंतु मेरी योगमायाके प्रभावसे आवृत होनेके कारण उन सभीको मुझे देखनेकी शक्ति न थी। तब उन सब देवताओंने ब्रह्माजीसे कहा—'पितामह! भगवान् विष्णुके बिना जगत्में हमें शान्ति नहीं मिल रही है। तब देवताओंकी बात सुनकर लोक-पितामह ब्रह्मा मुझसे कहनेके लिये उद्यत हुए। देवि! उस समय मैं योगमायाके पटके भीतर छिपा था। अतः! उन्हें दर्शन न हो सका। अतएव देवता, गन्धर्व, सिद्ध और ऋषिगण परम प्रसन्न होकर मेरी स्तुति करनेके लिये चल पड़े। इन्द्रादि सभी देवता वहाँ मेरी प्रार्थना करने लगे। उन्होंने स्तुति की—'नाथ! आपके अदर्शनसे हम सब महान् दुःखी एवं उत्साहहीन हैं। हमसे कोई भी प्रयत्न होना शक्य नहीं है। हृषीकेश! आप महान् अनुग्रह करके हमारी रक्षा कीजिये।' बड़ी आँखोंसे शोभा पानेवाली पृथ्वि! देवताओंकी इस प्रार्थनापर मैंने उनपर कृपादृष्टि डाली। मेरे देखते ही वे परम शान्त हो गये। यह इसी उर्वशी-तीर्थकी विशेषता है। इस 'उर्वशी-कुण्ड' में जो मानव एक रात भी रहकर स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। वह 'उर्वशी' लोकमें जाकर अनन्त समयतक क्रीडा करनेका अवसर प्राप्त करता है। देवि! मेरी उपासनामें परायण रहनेवाला जो मानव वहाँ प्राणोंका त्याग करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सीधे मुझमें ही लीन हो जाता है।

वसुंधरे! इस 'बदरिकाश्रम' का पुण्य जहाँ-

अध्याय १४२ ] उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन [ २६१

जहाँ रहकर स्मरण किया जाय, वहीं विष्णुके स्थानकी भावना जाग उठती है। ऐसा करनेवाला मानव फिर संसारमें नहीं आता। जो व्यक्ति इसका पठन एवं श्रवण करता है, वह ब्रह्मचारी, क्रोधविजयी, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा मुझमें श्रद्धा रखनेवाला, ध्यान एवं योगमें सदा रत होकर मुक्तिके फलका भागी होता है। जो इसे जानता है, वही समस्त ध्यानयोगको जानता है। वह अपने आत्मतत्त्वको प्राप्त करके परम गतिको प्राप्त कर लेता है।

[ अध्याय १४१ ]


उपासनाकर्म एवं नारीधर्मका वर्णन

पृथ्वी बोली—माधव! मैं आपकी दासी आपसे यह प्रार्थना करती हूँ कि स्त्रियोंमें प्राण और बल बहुत थोड़ा होता है, वे अनशन करने या क्षुधाके वेगको सहन करनेमें (प्रायः) असमर्थ होती हैं।

भगवान् वराह बोले—महाभागे! सर्वप्रथम इन्द्रियोंको वशमें रखकर फिर मुझमें चित्त लगाकर तथा संन्यासयोगका आश्रय लेकर सभी कर्मोंको मेरा समझता हुआ करे। फिर चित्तको एकाग्र करके अपने व्रतमें दृढ़ रहते हुए, सभी कर्म मुझे अर्पण कर दे। ऐसा करनेसे स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक कोई भी क्यों न हो, वह जन्म-मरणरूपी संसार-बन्धनसे छूट जाता है अथवा परम गति पानेकी इच्छा हो तो ज्ञानरूपी संन्यासयोगका आश्रय ग्रहण करे। यदि प्राणीका चित्त समानरूपसे मुझमें स्थिर हो गया तो वह सब प्रकारके भक्ष्याभक्ष्य पदार्थोंको खाता हुआ, पीने योग्य अथवा अपेय पदार्थोंको पीता हुआ भी उस कर्मदोषसे लिप्त नहीं होता। मन, बुद्धि और चित्तको यदि समानरूपसे मुझमें स्थापित कर दिया तो कुछ भी कर्म करता हुआ वह ठीक उसी प्रकार उससे लिप्त नहीं होता, जैसे कमलका पत्र जलमें रहता हुआ भी जलसे अलग ही रहता है। समत्वके प्रभावसे कर्मका संयोग होते हुए भी प्राणी उससे लिप्त नहीं होता है। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। देवि! रात-दिन, एक मुहूर्त, एक क्षण, एक कला, एक निमेष अथवा एक पल भी अवसर मिल जाय तो चित्तको समरूपमें मुझमें स्थापित करना चाहिये। यदि चित्त व्यवस्थितरूपसे सम रह सके तो जो लोग दिन-रात सदा मिश्रित कर्म करते रहते हैं, उन्हें भी परम सिद्धि प्राप्त हो जाती है। जागते-सोते, सुनते और देखते हुए भी जो व्यक्ति मुझमें चित्त लगाये रखता है, उस मुझमें चित्त लगाये पुरुषको क्या भय? देवि! कोई दुराचारी चण्डाल हो या सदाचारी ब्राह्मण, इससे मेरा कोई तात्पर्य नहीं। मैं तो उसीकी प्रशंसा करता हूँ, जो सदा अनन्यचित्त है—एकमात्र मेरा भक्त है। जो सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञानी पुरुष ज्ञानरूपी संस्कारसे पवित्र होकर मेरी उपासना करते हैं, मेरे कर्ममें तत्पर रहनेवाले उन व्यक्तियोंका चित्त सदा मुझमें लगा रहता है। जो लोग अपने हृदयमें पूर्णरूपसे मुझे स्थापित करके कर्मोंका सम्पादन करते हैं, वे संसारके कर्मोंमें लगे रहनेपर भी सुखकी नींद सोते हैं। देवि! जिनका चित्त परम शान्त है, वे मेरे प्रिय पात्र हैं। कारण, वे अपने शुभ अथवा अशुभ जो भी कर्म हैं, उन सबको मुझमें अर्पण करके निश्चिन्त रहते हैं।

देवि! जिनका चित्त सदा चञ्चल रहता है, वे अधम मानव दुःखी हो जाते हैं, चञ्चल चित्त ही प्राणीका वास्तविक शत्रु है और शान्त चित्त उसके मोक्षका साधन है। अतएव वसुंधरे! तुम चित्तको

१२३- शालग्रामक्षेत्रका माहात्म्य

२६२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १४३

मुझमें लगा दो। ज्ञान और योगका आश्रय लेकर मनको एकाग्र करती हुई तुम मेरी उपासना करो। जो निरन्तर मुझमें चित्त लगाकर अपने व्रतमें निश्चित रहता हुआ मेरी उपासना करता है, वह मेरे सांनिध्य (समीपता)-को प्राप्तकर अन्तमें मुझमें ही लीन हो जाता है।

