भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १३८

हजारों माता-पिता, सैकड़ों पुत्र और स्त्रियाँ प्रत्येक जन्ममें आते-जाते रहते हैं। फिर वे किस-किसके हुए या हम ही किसके रहे? अतः माँ! इस प्रकारकी चिन्तामें पड़कर तुम्हें कभी भी सोच नहीं करना चाहिये।' पुत्रकी इस प्रकारकी बातें सुनकर माता और पिताको बड़ा आश्चर्य हुआ, अतः वे फिर बोले—'बेटा! अहो! यह तो बड़ी मार्मिक बात है। पुत्र! इसका रहस्य बतलाओ।' उनकी यह बात सुनकर वह वैश्यकुमार मधुर वाणीमें अपने माता-पितासे कहने लगा—'पूज्यवरो! यदि इस गुह्य बातको सुनकर और विचारकर आप कुछ कहना चाहते हैं तो आपको 'वराहक्षेत्र' का रहस्य पूछना चाहिये और उसे सुननेके लिये 'सौकरवक्षेत्र' में ही पधारनेकी कृपा कीजिये और वहीं यह गुह्य विषय आपलोगोंको पूछना समुचित होगा। वहीं मैं अपनी भी एक आश्चर्यकारी बात बतलाऊँगा। पिताजी! 'सौकरवक्षेत्र'में एक 'सूर्य' तीर्थ है। वहाँ पहुँच जानेपर यह बात बतलाऊँगा।' इसपर दम्पतीने पुत्रसे कहा—'बहुत अच्छा।'

फिर उस बालकके माता-पिता दोनोंने सौकरवतीर्थमें जानेका संकल्प किया। उन्होंने सब प्रकारके द्रव्य साथमें लिये और 'सौकरवतीर्थ'के लिये चल पड़े। कमलपत्रके समान बड़े-बड़े नेत्रोंवाले उस वैश्योंके नेताने अपने जानेके पहले बीस हजार गायोंको ही सबसे आगे हँकवाया, फिर उसके सभी परिजन द्रव्योंसहित प्रस्थित हुए। उनके घरमें जो कुछ था, सब कुछ उन्होंने भगवान् नारायणको समर्पित कर दिया। फिर माघमासकी त्रयोदशी तिथिके दिन पूर्वाह्न-कालमें अपने सभी स्वजनों और सम्बन्धियोंको बुलाकर विधिपूर्वक शुभ मुहूर्तमें उसने स्वयं भी यात्रा कर दी। 'भगवान् नारायणका दर्शन होगा' इससे उनके मनमें बड़ा हर्ष था। श्रीहरिके प्रेममें प्रवाहित वे सभी लोग बहुत समयके पश्चात् वैशाखमासकी द्वादशी तिथिके दिन मेरे क्षेत्रमें आ गये। वहाँ पहुँचनेपर सभीने विधिपूर्वक स्नानकर पितरोंका तर्पण किया। उस वैश्यने दिव्य वस्त्रोंसे विभूषित बीस हजार गौओंको साथ ले लिया था और उन्हें भाङ्गुरस नामक व्यक्तिको सौंपकर आगे प्रस्तुत कर रखा था। उनमेंसे बीस गायोंको वहीं दान कर दिया। इसी प्रकार वह प्रतिदिन बहुत-से धन और रत्न दानमें बाँटने लगा।

इस प्रकार अपने स्त्री-पुत्र और स्वजनोंके साथ उसके वहाँ रहते-रहते सभी (सस्य—) धान्य-पौधोंको संवर्धन और पालन करनेवाली 'वर्षा-ऋतु' आ गयी, जिससे कदम्ब, कुटज (कौरैया) और अर्जुन नामके वृक्ष पुष्पित हो गये। नदियोंके गर्जन, मोरोंके मधुर स्वर, कौरैया, अर्जुन और कदम्ब आदि वृक्षोंकी सुखद गन्ध और भौरोंका गुञ्जन, पवनका प्रवाह—यह सब उस ऋतुकी विशेषता थी। फिर शरद् ऋतुका प्रवेश हुआ और अगस्त्य-नक्षत्रका उदय हुआ। तड़ागोंके जलमें स्वच्छता आ गयी और उनमें कमल, कुमुद आदि पुष्प खिल गये। अन्य सुरम्य कमल-फूलोंसे भी सर्वत्र शोभाकी वृद्धि होने लगी। अब शीतल, सुगन्ध एवं परम सुखदायी वायु बहने लगी। फिर धीरे-धीरे यह ऋतु भी समास हो चली और कार्तिक महीनेके शुक्ल-पक्षकी एकादशी तिथि आयी। सुभ्रु! उस समय उस वैश्य दम्पतीने स्नानकर, रेशमी वस्त्र धारण किया और अपने पुत्रसे कहा—'पुत्र! हमलोग यहाँ छः महीने सुखपूर्वक रह चुके। आज द्वादशी तिथि आ गयी है, अब वह गोपनीय बात हमलोगोंको तुम क्यों नहीं बताते, जिसे तुमने यहाँ आकर बतानेको कहा था?'

देवि! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा पुत्रने उनसे मधुर वचनोंमें कहा—'महाभाग! आपने जो बात पूछी है, वह प्रसङ्ग

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