वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव २४९
बहुत-सी सुन्दरी भली कन्याओंको भी विवाह-विधिके द्वारा तुम्हें प्राप्त करा सकते हैं। सौम्य! यदि तुम्हारे मनमें जैसे पूर्वके वैश्यलोग वेदमें कहे हुए विधानके अनुसार यज्ञ करते थे—वैसे यज्ञकी इच्छा हो तो तुम उसे भी कर सकते हो। वैश्यका कर्म खेती है। इसके लिये आठ-आठ बलवान् बैलोंद्वारा चलनेवाले एक सौ हल भी हमारे पास हैं। फिर तुम और क्या पाना चाहते हो? जितने ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तुम तृप्त करना चाहते हो, यह कार्य तथा अन्य कुछ कार्य भी जैसे चाहो, वह सब स्वेच्छानुसार सम्पन्न कर सकते हो।'
वसुंधरे! अपने माता-पिताकी बात सुनकर उस धर्मात्मा बालकने उनके चरण पकड़ लिये और उनसे कहने लगा—गोदानसे इस समय मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, न मित्रोंके विषयमें ही मुझे कोई चिन्ता है। मुझे विवाह या यज्ञके फल भी अभीष्ट नहीं हैं। मैं व्यापारका काम करूँ, खेती और गोरक्षामें मेरा समय व्यतीत हो अथवा सम्पूर्ण अतिथियोंका सत्कार करूँ—इन बातोंके लिये भी मेरे हृदयमें कोई आसक्ति नहीं। पिताजी! मेरे मनमें तो बस, भगवान् नारायणके क्षेत्र 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-की ही एक प्रगाढ़ चिन्ता है।
देवि! बालकके माता-पिता दोनों ही मेरे उपासक थे, उन्होंने पुत्रकी यह बात सुनी तो वे दोनों ही दुःखमें भरकर करुण विलाप करने लग गये और कहने लगे (माता कहती है)—'बेटा! अभी तुम्हें जनमे केवल बारह वर्ष ही बीते हैं, वत्स! भगवान् नारायणकी शरणमें जानेकी चिन्ता तुम्हें अभीसे कैसे हो गयी? जिस समय तुम्हें उसके योग्य आयु प्राप्त होगी, तब उस विषयमें विचार करना। अभी तो मैं भोजन लेकर तुम्हारे पीछे-पीछे दौड़ती चलती हूँ। पुत्र! तुम 'सौकरव' (वराहक्षेत्र)-में जानेकी बात अभी क्यों सोचते हो? तुम तो अभी दुधमुँहे बच्चे हो। मेरे स्तन धन्य हैं, जिससे सदा दूध स्रवित होता है (और तुम उसे पीते हो)। बेटा! तुमने अपने स्पर्शसुखकी आशा लगानेवाली मुझ माँके प्रति यह क्या सोचा? जब तुम रातमें सोकर करवटें बदलते हो तो उस समय अब भी मुझे 'माँ-माँ' कहकर पुकारते हो। फिर (वराहक्षेत्र जाने तथा नारायणके आश्रमकी) इस प्रकारकी बातें क्यों सोचते हो? तुम जब खेलते हो तो अन्य स्त्रियाँ भी बड़े स्नेहसे तुम्हारा स्पर्श करती हैं। वत्स! किसीने भी कहीं खेलमें, घरपर अथवा अपने परिजनमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं किया, नौकरोंने तुम्हें कोई कटु वचन नहीं कहे। तुम्हें डरवानेके लिये भी मैंने कभी अपने हाथमें छड़ी नहीं ली। फिर पुत्र! तुम्हारे इस निर्वेद (वैराग्य)-का कारण क्या है?'
वसुंधे! माताकी यह बात सुनकर उस बालकने उससे मधुर वचनोंमें कहा—'माँ! मैं तुम्हारे गर्भमें रह चुका हूँ, तुम्हारे उदरसे ही मेरा जन्म हुआ है, तुम्हारी गोदमें खेला हूँ, प्रेमसे मैंने तुम्हारे स्तनोंका पान किया है। धूल लगे हुए शरीरसे तुम्हारी गोदमें बैठा हूँ। मातः! तुम मुझपर जो इतनी करुणा करती हो, यह तुम्हारे लिये उचित ही है, किंतु मेरी पूजनीया माँ! तुम अब पुत्र-सम्बन्धी मोहका परित्याग करो। यह संसार एक घोर महा-सागरके समान है। यहाँ प्राणी आते हैं और चले जाते हैं, कुछ लोग तो चले गये और कुछ लोग जा रहे हैं। कोई जीव दीखता है, फिर वह नष्ट हो जाता है और आगे कभी दिखायी नहीं पड़ता। इस प्रकार कौन किससे जनमा, कहाँ उसका सम्बन्ध हुआ, किसकी कौन माता हुई और कौन किसका पिता हुआ, इसका कोई ठिकाना नहीं।