वसुंधरे! पुनः दूसरी बात बताता हूँ, सुनो। ज्ञानका चित्तसे सम्बन्ध है और क्रियाका योगसे। ज्ञानी पुरुष कर्मके प्रभावसे मेरे स्थानको प्राप्त कर लेते हैं। योगके सिद्ध पारगामी पुरुष भी वहीं जाते हैं। मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले मानव ज्ञान, योग एवं सांख्यका चित्तमें चिन्तन न होनेपर भी परम सिद्धि पानेके अधिकारी हो जाते हैं। देवि! ऋतुकाल उपस्थित होनेपर मुझमें श्रद्धा रखनेवाली स्त्रीका कर्तव्य है कि वह तीन दिनोंतक निराहार रहे। उसे वायुके आहारपर समय व्यतीत करना चाहिये। चौथे दिन गृह-सम्बन्धी कार्योंको सम्पन्न करे। उस समय अन्य स्थानोंपर जाना निषिद्ध है। सर्वप्रथम सिर धोकर स्नान करे, फिर निर्मल श्वेत वस्त्र धारण करे। वसुंधरे! चित्तपर अपना अधिकार रखकर जो स्त्री मन और बुद्धिको सम रखकर कर्म करती है, वह सदा मेरे हृदयमें निवास करती है। भोजनकी सामग्रीको मेरा नैवेद्य मानकर ग्रहण करना चाहिये। भूमे! इन्द्रियोंको वशमें रखकर चित्तको एकाग्र करे और तब संन्यासयोगकी साधना करनी चाहिये। स्त्री, पुरुष या नपुंसक जो कोई भी हो, उन्हें नित्य ऐसा करना ही चाहिये। ज्ञान रहते हुए भी मेरे कर्मके सम्बन्धमें जो योगकी सहायता नहीं लेते और सांसारिक कार्योंमें जीवन व्यतीत करते हैं, ऐसे मानव आजतक भी मेरे विषयमें अनभिज्ञ हैं। देवि! वे सांसारिक मोहमें लिप्त मुझे नहीं जानते। उनमें माता, पिता, पुत्र और स्त्री—ये सैकड़ों एवं हजारों मोहकी शृङ्खलाएँ हैं, जिनमें वे चक्कर काटते रहते हैं और मुझे नहीं जान पाते। मोह और अज्ञानसे ढका हुआ यह संसार अनेक प्रकारकी आसक्तियोंमें बँधा है। इससे मनुष्य मुझमें चित्त नहीं लगा पाता। मृत्युके समय ये सभी साथ छोड़कर इस संसारसे पृथक्-पृथक् स्थानपर चले जाते हैं। फिर सब अपने-अपने कर्मोंके अनुसार जन्म पाते हैं। पृथ्वीदेवि! संसारके मोहमें पड़े हुए प्रायः सभी मानव अज्ञानी ही बने रहते हैं। इसीमें उनका पूरा समय बीत जाता है। पुनः उनके पुनर्जन्म होंगे और मृत्यु भी, किंतु मेरे सांनिध्यके लिये कोई यत्न नहीं करता।

वसुंधरे! यह सब ‘संन्यासयोग’ का विषय है। जिसे इसके रहस्यका ज्ञान हो जाता है, वह सदा योगमें लगकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। जो मानव प्रातःकाल उठकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसे पुष्कल सिद्धि प्राप्त हो जाती है और अन्तमें वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

[अध्याय १४२]


मन्दारकी महिमाका निरूपण

**भगवान् वराह कहते हैं—**सुन्दरि! गङ्गाके दक्षिण तटपर तथा विन्ध्यपर्वतके पिछले भागमें मेरा एक परम गुह्य एकान्त स्थान है, जिसे मेरे प्रेमी भक्त मन्दार नामसे पुकारते हैं। देवि! वहीं त्रेतायुगमें 'राम' नामसे प्रसिद्ध एक महान् प्रतापी पुरुषका प्राकट्य होगा। वे वहाँ मेरे विग्रहकी स्थापना करेंगे, इसमें संदेह नहीं।

**पृथ्वी बोली—**देवेश नारायण! आपने धर्म एवं अर्थसे संयुक्त मन्दार नामक जिस स्थानका वर्णन किया है, उस स्थानपर मनुष्योंके लिये

अध्याय १४३ ] मन्दारकी महिमाका निरूपण [ २६३

कौन-से कर्तव्य-कर्म हैं तथा उन मानवोंको किन लोकोंकी प्राप्ति होती है, इसे जाननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्सुकता हो गयी है, अतः आप विस्तारसे इसे बतलानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मन्दारका रहस्य अत्यन्त गोपनीय है। एक बार जब मन्दारपर सर्वत्र पुष्प खिले हुए थे और मैं मनोविनोद कर रहा था तो एक सुन्दर पुष्पको मैंने उठाकर अपने हृदयसे लगा लिया। तबसे विन्ध्यपर्वतपर स्थित उस मन्दारमें मेरा चित्त संलग्न हो गया। वसुंधरे! ग्यारह कुण्ड उस पर्वतकी शोभा बढ़ाते हैं। सुभगे! भक्तोंपर कृपा करनेकी इच्छासे मैं उस मन्दार नामक वृक्षके नीचे निवास करता हूँ। विन्ध्यपर्वतकी तलहटीमें वह परम सुन्दर स्थान अत्यन्त दर्शनीय है। उस महान् वृक्ष मन्दारमें एक बड़े आश्चर्यकी बात है, वह भी सुनो। वह विशाल वृक्ष द्वादशी और चतुर्दशी तिथिके दिन फूलता है। वहाँ दोपहरके समयमें लोग उसे भलीभाँति देख सकते हैं। पर अन्य दिनोंमें वह किसीको दिखलायी नहीं देता। वहाँ मानव एक समय भोजन करके निवास करता है तो स्नान करते ही उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है और वह परम गतिको प्राप्त होता है।

देवि! उसके उत्तर भागमें 'प्रापण' नामका एक पर्वत है, जहाँ दक्षिण दिशासे होती हुई जलकी तीन धाराएँ गिरती हैं। मेरुके दक्षिण शिखरपर 'मोदन' नामका एक स्थान है और उसके पूरब और उत्तरके बीचमें 'वैकुण्ठकारण' नामका एक गुह्य स्थान है। वहाँ हल्दीके रंगकी भाँति चमकनेवाली जलकी एक धारा गिरती है। जो मानव एक रात रहकर वहाँ स्नान करता है, उसे स्वर्ग प्राप्त हो जाता है।

वहाँ जाकर वह देवताओंके साथ आनन्दका अनुभव करता है और उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और वह अपने समस्त कुलका उद्धार कर देता है। विन्ध्यगिरिकी चोटियोंपर मेरुशिखरसे 'समस्रोत' नामकी धारा गिरकर एक गहरे तालाबके रूपमें परिवर्तित हो जाती है। वहाँ मनुष्यको चाहिये कि स्नान करके एक रात निवास करे। ऊँची शिलावाले मेरुपर्वतके पूर्वपार्श्वमें रहकर चित्तको सावधान करके जो अपने प्राणका परित्याग करता है, उसके सम्पूर्ण बन्धन कट जाते हैं और वह मेरे लोकमें चला जाता है। मन्दारके पूर्वमें 'कोटरसंस्थित' नामक स्थानमें मूसलकी आकृति-जैसी एक पवित्र जलकी धारा गिरती है। वहाँ स्नानकर पाँच दिन निवास करनेसे वह मेरुगिरिके पूर्वभागमें स्वर्ग-सुख प्राप्त करता है। पुनः वहाँ भी वह अत्यन्त कठिन कर्मका सम्पादन कर मेरे लोकको प्राप्त होता है। यशस्विनि! मन्दारके दक्षिण और पश्चिम भागमें सूर्यके समान प्रकाशमान एक जलकी धारा गिरती है। वहाँ स्नानकर मनुष्यको एक दिन-रात निवास करना चाहिये। इससे मेरुके पश्चिम भागमें ध्रुवके स्थानमें रहकर भक्तिपरायण वह मनुष्य जब भौतिक शरीरसे अलग होता है तो मेरे लोकको प्राप्त होता है। वह महान् यशस्वी मानव रहकर तथा चक्रवर्ती नरेशके समान प्राणोंका परित्याग कर मेरुके शृङ्गोंको छोड़कर मेरी संनिधिमें आ जाता है। उससे तीन कोसकी दूरीपर दक्षिण दिशामें 'गभीरक' नामक एक गुह्य स्थान है, जहाँ गहरे जलवाला एक महान् सरोवर है। वहाँ स्नानकर आठ दिनोंतक निवास करनेसे स्वच्छन्द गमन करनेकी शक्ति मिलती है और अन्तमें वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

