भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५१

बड़ा रहस्यपूर्ण एवं गोपनीय है। इसे मैं कल प्रातः आपलोगोंको बतलाऊँगा। पिताजी! आज यह द्वादशी तिथि है। इस पुण्य अवसरपर दीक्षित योगियोंके कुलमें उत्पन्न तथा विष्णुकी भक्तिमें तत्पर रहनेवाले जो व्यक्ति दान करते हैं, वे भगवत्कृपासे भयंकर संसार-सागरको पार कर जाते हैं।'

वसुंधरे! इस प्रकार उन लोगोंमें परस्पर बात करते-करते मङ्गलमयी रात्रि समाप्त हो गयी और फिर दिन-रात्रिकी संधिका समय आ गया एवं सूर्यमण्डल उदित हुआ। तब वह बालक यथाविधि स्नानादिसे शुद्ध होकर रेशमी वस्त्र धारणकर शङ्ख-चक्र एवं गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीहरिको प्रणामकर माता-पिताके दोनों चरणोंको पकड़कर बोला—'महाभाग! पिताजी! जिस प्रयोजनसे हमलोग यहाँ आये हुए हैं तथा जो बात आप मुझसे बार-बार पूछ रहे हैं एवं जिस गोपनीय बातको इस 'सौकरवक्षेत्र' में कहनेके लिये मैंने प्रतिज्ञा की थी, उसे सुनें, वह प्रसङ्ग इस प्रकार है—"मैं पूर्वजन्ममें एक खञ्जरीट (खंडरिच) पक्षी था। एक बार मैं बहुत-से कीड़ोंको खाकर अजीर्ण-ग्रस्त होकर हिलने-डुलनेमें भी असमर्थ हो गया। उसी समय कुछ बालकोंने मुझे पकड़ लिया और खेल-खेलमें, एकके हाथसे दूसरे लेते रहे। एक कहता 'इसे मैंने देखा' और दूसरा कहता 'मैंने'। इस प्रकार वे आपसमें झगड़ने लगे। इसी बीच विवादसे ऊबकर एक बालकने मुझे घुमाकर गङ्गाके 'आदित्यतीर्थ' नामक स्थानपर जलमें फेंक दिया, जहाँ मेरे प्राण प्रयाण कर गये। यद्यपि मेरे मनमें कोई अभिलाषा न थी, फिर भी उस तीर्थके प्रभावसे मुझे आपलोगोंका पुत्र होनेका सौभाग्य मिला। इस प्रकार तेरह वर्ष पूरे हो चुके। यही वह गोपनीय बात थी, जिसे मैंने आपसे कह दी।"

इसपर माता-पिता पुनः बोले—'पुत्र! भगवान् विष्णुके बतलाये जितने कर्म हैं, उनमें तुम जिस-जिस कर्मको करोगे, उन्हें हम भी विधिपूर्वक सम्पन्न करेंगे।' शास्त्र कहते हैं कि 'घटमाला' कर्म संसारसे मुक्त करनेके लिये परम साधन है, अतः वे सभी कुछ दिनोंतक उसका आचरण करते हुए मेरी उपासनामें संलग्न रहे। पर्याप्त धर्मानुष्ठानके बाद उनका नश्वर शरीर छूट गया और वे अपने धर्मके प्रभावसे तथा मेरे क्षेत्रकी महिमासे संसारसे मुक्त होकर श्वेतद्वीपमें पधारे। जो लोग उनके साथ गये थे, वे योगमें निरत हो गये। उनके शरीरसे कमलके समान गन्ध निकलती थी। देवि! मेरे क्षेत्रके प्रसादसे वे भी यथायोग्य आनन्दका उपभोग करने लगे तथा इस क्षेत्रके प्रभावसे बहुत-से प्राणी पशुयोनिसे छूटकर श्वेतद्वीपमें पहुँच गये। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने दस आगे और दस पीछेके पुरुषोंको तार देता है। मूर्ख, पापी, शास्त्रनिन्दक और चुगलखोर व्यक्तियोंके सामने इसकी व्याख्या या पाठ नहीं करना चाहिये। ब्राह्मणोंके समाजमें अथवा अकेले एकान्त स्थानमें इसका अध्ययन करे; क्योंकि यह सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेके लिये परम साधन है। [अध्याय १३८]


भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—देवि! मेरे मन्दिरका गोमयसे लेपन करनेवालेको जो फल प्राप्त होता है, वह ध्यान देकर मुझसे सुनो। (मन्दिरको) लीपते हुए मनुष्य जितने पग चलता है, उतने हजार वर्षोंतक वह दिव्य लोकोंमें आनन्द करता है। देवि! यदि मेरा कोई भक्त व्यक्ति बारह वर्षोंतक मन्दिर लीपनेका कार्य करता है, तो वह धन और धान्यसे भरे-पूरे किसी शुद्ध एवं

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