वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २५४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३१ |
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व्रतभङ्ग करनेपर मनुष्यको जो गति प्राप्त होती है, यदि मैं पुनः न लौटूँ तो वह मुझे प्राप्त हो।'
देवि! उस समय चण्डालकी बात सुनकर वह ब्रह्मराक्षस प्रसन्न हो गया। अतः वह मधुर वाणीमें कहने लगा—'अच्छा, तुम जाओ, नमस्कार।' इस प्रकार अपने निश्चयमें अडिग चण्डाल ब्रह्मराक्षससे ऐसा कहकर मेरे संगीतमें तल्लीन हो गया। उसके नाचते-गाते सम्पूर्ण रात्रि बीत गयी। प्रातःकाल होनेपर जब वह ब्रह्मराक्षसके पास वापस चला तो इतनेमें कोई पुरुष उसके सामने आकर खड़ा हो गया और उसने उससे कहा—'साधो! तुम इतनी शीघ्रतासे कहाँ चले जा रहे हो? तुम्हें उस ब्रह्मराक्षसके पास कदापि नहीं जाना चाहिये। वह ब्रह्मराक्षस तो शवतकको खा जाता है; अतः तुम्हें वहाँ प्रत्यक्ष मृत्युमुखमें नहीं जाना चाहिये।'
चण्डालने कहा—'पहले जब मुझे ब्रह्मराक्षस खानेको तैयार था, तब मैंने उसके सामने प्रतिज्ञा की थी कि मैं वापस आ जाऊँगा। सत्यका पालन करना परम आवश्यक है।' इसपर उस पुरुषने उसके हितकी इच्छासे कहा—'चण्डाल! वहाँ मत जाओ; क्योंकि जीवनकी रक्षाके लिये सत्यत्यागका दोष नहीं होता।' किंतु चण्डाल अपने व्रतमें अटल था। अतः वह मधुर वाणीमें बोला—'मित्र! तुम जो कह रहे हो, वह मुझे अभीष्ट नहीं है। मुझसे सत्यका त्याग नहीं हो सकता; क्योंकि मेरा व्रत अचल है। जगत्की जड़ सत्य है और सत्यपर ही यह सारा संसार टिका है। सत्य ही परम धर्म है। परमात्मा भी सत्यपर ही प्रतिष्ठित है; अतः मैं किसी प्रकार भी असत्यका आचरण नहीं करूँगा।' इस प्रकार कहकर वह चण्डाल ब्रह्मराक्षसके पास चला गया और उसका सम्मान करते हुए बोला—'महाभाग! मैं आ गया हूँ। अब मुझे भक्षण करनेमें तुम विलम्ब न करो। तुम्हारी कृपासे अब मैं भगवान् विष्णुके उत्तम स्थानको जाऊँगा। अब तुम अपनी इच्छाके अनुसार मेरे शरीरके इन अङ्गोंको खा सकते हो।
अब वह ब्रह्मराक्षस मधुर वाणीमें कहने लगा—'साधु वत्स! साधु! मैं तुमसे संतुष्ट हो गया, क्योंकि तुमने सत्य-धर्मका भलीभाँति पालन किया है। चण्डालोंको प्रायः किसी धर्मका ज्ञान नहीं होता, पर तुम्हारी बुद्धि पवित्र है।'
'भद्र! यदि तुम्हें जीनेकी इच्छा है तो विष्णु-मन्दिरके पास जाकर गत रातमें तुमने जो गान किया है, उसका फल मुझे दे दो, मैं तुम्हें छोड़ दूँगा, न तो खाऊँगा और न डराऊँगा।' ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! तुम्हारे इस वाक्यका क्या अभिप्राय है? मैं कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। पहले 'मैं खाना चाहता हूँ'—'यह कहकर अब तुम भगवद्गुणानुवादका पुण्य क्यों चाहते हो?' चण्डालकी बात सुनकर ब्रह्मराक्षस बोला—'बस, तुम अपने एक पहरके गीतका ही पुण्य मुझे दे दो। फिर मैं तुम्हें छोड़ दूँगा और स्त्री-पुत्रके साथ तुम जीवित रह सकोगे।' पर उस चण्डालको गीतके पुण्यका लोभ था। अतः वह बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं संगीतका फल नहीं दे सकता। तुम अपने नियमके अनुसार मुझे खा जाओ और मनोऽभिलषित रुधिरका पान कर लो।' अब वह ब्रह्मराक्षस कहने लगा, 'तात! तुमने जो विष्णुके मन्दिरमें गायन-कार्य किये हैं, उनमेंसे केवल एक गीतका ही फल मुझे देनेकी कृपा करो। तुम्हारे इस एक गीतके फलसे ही मैं तर सकता हूँ और अपने परिवारको भी तार सकता हूँ।' इसपर चण्डालने उसे सान्त्वना देते हुए, आश्चर्यचकित होकर उससे पूछा—'ब्रह्मराक्षस! तुमने कौन-सा विकृत कर्म किया है, जिस दोषसे