२६४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४४

देवि! अब उस क्षेत्रका मण्डल बतलाता हूँ, सुनो। मेरुपर्वतपर स्थित 'मन्दर' नामक एक स्थान है, जो 'स्यमन्तपञ्चक' नामसे प्रसिद्ध है, वहाँ मैं सदा निवास करता हूँ। विन्ध्यकी ऊँची शिलापर दक्षिणकी ओर चक्र, वामभागमें गदा और आगे हल-मूसल और शङ्ख विराजमान रहते हैं। यह गुह्य रहस्य है। देवि! जो मानव मेरी शरणमें आ जाते हैं, वे ही इस परम पवित्र रहस्यको जानते हैं, अन्य मनुष्य नहीं; क्योंकि मेरी मायाने उनकी बुद्धिको मोहित कर रखा है। [अध्याय १४३]


सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य

पृथ्वी बोली— प्रभो! आपकी कृपासे मैं मन्दारका वर्णन सुन चुकी। अब इससे जो श्रेष्ठ स्थान हो, उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! 'शालग्राम' (मुक्तिनाथ क्षेत्र) नामसे मेरा एक परम प्रिय एवं प्रसिद्ध स्थान है। पहले द्वापरयुगमें यदुवंशमें शूरसेन नामके एक कुशल कर्मठ व्यक्ति हुए, जिनके पुत्र वसुदेवजी हुए। वसुधे! उनकी सहधर्मिणीका नाम देवकी है। महाभागे! उसी देवकीके गर्भसे मैं अवतार धारण करता हूँ और करूँगा। देवताओंके शत्रुओंका मर्दन करना मेरे अवतारोंका मुख्य उद्देश्य है। उस समय 'वासुदेव' नामसे मेरी प्रसिद्धि होगी। यादवोंके कुलको बढ़ानेवाले शूरसेनके वहाँ रहते समय एक श्रेष्ठ महर्षि, जिनका नाम सालङ्कायन था, मेरी आराधना करनेके लिये दसों दिशाओंमें भ्रमण कर रहे थे। पहले उन्होंने मेरुगिरिकी चोटीपर जाकर पुत्रके लिये तपस्या आरम्भ की। वसुंधरे! इसके बाद वे 'पिण्डारक'¹ में और फिर 'लोहार्गल'² क्षेत्रमें भी जाकर एक हजार वर्षतक तप करते रहे। देवि! ब्रह्मर्षि 'सालङ्कायन' वहाँ इधर-उधर मेरा अन्वेषण कर रहे थे, किंतु मेरे वहाँ रहनेपर भी उन्हें मेरा दर्शन नहीं हुआ।

भगवान् शंकर भी वहाँ शिलाके रूपमें विराजने लगे, जहाँ मैं शालग्राम-शिलारूपमें विराजता हूँ। वहाँकी चक्राङ्कित शिलाएँ सब मेरा ही स्वरूप हैं। पुनः वहाँकी कुछ शिलाएँ 'शिवनाभा' और कुछ 'चक्रनाभा' नामसे प्रसिद्ध हैं। यह शिवरूप पर्वत सोमेश्वर नामसे प्रसिद्ध है। चन्द्रदेव अपना शाप मिटानेके लिये यहाँ एक हजार वर्षांतक तपस्या करते रहे, जिससे वे शापमुक्त होकर परम तेजस्वी बन गये और भगवान् शंकरकी स्तुति की। उनकी दिव्य स्तुतिसे प्रसन्न होकर वर देनेवाले भगवान् शंकर 'सोमेश्वरलिङ्ग' से प्रकट होकर तीन नेत्रोंसे सम्पन्न होकर सामने स्थित हो गये।

चन्द्रमाने कहा— 'जिनका सौम्य स्वरूप है, उमादेवी जिनकी पत्नी हैं, भक्तोंपर कृपा करनेके


¹ १. इसका महाभारत १।३५।११, ३।८२।६५; ८८।२१, ५।१०३।१४ आदिमें तथा भागवत ११।१।११ में भी उल्लेख है। अब इसका नाम 'पिण्डार' है, यह द्वारकासे २० मील दूर जामनगर जिलेमें, कल्याणपुर तालुकेमें स्थित है। (J. B. I. XIV)
² २. एक लोहार्गल (लोहागर) राजस्थानमें नवलगढ़से २० मीलकी दूरीपर है (तीर्थाङ्क पृष्ठ २८२)। पर नन्दलाल देके अनुसार, जिन्होंने 'वराहपुराण' पर विशेष शोध किया था, यह हिमालयमें कूर्माचल (कुमायूँ)-के अन्तर्गत चम्पावतसे ३ मील उत्तर 'लोहाघाट' है। This is a sacred place in the Himalaya (Varaha purana, chapter, 140. 5, 144. 8, 151). Lohaghat in Kumaun, 3 miles to the north of Champwat, on the river Loha. The place is sacred to Visnu. (Brahmanda Purana ch. 51) (Geographical Dictionary of Ancient and Mediaeval India, page—115) आगे १५१ वें अध्यायमें इसका विस्तृत माहात्म्य है।

१२४- रुरुक्षेत्र एवं हृषीकेशके माहात्म्यका वर्णन

अध्याय १४४ ] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र ( मुक्तिनाथ ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६५

लिये जो सदा आतुर रहते हैं, ऐसे पञ्चमुख भगवान् त्रिलोचन नीलकण्ठ शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके ललाटपर चन्द्रमा सुशोभित हैं, जो हाथमें पिनाक धनुष धारण किये हुए हैं तथा भक्तोंको अभयदान देना जिनका स्वभाव है, ऐसे दिव्य रूपधारी देवेश्वर शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनके हाथमें त्रिशूल और डमरू है, अनेक प्रकारके मुखवाले गण जिनकी सदा सेवा करते रहते हैं, उन भगवान् वृषध्वजको मैं प्रणाम करता हूँ। जो त्रिपुर, अन्धक एवं महाकाल नामके भयंकर असुरोंके संहारक हैं, जो हाथीके चर्मको पहनते हैं, उन प्रलयमें भी अचल भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सर्पका यज्ञोपवीत पहनते हैं, रुद्राक्षकी माला जिनकी छवि छिटकाती है, भक्तोंकी इच्छा पूर्ण करना जिनका स्वाभाविक गुण है तथा जो सबके शासक हैं, उन अद्भुत रूपधारी भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ। सूर्य, चन्द्रमा और अग्नि जिनके नेत्र हैं, मन एवं वाणीकी जिनके पास पहुँच नहीं है तथा जिन्होंने अपने जटासमूहसे गङ्गाको प्रकट किया एवं हिमालय पर्वतके कैलासशिखरपर अपना आश्रम बना रखा है, उन भगवान् शंकरको मैं प्रणाम करता हूँ।'

देवि! चन्द्रमाने जब भगवान् शंकरकी इस प्रकार स्तुति की तो उन्होंने कहा—'गोपते! मुझसे तुम अपना अभिलषित वर माँग लो।'

