भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५३

गये थे, उसने वीणा उठायी और भक्ति-गीत गाते हुए भ्रमण करना प्रारम्भ किया। इसी बीच उसे एक ब्रह्मराक्षसने पकड़ लिया। चण्डाल बेचारा निर्बल था और ब्रह्मराक्षस अत्यन्त बली, अतः वह अपनेको उससे छुड़ा न सका और दुःख एवं शोकसे व्याकुल होकर वह निश्चेष्ट-सा हो गया। फिर उस ब्रह्मराक्षससे कहने लगा— 'अरे! मुझसे तुम्हारा क्या अभीष्ट सिद्ध होनेवाला है, जो तुम इस प्रकार मुझपर चढ़ बैठे हो?' उसकी यह बात सुनकर मनुष्योंके मांसके लोभी ब्रह्मराक्षसने चण्डालसे कहा—'आज दस रातोंसे मुझे कोई भोजन नहीं मिला है। ब्रह्माने मेरे भोजनके लिये ही तुम्हें यहाँ भेज दिया है। आज मैं मज्जा, मांस और रक्तोंसे भरे-पूरे तेरे शरीरका भक्षण करूँगा। इससे मेरी तृप्ति हो जायगी।'

वसुंधरे! चण्डाल मेरे गुणगानके लिये लालायित था। उस व्यक्तिने ब्रह्मराक्षससे प्रार्थना की—'महाभाग! मैं तुम्हारी बात मानता हूँ। ब्रह्माने तुम्हारे खानेके लिये ही मुझे भेजा है, परंतु परम प्रभुकी भक्तिसे सम्पन्न होकर इस जागरणमें मैं देवाधिदेव जगदीश्वरके पद्यगानके लिये समुत्सुक हूँ। अतः वनमें उनके आवासस्थलके पास जाकर संगीत सुनाकर मैं लौट आऊँ, तब तुम मुझे खा लेना परंतु इस समय मुझे जाने दो, क्योंकि मैंने यह व्रत धारण कर रखा है कि निशीथ (आधी रात)-में भगवान् श्रीहरिको प्रसन्न करनेके लिये भक्तिसंगीत सुनाया करूँगा। व्रत पूरा होनेपर तुम मुझे खा लेना। इसपर क्षुधार्त ब्रह्मराक्षस कठोर शब्दोंमें बोला—'"अरे मूर्ख! क्यों ऐसी झूठी बात बनाता है? तू कहता है कि 'तुम्हारे पास फिर मैं आऊँगा'। भला ऐसा कौन मनुष्य है, जो मृत्युके मुखमें पहुँचकर फिर जीवित लौट जाय? तुम ब्रह्मराक्षसके मुखमें पड़कर भी फिर जानेकी इच्छा करते हो?' चण्डाल बोला—'ब्रह्मराक्षस! मैं यद्यपि पहलेके निन्दित कर्मोंके प्रभावसे इस समय चण्डाल बना हूँ, किंतु मेरे अन्तःकरणमें धर्म स्थित है। तुम मेरी प्रतिज्ञा सुनो, मैं धर्मानुसार पुनः निश्चित आऊँगा। ब्रह्मराक्षस! अपने जागरणव्रतको पूराकर मैं लौटकर यहाँ अवश्य आऊँगा। देखो, सम्पूर्ण जगत् सत्यके आधारपर ही टिका है। अन्य सब लोक भी सत्यपर ही आधृत हैं। ब्रह्मवादी ऋषियोंने सत्यके द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। कन्या सत्यप्रतिज्ञापूर्वक ही दान की जाती है। ब्राह्मणलोग भी सदा सत्य ही बोलते हैं। राजालोग सत्य-भाषण करनेके प्रभावसे ही तीनों लोकोंपर विजय प्राप्त करते हैं^१। स्वर्ग और मोक्षकी प्राप्ति भी सत्यके प्रभावसे ही सुलभ होती है। सूर्य भी सत्यके प्रतापसे ही तपते हैं और चन्द्रमा भी सत्यके ही प्रभावसे जगत्‌को रञ्जित—आनन्दित करते हैं।^२ मैं सत्यतापूर्वक प्रतिज्ञा करता हूँ कि 'यदि मैं लौटकर तुम्हारे पास फिर न आऊँ तो षष्ठी, अष्टमी, अमावास्या, दोनों पक्षकी चतुर्दशी—इन तिथियोंमें जो स्नातक नहीं करता, उसकी जो दुर्गति होती है, वह गति मुझे प्राप्त हो। जो व्यक्ति अज्ञान तथा मोहमें पड़कर गुरु और राजाकी पत्नीके साथ गमन करता है, उसे जो गति मिलती है, वही गति यदि मैं फिर न लौटूँ तो मुझे प्राप्त हो। मिथ्या यज्ञ करनेवाले पुरुषोंको तथा मिथ्या भाषण करनेवाले लोगोंको जो गति प्राप्त होती है, वही गति यदि मैं पुनः न आ सकूँ तो मुझे प्राप्त हो। ब्राह्मणका वध करनेपर, मदिरा-पान, चोरी और


१. सत्यमूलं जगत्सर्वं लोकाः सत्ये प्रतिष्ठिताः। सत्येन दीयते कन्या सत्यं जल्पन्ति ब्राह्मणाः॥
सत्यं जयन्ति राजानस्त्रीण्येतान्यब्रुवन्नृतम्। (वराहपु० १३९।५०-५१)
२. सत्येन गम्यते स्वर्गो मोक्षः सत्येन चाप्यते। सत्येन तपते सूर्यः सोमः सत्येन रज्यते। (वराहपु० १३९।५३)