भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३१

विशाल कुलमें जन्म पाता है और देवताओंद्वारा अभिवन्दित होता हुआ कुशद्वीपको प्राप्त करता है और वहाँ दस हजार वर्षोंतक निवास करता है। शुभे! देवि! जो मेरे अन्तर्गृहका स्वयं लेपन करता है अथवा न्यायपूर्वक दूसरोंसे लेपन कराता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। वसुंधरे! अब मैं गोबरकी महिमा बताता हूँ, तुम उसे सुनो। मन्दिर लीपनेके लिये जो प्राणी किसी समीपके स्थानसे अथवा कहीं दूर जाकर जितने पग चलकर गोमय लाता है, वह (गोबरको लानेवाला व्यक्ति) उतने ही हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। स्वर्गकी अवधि समाप्त हो जानेपर वह शाल्मलिद्वीपमें (जन्म प्राप्तकर) आनन्दका उपभोग करता है और वहाँ बारह हजार एक सौ वर्षोंतक निवास करता है। फिर वह भारतवर्षमें राजा होकर मेरा भक्त होता है तथा सभी धर्मज्ञोंमें वह श्रेष्ठ तथा मेरा उपासक होता है। अगले जन्ममें भी अपने प्राक्तन संस्कार एवं अभ्यासके कारण पुनः गोमय ला करके मेरे मन्दिरका लेपन करता है तथा उसके फलस्वरूप मेरे लोकको प्राप्त होता है। कोई गौको स्नान करा रहा हो या गायके गोबरसे मेरे मन्दिरका उपलेपन करता हो, उस समय जो व्यक्ति उसके पास जल पहुँचाता है, वह उस जलकी बूँदोंके तुल्य सहस्र वर्षोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है और वहाँसे जब भ्रष्ट होता है तो वह क्रौञ्चद्वीपमें जाता है और क्रौञ्चद्वीपसे भ्रष्ट होकर भूमण्डलपर धार्मिक राजा होता है। पुनः उसी पुण्यके प्रभावसे वह प्राणी मेरे श्वेतद्वीपमें पहुँचता है।

वसुंधरे! जो स्त्री-पुरुष मेरे मन्दिरमें मार्जन-कर्म करते (झाड़ू लगाते) हैं, वे सभी अपराधोंसे मुक्त होकर स्वर्गलोकमें सम्मानपूर्वक निवास करते हैं तथा मार्जनके समय धूलके जितने कण उड़ते हैं, उतने सौ वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करते हैं और वहाँसे च्युत होनेपर वे शाकद्वीपको प्राप्त होते हैं। ऐसा व्यक्ति वहाँ बहुत दिनोंतक निवासकर फिर पवित्र भारतभूमिपर धार्मिक राजा होता है और सब प्रकारके भोगोंको प्राप्तकर मेरी उपासनाकर श्वेतद्वीपको प्राप्त होता है।

देवि! अब तुम्हें कुछ अन्य बातें बताता हूँ, वह सुनो। जो प्राणी मेरी आराधनाके समय पद्य-गान करते हैं, उन्हें जो फल प्राप्त होता है, उसे बतलाता हूँ, तुम सुनो। गाये जानेवाले पद्यकी पङ्क्तियोंके जितने अक्षर होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक गायक पुरुष इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा पाता है। गायनमें सदा परायण रहनेवाला मेरा वह भक्त इन्द्रलोक तथा रमणीय नन्दनवनमें देवताओंके साथ आनन्द करनेके बाद जब वहाँसे च्युत होता है तो भूमण्डलमें वैष्णव कुलमें जन्म पाकर वैष्णवोंके साथ ही निवास करता है और वहाँ भी भक्तिके साथ मेरे यशोगानमें संलग्न रहता है। फिर आयु समाप्त होनेपर शुद्ध अन्तःकरणवाला वह पुरुष मेरी कृपासे मेरे ही लोकमें चला जाता है।

पृथ्वी बोली— अहो, भक्ति-संगीतका कैसा विस्मयकारी प्रभाव है, अतः अब मैं सुनना चाहती हूँ कि इस गायनके प्रभावसे कितने पुरुष सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! वराहक्षेत्रमें मेरे मन्दिरके पास एक चण्डाल रहता था, जो मेरी भक्तिमें तत्पर रहकर सारी रात जगकर मेरा यश गाता रहता था। कभी वह सुदूर अन्य प्रदेशतक भ्रमण करते हुए मेरा भक्ति-संगीत गाता रहता। इस प्रकार उसने बहुत-से संवत्सर व्यतीत कर दिये।

एक समयकी बात है, कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीकी रातमें जब सभी लोग सो