चन्द्रमाने कहा—'भगवन् ! आप यदि वर देना चाहते हैं तो मेरी यह अभिलाषा है कि आप मेरे इस 'सोमेश्वर' लिङ्गमें सदा निवास करें और इसमें श्रद्धा रखकर उपासना करनेवाले पुरुषोंका मनोरथ पूर्ण करनेकी कृपा करें।'

देवेश्वर शंकरने कहा—'शीत किरणोंके स्वामी शशाङ्क! भगवान् विष्णुके साथ मैं यहाँ सदा निवास करता आया हूँ। तुम भी मेरे ही स्वरूप हो, पर अब मैं आजसे यहाँ विशेषरूपसे रहूँगा और इस लिङ्गकी पूजा करनेवाले श्रद्धालु पुरुषोंको सदा मेरी पूजाका फल प्राप्त होता रहेगा। तुम्हारा कल्याण हो। मैं तुम्हें देवदुर्लभ वर दे रहा हूँ। यहाँ पहले सालङ्कायन मुनिने भी महान् तप किया है। उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान् विष्णुने उन्हें उनके साथ रहनेका वर दे रखा है। अतः कलानिधे! हम दोनोंका यहाँ रहना पहलेसे ही निश्चित है। श्रीहरिके द्वारा अधिष्ठित पर्वतका नाम 'शालग्राम'-गिरि है और मैं 'सोमेश्वर' नामसे स्थित हूँ। इन दोनों पर्वतोंसे सम्बन्ध रखनेवाली ये शिलाएँ भी 'विष्णुशिला' तथा 'शिवशिला' नामसे प्रसिद्ध होंगी। पूर्व समयमें रेवाने भी मेरी प्रसन्नता प्राप्त करनेके लिये तपस्या की थी। उसके मनमें इच्छा थी कि मुझे भगवान् शिवके समान पुत्र चाहिये। मैंने सोचा कि मैं तो किसीका भी पुत्र नहीं हूँ, फिर अब क्या करूँ। सोम! उस समय बहुत सोच-विचारकर मैंने उससे कहा था—'देवि! तुमने मेरी अपार भक्ति की है, अतः मैं पुत्र बनकर गणेशके सहित लिङ्गरूपसे तुम्हारे गर्भ (तलहटी the bed)-में निवास करूँगा। इस प्रकार रेवाने मेरा सांनिध्य प्राप्त कर लिया और यहाँ आ गयी। तबसे इसकी भी 'रेवाखण्ड' नामसे प्रसिद्धि हुई। साथ ही गण्डकी भी सूखे पत्ते खाकर तथा वायु पीकर देवताओंके वर्षसे सौ वर्षोंतक तपस्यामें तत्पर रही। उस समय वह सदा भगवान् विष्णुका ही चिन्तन करती थी। अन्तमें जगत्के स्वामी श्रीहरि वहाँ स्वयं पधारे और बोले—'पुण्यमयी गण्डकि! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। सुव्रते! तुम मुझसे वर माँगो।'

इसके पूर्व भी गण्डकीको एक बार शङ्ख, चक्र एवं गदाधारी भगवान्का दर्शन प्राप्त हुआ

२६६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४४

था। फिर उन प्रभुकी बात सुनकर गण्डकीने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम कर इस प्रकार स्तुति प्रारम्भ की—'भगवन्! मैंने आपके जिस रूपका दर्शन किया है, वह देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इस स्थावर-जङ्गममय सम्पूर्ण संसारकी सृष्टि आपकी ही कृपाका प्रसाद है। जिस समय आप नेत्र बंद कर लेते हैं, उस समय सारा विश्व संहृत हो जाता है। श्रुतिके निर्देशानुसार अनादि, अनन्त एवं असीमस्वरूप जो ब्रह्म है, वह आप ही हैं। महाविष्णो! जो आपको जानता है, वह वेदका तत्त्वज्ञ पुरुष है। आपकी ही आदिशक्ति योगमाया तथा प्रधान प्रकृति नामसे प्रसिद्धि है। आप अव्यक्त, चित्स्वरूप, निर्गुण, निरञ्जन, निर्विकार एवं आनन्दस्वरूप परम शुद्ध परमात्मा हैं। आप स्वयं सृष्टिकी रचनासे पृथक् रहते हैं और आपकी योगमाया सभी कार्योंका सम्पादन करती है। आपके निरञ्जन रूपको भला मैं एक मूर्ख अबला यथार्थतः कैसे जानूँ?'

गण्डकीकी प्रार्थनासे प्रभावित होकर भगवान् विष्णुने कहा—'देवि! तुम्हारी जो इच्छा हो, जो अन्य मनुष्योंके लिये सब प्रकारसे दुर्लभ एवं अप्राप्य है, वह वर मुझसे माँग लो। भला मेरा दर्शन हो जानेपर प्राणीका कौन-सा मनोरथ अपूर्ण रह सकता है?'

हिमांशो! इसपर जनताको तारनेवाली देवी गण्डकीने श्रीहरिके सामने हाथ जोड़कर नम्रतापूर्वक मधुर वचनोंमें कहा—'भगवन्! आप यदि प्रसन्न हैं तो मुझे अभिलषित वर देनेकी कृपा कीजिये। मैं चाहती हूँ कि आप मेरे गर्भमें आकर निवास करें।'

इसपर भगवान् विष्णु प्रसन्न होकर सोचने लगे कि मेरे साथ सदा रहनेका लाभ उठानेवाली इस गण्डकी नदीने कैसा अद्भुत वर माँगा है। इससे सम्पूर्ण प्राणियोंका तो बन्धन कट सकता है। अतः इसे यह वर अवश्य दूँगा। अतः वे प्रसन्नतापूर्वक बोले—'देवि! मैं शालग्रामशिलाका रूप धारण कर तुम्हारे गर्भ (bed of river)-में निवास करूँगा और मेरी संनिधिके कारण तुम नदियोंमें श्रेष्ठ मानी जाओगी। तुम्हारे दर्शन, स्पर्श, जलपान तथा अवगाहन करनेसे मनुष्योंके मन, वाणी एवं कर्मसे बने हुए पापोंका नाश होगा। जो पुरुष तुम्हारे जलमें स्नान करके देवताओं, ऋषियों एवं पितरोंका तर्पण करेगा, वह अपने पितरोंको तारकर उन्हें स्वर्गमें पहुँचा देगा। साथ ही मेरा प्रिय बनकर वह स्वयं भी ब्रह्मलोकमें चला जायगा। तुम्हारे तटपर मृत प्राणियोंको मेरे लोककी प्राप्ति होगी, जहाँ जाकर सोच नहीं होता।'

इस प्रकार देवी गण्डकीको वर देकर भगवान् विष्णु वहीं अन्तर्धान हो गये। शशाङ्क! तबसे हम और भगवान् विष्णु इस क्षेत्र*में निवास करते हैं।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! इस प्रकार कहकर भगवान् शंकरने चन्द्रमाको प्रभा प्रदान कर उनके अङ्गोंपर अपना हाथ भी फेरा। इससे वे तत्क्षण परम स्वच्छ हो गये। फिर भगवान् शंकर वहाँसे प्रस्थान कर गये। इसी 'सोमेश्वर' लिङ्गके दक्षिणभागमें रावणने बाणसे पर्वतका भेदन किया था, जहाँसे जलकी एक पवित्र धारा निकली। यह स्नान करनेवालेके पापोंको हरण करती तथा प्रचुर पुण्य प्रदान करती है। इसका नाम 'बाणगङ्गा' है। सोमेश्वरके पूर्वभागमें रावणका वह तपोवन है, जहाँ तीन राततक रहकर उसने तपस्या और नृत्यकार्य किये थे और उसके नृत्यसे संतुष्ट होकर भगवान् शंकरने उसे वर प्रदान किया था। इस कारण उस स्थानको 'नर्तनाचल' कहते हैं। बाणगङ्गामें


* यह शालग्राम-क्षेत्र नेपालका 'मुक्तिनाथ' है।

१२५- 'गोनिष्क्रमण'-तीर्थ और उसका माहात्म्य

अध्याय १४४ ] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र ( मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६७

स्नान करने तथा 'बाणेश्वर' का दर्शन करनेपर मनुष्यको गङ्गामें स्नान करनेका फल मिलता है और देवताकी भाँति उसे स्वर्गमें आनन्द भोगनेका सौभाग्य प्राप्त होता है।

वसुंधरे ! उसी समय सालङ्कायन मुनि भी मेरे शालग्राम-क्षेत्रमें आकर महान् तप करने लगे। उनके मनमें इच्छा थी कि 'मुझे शिवजीके ही समान पुत्र चाहिये।' मुनिके इस श्रेष्ठ भावको जानकर भगवान् शंकरने अपना एक दूसरा सुन्दर सुखप्रद रूप निर्माण किया और अपनी योगमायाकी सहायतासे वे सालङ्कायनके पुत्र बनकर उनके दक्षिणभागमें विराज गये; परंतु सालङ्कायन मुनि इसे न जान सके। वे मेरी आराधनामें बैठे ही रहे। तब शंकरकी ही दूसरी मूर्ति नन्दीने हँसकर सालङ्कायन मुनिसे कहा—'मुनिवर! आप अब उपासनासे विरत हों। आपका मनोरथ सफल हो गया।'

देवि ! नन्दीकी यह बात सुनकर मुनिवर सालङ्कायनका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वे आश्चर्यसे बोले—'अहो! यदि मेरे इस तपका फल उदय हो गया तो भगवान् विष्णुको भी अवश्य दर्शन देना चाहिये। मैं जबतक उन्हें न देखूँगा, तबतक मैं तपस्यासे उपरत न होऊँगा।' फिर वे नन्दीसे बोले—'पुत्र! मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ, तुम योगका आश्रय लेकर मथुरा जाओ। वहाँ मेरा एक पवित्र आश्रम है। उस जगह मेरी प्रचुरमात्रामें गोसम्पत्ति पड़ी है। वहाँ आमुष्यायण नामका मेरा शिष्य भी है। उन्हें लेकर तुम यथाशीघ्र यहाँ आ जाओ।' सालङ्कायन मुनिकी आज्ञासे नन्दी उसी क्षण मथुराको चल पड़े। वहाँ पहुँचकर उन्होंने ऋषिके आश्रमका अन्वेषण किया और आमुष्यायण उन्हें दिखायी पड़ गये। पुनः कुशल-प्रश्नके बाद घरपर स्थित गो आदि सम्पत्तिके विषयमें भी बातचीत की। उन्होंने उत्तर दिया—'साधो! तपस्याके परमधनी मेरे गुरुदेवकी कृपासे यहाँ सर्वत्र कुशल है। अब आप मेरे गुरुजीकी कुशल बतानेकी कृपा करें। इस समय वे कहाँ विराजमान हैं? आप कहाँसे पधारे हैं और आपके यहाँ आनेका प्रयोजन क्या है? यह बात विस्तारपूर्वक बतायें और अर्घ्य आदि स्वीकार करें।' आमुष्यायणके इस प्रकार कहनेपर नन्दीने उनका दिया हुआ अर्घ्य स्वीकार किया और सालङ्कायन मुनिका वृत्तान्त बताया तथा अपने आनेकी बात स्पष्ट कर दी। फिर नन्दी आमुष्यायणके साथ गोधन लेकर वहाँसे वापस हुए। बहुत दिनोंतक चलनेके बाद वे गण्डकी नदीके तीरपर त्रिवेणीसङ्गमपर पहुँचे। 'देविका'<sup></sup> नामकी एक नदी भी वहीं आकर तपस्या कर रही थी। पुलस्त्य एवं पुलह मुनिके आश्रम<sup></sup> के पास यह तथा गङ्गा नदी भी आकर मिली। इन तीन नदियोंके एक साथ मिल जानेके कारण यह स्थान 'त्रिवेणी-सङ्गम' नामसे प्रसिद्ध हुआ। आगे चलकर इस महान् तीर्थका नाम 'कामिक' हुआ। इस तीर्थसे पितृगण बहुत प्रसन्न होते हैं। यहाँ भगवान् शंकरका एक महान् लिङ्ग है, जिसे 'त्रिजलेश्वर' महादेव कहते हैं। इसके दर्शन करनेसे भुक्ति एवं मुक्ति दोनों सुलभ हो जाती हैं और सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।


१. यहाँ यह 'देविका' मुक्तिनाथ पर्वतपरकी एक छोटी-सी नदी है।
२. पुलहाश्रमका वर्णन 'श्रीमद्भागवत' ५।७।८, ११; ८।३० आदिमें भी आया है। यह आजका नेपाल राज्यके अन्तर्गतका 'मुक्तिनाथ' पर्वत ही है ('कल्याण' का 'तीर्थाङ्क' पृ० १५४)। यहाँ प्रकरणके अन्तमें आगे 'हरिहरक्षेत्र' (सोनपुर)-का वर्णन हुआ है, जो पटनाके सामने गङ्गाके उत्तरतटपर स्थित है।

२६८ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १४४

पृथ्वी बोली—प्रभो! मैंने तो सुना है कि त्रिवेणी केवल प्रयागमें ही है, जहाँ भगवान् महेश्वर एक 'शूलटङ्क' नामसे तथा दूसरे सोमेश्वर' नामसे प्रसिद्ध हैं। साथ ही वहाँ स्वयं श्रीहरि भी 'वेणीमाधव' नामसे विराजते हैं। वहाँ गङ्गा, यमुना और सरस्वती—ये तीन नदियाँ हैं, वहाँ सम्पूर्ण देवताओं, ऋषियों, नदियों एवं तीर्थोंका समाज भी विराजमान रहता है। उस 'तीर्थराज' में स्नान करनेवाले तथा प्राणत्याग करनेवाले व्यक्ति मोक्षके भागी होते हैं। फिर आप जो गण्डकीकी 'त्रिवेणी' बता रहे हैं, यह वही 'त्रिवेणी' है या कोई दूसरी? महाभाग! आप अखिल जगत्का हित करनेकी इच्छासे इसे बतानेकी कृपा करें। दयानिधे! मेरी कलुषित बुद्धिपर ध्यान न देकर इस प्रसङ्गको स्पष्ट करनेकी अवश्य कृपा करें।

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! इस विषयमें एक प्राचीन इतिहास प्रसिद्ध है। हिमालय पर्वतके रमणीय स्थलमें देवतालोग निवास करते हैं। बहुत पहले जगत्के हित-सम्पादनके विचारसे भगवान् विष्णु वहीं तपस्या करने लगे। कुछ समय बाद उनके श्रीविग्रहसे एक अत्यन्त दिव्य तेज प्रकट हुआ, जिससे चर और अचर—सम्पूर्ण संसार जलने लगा और विष्णुके गण्डस्थल (कपोल) पसीनेसे भींग गये तथा उसी स्वेदसे दिव्य नदी गङ्गा प्रवाहित हुई। इस अद्भुत घटनासे जन-महर्लोक प्रभृति सभी आश्चर्यमें भर गये और गङ्गाके प्रादुर्भावस्थलका पता लगाने चले, पर पता न लग सका। अन्तमें ब्रह्मासहित सभी देवता भगवान् शंकरके पास पहुँचे और उन्हें प्रणाम कर एक ओर खड़े हो गये और फिर उनसे गङ्गाके उद्गमका पता पूछा। इसपर भगवान् शंकर कुछ क्षणके लिये ध्यानस्थ हुए। और फिर बोले—

'आप लोगोंको इसका उत्पत्तिस्थल दिखाता हूँ।' यों कहकर वे उमादेवी, अपने गणों तथा देवताओंके सहित उस ओर प्रस्थित हो गये, जहाँ भगवान् विष्णु तपस्यामें स्थित थे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने कहा—'भगवन्! आप सर्वसमर्थ हैं। अखिल जगत् आपसे बना है। आपके मनमें क्या अभिलाषा उत्पन्न हो गयी कि आप तप कर रहे हैं? सम्पूर्ण संसार आपपर आश्रय पाये हुए हैं। आप सभीके अधिष्ठाता हैं। फिर आपके लिये कौन-सा दुर्लभ पदार्थ है, जिसके लिये आप यह कठोर तप कर रहे हैं?'

इसपर जगत्प्रभु विष्णुने उन्हें प्रणाम करके उत्तर दिया—'मैं संसारकी हितकामनासे तप करनेके लिये उद्यत हुआ हूँ। आपके दर्शन करनेके लिये भी मनमें बड़ी उत्सुकता थी। जगत्प्रभो! इस समय आपका दर्शन पा जानेसे मेरा यह मनोरथ सफल हो गया।'

भगवान् शंकर बोले—भगवन्! यह मुक्तिक्षेत्र है। इसके दर्शन करनेसे ही मनुष्य मुक्ति पानेका अधिकारी हो जाता है। क्योंकि यहाँ आपके गण्डस्थल (कपोल)-से प्रकट हुई 'गण्डकी' नदी नदियोंमें श्रेष्ठ होगी, जिसके गर्भमें आप सुशोभित होंगे; इसमें कोई संशय नहीं है। आप जगत्के स्वामी हैं। जब आपका यहाँ निवास होगा तो केशव! आपके सम्पर्कसे मैं, शिव, ब्रह्मा, समस्त देवता, ऋषि, यज्ञ एवं तीर्थ—प्रायः सभी इस गण्डकी नदीमें सदा निवास करेंगे। प्रभो! जो मनुष्य पूरे कार्तिक मासमें यहाँ स्नान करेगा, उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जायँगे और वह निश्चय ही मुक्तिका भागी होगा। यह तीर्थोंमें परम तीर्थ तथा मङ्गलोंमें परम मङ्गल है। यहाँ स्नान करनेसे मानव गङ्गा-स्नानके फलके भागी हो जायँगे। इसके स्मरण करने, देखने तथा स्पर्श

१२६- स्तुतस्वामीका माहात्म्य

अध्याय १४४] सोमेश्वरलिङ्ग, मुक्तिक्षेत्र (मुक्तिनाथ) और त्रिवेणी आदिका माहात्म्य २६९

करनेसे मनुष्य पापसे छूट सकता है। इसकी समता करनेवाली दूसरी कोई नदी नहीं है। केवल गङ्गा इससे श्रेष्ठ है। भुक्ति-मुक्ति देनेवाली परम पुण्यमयी वह गण्डकी जहाँ है, वहीं 'देविका' नामसे प्रसिद्ध एक दूसरी नदी भी गण्डकीके साथ मिल गयी है। यहींसे थोड़ी दूरपर पुलस्त्य और पुलह मुनि आश्रम बनाकर सृष्टिका विधान सम्पन्न होनेके लिये महान् तपस्या कर रहे थे। तपके फलस्वरूप उन्हें सृष्टि करनेकी शक्ति सुलभ हो गयी। उसी समय ब्रह्माके शरीरसे एक पुण्यमयी नदी गङ्गा जो नदियोंमें प्रधान मानी जाती है वह तथा एक और नदी देविका गण्डकीमें आकर मिल गयी। अतः उस महान् पवित्र नदीका नाम त्रिवेणी पड़ गया, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। वह पवित्र मुक्तिप्रद क्षेत्र एक योजनके विस्तारमें है।

देवि! पूर्व समयकी बात है। वेद-विद्याविशारद कर्दममुनिके दो पुत्र थे, जिनका नाम क्रमशः जय और विजय था। ये दोनों यज्ञविद्यामें निपुण तथा वेद एवं वेदाङ्गके पारगामी विद्वान् थे और भगवान् श्रीहरिमें भी उनकी बड़ी निष्ठा थी। संयोगसे कभी उन दोनों परम कुशल ब्राह्मणोंको राजा मरुतने यज्ञके लिये बुलाया। यज्ञ समाप्त हो जानेपर राजाने उन दोनों भाइयोंकी पूजा की और उन्हें प्रभूत दक्षिणा दी। अब वे दोनों ब्राह्मण घर आ गये और दक्षिणामें मिली हुई सम्पत्तिको बाँटने लगे। इसी समय उनमें आपसमें संघर्ष छिड़ गया। बड़े पुत्र जयका कथन था कि धनको बराबर-बराबर बाँटना चाहिये। विजयने कहा— जिसने जो अर्जन किया है, वह धन उसका है। तब जयने विजयसे कहा—'क्या मुझे तुम शक्तिहीन मानकर ऐसा कहते हो। सब सम्पत्ति लेकर तुम जो मुझे देना नहीं चाहते तो ग्राह बन जाओ।'

इसपर विजयने भी जयसे कहा—'क्या धनके लोभसे तुम सर्वथा अन्धे ही हो गये हो? तुम मदान्ध होकर जो मुझसे इस प्रकार कह रहे हो तो तुम मदान्ध हाथी ही हो जाओ।'

इस प्रकार एक दूसरेके शापके कारण वे दोनों ब्राह्मण अलग-अलग गज और ग्राह बन गये। इनमें विजय तो गण्डकी नदीमें जातिस्मर ग्राह हुआ और जय त्रिवेणीके वन्य क्षेत्रमें हाथी। वह हाथीके बच्चों और हथिनियोंके साथ क्रीडा करता हुआ वहीं वनमें रहने लगा। इस प्रकार ग्राह और गजराज—दोनोंको वहीं रहते हुए कई हजार वर्ष बीत गये। एक समयकी बात है—वह हाथी कभी हथिनियोंके झुंडको साथ लेकर त्रिवेणीमें पहुँचा और उसके बीचमें जाकर स्नान करने लगा। वह हथिनियोंपर जल छिड़कता और हथिनियाँ उसपर जल छिड़कतीं। वह सूँडसे स्वयं ही जल पीता और उन हथिनियोंको भी पिलाता। इस प्रकार प्रसन्न-मन होकर वह उनके साथ क्रीडा करता रहा। उसकी इसी क्रीडाके बीच दैवयोगसे प्रेरित वह ग्राह अपने पूर्व वैरका स्मरण करता हुआ उस हाथीके पास आया और उसके पैरको अत्यन्त दृढतासे पकड़ लिया। इसपर हाथीने भी उसपर अपने दाँतोंसे प्रहार किया। इधर अब वह ग्राह उस हाथीको जलमें खींचने लगा। हाथी बाहर निकलना चाहता और ग्राह उसे भीतर खींच ले जाना चाहता था। इस प्रकार उन दोनोंमें कई हजार वर्षोंतक युद्ध चलता रहा।

इस प्रकार मत्सर (द्वेष एवं क्रोध)—से परिपूर्ण गज एवं ग्राह—इन दोनोंके परस्पर लड़नेसे वहाँके बहुत-से प्राणियोंको महान् पीड़ा पहुँची। बहुतेरे जीव तो अपने प्राणोंसे भी हाथ धो बैठे। तब उस क्षेत्रके स्वामी 'जलेश्वर' ने भगवान् श्रीहरिको इसकी सूचना दी और इसपर कृपालु

१२७- द्वारका-माहात्म्य

२७०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४५

भगवान्‌ने सुदर्शन चक्रसे ग्राहके मुँहको चीर डाला। वसुंधरे! वे अपने चक्रको बार-बार चला रहे थे। इससे शिलाओंपर भी चोट पहुँची। अतः चक्रके आघातसे शिलाओंमें भी उनके चिह्न पड़ गये जिससे वे शिलाएँ वज्रकीटद्वारा खायी-सी दीखती हैं। सुन्दरि! इस त्रिवेणीक्षेत्रके विषयमें तुम्हें संदेह करना ठीक नहीं है। इस क्षेत्रकी ऐसी महिमा है, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया।^१

वसुंधरे! राजा भरत भी पुलह-पुलस्त्यमुनिके आश्रमके निकट जाकर 'त्रिजलेश्वर'भगवान्‌की पूजामें संलग्न हुए तो उनकी संसारसे सर्वथा विरति हो गयी और मृगके शरीर छूटनेके पश्चात् वे जडभरत हुए^२। इस जन्ममें भी पुनः उन्होंने इनकी पूजा की। इसीसे वे जलेश्वर या जडेश्वर भी कहलाने लगे। भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करनेसे योग-सिद्धि प्राप्त हो जाती है। सुभगे! जब मैं श्रेष्ठ शालग्राम-क्षेत्रमें था तो वहीं मुझे यह बात विदित हुई कि जलेश्वर (जडभरत)-ने मेरी स्तुति की है। वसुधे! भक्तोंपर कृपा करनेके लिये मैं विवश हो जाता हूँ, अतः मैंने अपना सुदर्शन चक्र चलाया। मेरा प्रथम चक्र जहाँ गिरा, वहाँ 'चक्रतीर्थ' बन गया। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य तेजसे सम्पन्न होकर सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है और मरकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। मेरे तथा भगवान् शंकरके वहाँ रहनेके कारण ही यह तीर्थ 'हरिहरक्षेत्र' कहलाने लगा।

यहाँ 'त्रिधारक' नामका तीर्थ है, जिसके पूर्वभागमें 'हंसतीर्थ' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। वहाँका एक कौतुकपूर्ण सर्वोत्कृष्ट वृत्तान्त बताता हूँ, सुनो। किसी समयकी शिवरात्रिके दिन जब इस मन्दिरमें उत्सव चल रहा था, अनेक प्रकारके नैवेद्य अर्पण करके शंकरजीकी उपासना चल रही थी, इतनेमें ही कुछ भूखे कौए उस अन्नपर टूट पड़े और एक कौआ अन्न उठाकर ऊपर उड़ गया और दूसरा उसको छीननेके लिये उसपर झपटा। इस प्रकार वे दोनों परस्पर लड़ते हुए एक कुण्डमें गिर पड़े। वहाँ गिरते ही सहसा उनकी आकृति हंसके समान हो गयी और जब वे बाहर निकले तो उनसे चन्द्रमाके तुल्य प्रकाश फैलने लगा। वहाँकी जनता यह देखकर महान् आश्चर्यमें भर गयी। तबसे लोग उस स्थानको 'हंसतीर्थ' कहने लगे। बहुत पहले यहीं यक्षोंने भगवान् शंकरकी आराधना की थी। उस समयसे वह 'यक्षतीर्थ'के नामसे कहा जाता है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य पवित्र होकर यक्षोंके लोकमें प्रतिष्ठा पाता है। [ अध्याय १४४ ]

शालग्राम-क्षेत्रका माहात्म्य

धरणीने पूछा— भगवान्! आप सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी हैं। मैं जानना चाहती हूँ कि मुनिवर सालङ्कायनने आपके उस मुक्तिप्रद क्षेत्रमें तपस्या करते हुए अन्य कौन-सा कार्य किया और कौन-सी सिद्धि प्राप्त की?'

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! सालङ्कायन मुनि वहाँ दीर्घ कालतक तप करते रहे। उनके सामने शालका एक उत्तम वृक्ष था, जिससे सुगन्ध फैल रही थी। सालङ्कायन ऋषि निरन्तर तप करनेसे थक गये थे। इतनेमें उनकी दृष्टि उस शाल-वृक्षपर पड़ी। वे उस विशाल वृक्षके नीचे गये और विश्राम करने लगे। उनके मनमें मेरे दर्शनकी अभिलाषा बनी रही। उस समय शाल-वृक्षके पूर्वभागमें पश्चिमकी ओर मुख करके मुनि


१. इसमें तथा श्रीमद्भागवत ८। २—४ एवं वामन-पुराणके 'गजेन्द्रमोक्ष' कथामें कुछ अन्तर है।
२. यह कथा भागवत ५। १० में है।

अध्याय १४५ ] शालग्राम-क्षेत्रका माहात्म्य २७१

बैठे थे। मेरी मायाने उन्हें ज्ञानशून्य बना दिया था, अतः वे मुझे देख न सके। सुन्दरि ! कुछ दिनोंके बाद जब वैशाख मासकी द्वादशी तिथि आयी तो वहीं पूर्व दिशामें ही उन्हें मेरा दर्शन प्राप्त हुआ। उस समय उत्तम व्रतका पालन करनेवाले उन तपस्वी मुनिने मुझे वहाँ देखकर बार-बार प्रणाम किया और वेदके मन्त्रोंसे मेरी स्तुति करने लगे। उस अवसरपर मेरे तीक्ष्ण तेजसे मुनिके नेत्र चौंधिया गये, अतः उन्होंने धीरेसे अपने नेत्र बंद कर लिये और स्तुति करने लगे। फिर ज्यों ही उन्होंने अपनी आँखें खोलीं तो उन्होंने देखा कि मैं उस वृक्षके दक्षिणभागमें खड़ा हूँ। अब वे ऋषि मेरे सामने आकर बैठ गये और ऋग्वेदकी ऋचाओंसे मेरी स्तुति करने लगे। तबतक मैं शालके पश्चिम ओर चला गया। तब वे मुनि भी वहीं पश्चिमकी ओर जाकर बैठ गये और 'यजुर्वेद' के मन्त्रोंसे मेरी स्तुति की। देवि ! इसके बाद मैं उसके उत्तर दिशामें चला गया। वहाँ भी वे सामवेदके मन्त्रोंका गान करके मेरी स्तुति करने लगे। सुन्दरि ! फिर तो उन ऋषिप्रवर सालङ्कायनकी स्तुतियोंसे संतुष्ट होकर मैं उनपर अत्यन्त प्रसन्न हो गया। अतः उनसे कहा— 'मुनिवर सालङ्कायन ! तुम्हारे इस तप एवं स्तुतिके प्रभावसे मैं परम संतुष्ट हूँ। तपस्याके फलस्वरूप तुम्हें परम सिद्धि प्राप्त हो गयी है।'

इसपर सालङ्कायन मुनिने विनयपूर्वक मुझसे कहा—'हरे ! मैं भूमण्डलपर निरन्तर भ्रमण तथा तप करता रहा। किंतु निश्चित रूपसे मुझे आज ही आपका शुभ दर्शन प्राप्त हुआ है। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो जगन्नाथ ! मुझे भगवान् शिवके समान पुत्र देनेकी कृपा कीजिये। मुनीश्वर ! ईश्वरकी ही एक दूसरी मूर्ति नन्दिकेश्वरके नामसे प्रसिद्ध है जो (नन्दिकेश्वर) आपके दाहिने अङ्गसे पुत्रके रूपमें प्रकट हो चुके हैं। ब्राह्मणदेव ! अब आप तपसे उपरत हों। योगमायाकी शक्तिसे सम्पन्न होकर वे इस समय मेरे साथ व्रजमें विराज रहे हैं। आपके शिष्य आमुष्यायणको मथुरासे बुलाकर उनके साथ वे शूलपाणि-रूपमें वहाँ अवस्थित हैं। अब एक दूसरी गुप्त बात भी बताता हूँ, उसे सुनें। आजसे यह उत्तम क्षेत्र 'शालग्राम' क्षेत्र कहलायगा। साथ ही आपने जो यह वृक्ष देखा है, वह भी निःसंदेह मैं ही हूँ। इसे भगवान् शंकरके अतिरिक्त अन्य कोई भी व्यक्ति नहीं जानता। मैं अपनी योगमायासे सदा छिपा रहता हूँ, किंतु आपके तपसे मैं प्रकट हुआ हूँ।'

वसुधे ! उस समय सालङ्कायन मुनिको इस प्रकार वर देकर उनके देखते-ही-देखते मैं अन्तर्धान हो गया। उस वृक्षकी प्रदक्षिणा करके सालङ्कायन मुनि भी अपने आश्रमको चल पड़े।

वसुंधरे ! अब एक दूसरा महान् आश्चर्यपूर्ण स्थान बतलाता हूँ। यहाँ 'शङ्खप्रभ' नामसे प्रसिद्ध मेरा एक परम गुह्य क्षेत्र है। वहाँ द्वादशीके पर्वपर आधी रातमें शङ्खकी ध्वनि सुनायी देती है। उसी क्षेत्रके दक्षिण दिशामें 'गदाकुण्ड' नामसे विख्यात मेरा एक अन्य स्थान भी है, जहाँसे एक जल-स्रोत प्रवाहित है। वहाँ तीन दिनोंतक रहकर स्नान करनेकी विधि है। इसमें स्नान करनेवाला व्यक्ति वेदान्तवादी ब्राह्मणोंके समान फलभागी होता है। यदि श्रद्धालु एवं गुणवान् मनुष्य उस क्षेत्रमें प्राणका परित्याग करता है तो वह हाथमें गदा लिये हुए विशालकाय होकर मेरे लोकको प्राप्त करता है।

वसुंधरे ! यहीं 'देवह्रद' संज्ञावाला मेरा एक दूसरा क्षेत्र भी है। यह अगाध जलवाला श्रेष्ठ देव-सरोवर सुन्दर एवं शीतल जलसे सम्पन्न होकर

१२८- सानन्दूर-माहात्म्य

२७२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १४५

सबको सुख पहुँचाता है। देवता भी उसके लिये तरसते हैं। पृथ्वी देवि! वह ह्रद सदा जलसे परिपूर्ण रहता है। उसमें अनेक ऐसी मछलियाँ भी विचरण करती रहती हैं, जिनपर चक्रका चिह्न अङ्कित रहता है।

सुनयने! अब वहाँका एक दूसरा प्रसङ्ग बताता हूँ, उसे सुनो। वहाँ एक आश्चर्ययुक्त घटना निरन्तर घटती रहती है। मुझमें श्रद्धा रखनेवाला मानव ही इस अलौकिक आश्चर्यमय दृश्यको देख सकता है, पापी पुरुष उसे देखनेमें असमर्थ है। उस परम पवित्र देवह्रदमें सूर्योदयके समय सुनहरे रंगके छत्तीस स्वर्णकमल दिखायी पड़ते हैं, जिन्हें सभी लोग मध्याह्न कालतक देखते हैं। उसमें स्नान करनेपर मानसिक, वाचिक एवं शारीरिक मल धुल जाते हैं और वे शुद्ध होकर स्वर्ग चले जाते हैं। जो व्यक्ति दस दिनोंतक वहाँ निवास एवं स्नान करता है, उसे विधिपूर्वक अनुष्ठित दस अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। यदि मेरे चिन्तनमें संलग्न प्राणी वहाँ अपना प्राण त्याग करता है तो वह अश्वमेध-यज्ञके फलको भोगकर मेरा सारूप्य मोक्ष प्राप्त करता है।

देवि! यहीं श्रीकृष्णके विग्रहसे 'कृष्णगण्डकी' का प्रादुर्भाव हुआ है। इसी प्रकार 'त्रिशूलगङ्गा' नामकी प्रसिद्ध विशाल नदी जो शिवके शरीरसे निकली है, वह भी यहीं है। इस प्रकार दोनों नदियोंके बीचका यह प्रदेश तीर्थ बन गया है। इस स्थानको 'सर्वतीर्थकदम्बक' कहते हैं। यहाँका कदली-वन शिववनकी सुषमा बढ़ाता है। निचुल, जायफल, नागकेसर, खजूर, अशोक, वकुल, आम्र, प्रियालक, नारियल, सोपारी, चम्पा, जामुन, धव, नारङ्गी, बेर, जम्बीर, मातुलुङ्ग, केतकी, मल्लिका (चमेली), यूथिका (जूही), कूई, कोरया, कुटन और अनार आदि अनेक फलों तथा फूलोंवाले वृक्षोंसे उसकी अनुपम शोभा होती रहती है। देवता लोग अपनी पत्नियोंके साथ वहाँ आकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस परम पुण्यमय सरोवरमें उन दो महान् नदियोंका सङ्गम है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सौ अश्वमेध-यज्ञोंका फल प्राप्त करता है। वहाँ वैशाख मासमें स्नान करनेसे एक हजार गाय दान करनेका, माघ महीनेमें स्नान करनेका तथा प्रयागमें मकर स्नानका फल पा लेता है। कार्तिक मासमें सूर्य जब तुला राशिपर आ जायँ, तब वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाला निश्चय ही मुक्तिफलका अधिकारी हो जाता है। देवि! इस प्रकार यह हम लोगोंका 'हरिहरात्मक' क्षेत्र है। जो यहाँ शरीरका त्याग करते हैं, उन मेरे कर्मके अनुसरण करनेवाले व्यक्तियोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। पहले 'मुक्तिक्षेत्र', तब 'रुरुखण्ड' फिर उन दोनों दिव्य स्थलोंसे निर्मित बहाव-प्रदेश और त्रिवेणी-सङ्गम—इन तीर्थोंमें उत्तरोत्तर क्रमशः एक-से-एक श्रेष्ठ माने जाते हैं। गण्डकीसे सङ्गम-क्षेत्रको परम प्रमाण जानना चाहिये। देवि! इस प्रकार नदियोंमें वह गण्डकी नदी सर्वश्रेष्ठ है। भागीरथी गङ्गासे वह जहाँ मिलती है, वहाँ स्नान करनेसे बहुत फल होता है। यह वही महान् क्षेत्र है, जिसे 'हरिहर-क्षेत्र' कहते हैं। यहाँ पवित्र गण्डकी नदी भगवती भागीरथीसे मिलती है। इस तीर्थके महत्त्वको तो देवतालोग भी भलीभाँति नहीं जानते।

भद्रे! मैं तुमसे शालग्राम-क्षेत्र* और सब पापोंको नष्ट करनेवाले गण्डकीके माहात्म्यका वर्णन कर चुका।

जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा पाठ करता है, वह अपनी इक्कीस पीढ़ियोंको तार


* विल्फोर्ड तथा पद्मपुराण, पातालखण्ड अ० ७८के अनुसार यह शालग्राम पर्वत 'मुक्तिनाथ' ही है। द्रष्टव्य—'कल्याण' का तीर्थाङ्क'।