भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२४८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १३८

हो जाता है; अतः निःसंदेह यह क्षेत्र बहुत पवित्र है। प्रभो! अब आप वहाँका कोई दूसरा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। देवेश्वर! मैं यह जानना चाहती हूँ कि शास्त्रोंमें वहाँ गायन-वादन करने, नृत्य एवं जागरण करने, गोदान, अन्नदान और जलदान करने, सम्यक् प्रकारसे स्नान करने अथवा गन्ध, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य आदिसे आपकी पूजा करनेका क्या फल होता है? जप और यज्ञ आदि अन्य कर्म करनेसे शुद्ध मनवाले प्राणी वहाँ किस गतिको प्राप्त करते हैं? भगवन्! आप अपने भक्तको सुख पहुँचानेके विचारसे यह सब प्रसङ्ग बतलानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले—देवि! यह कथा अत्यन्त पुण्यप्रद एवं सुख देनेवाली है। पहले इसी सौकरव-क्षेत्रमें एक खञ्जरीट* (खञ्जन, खंडरिच, wagtail) पक्षी रहता था। उसने एक बार बहुत-से कीड़ोंको खा लिया, फलतः वह अजीर्णसे अत्यन्त पीड़ित होकर मरणासन्न हो गया और इस 'सूकरक्षेत्र' में ही गिर पड़ा। इतनेमें ही बहुत-से बालक इधर-उधरसे दौड़ते एवं खेलते हुए वहाँ पहुँचे और उस शिथिलगात्र पक्षीको देखकर कहने लगे—'हमलोग इसे पकड़ेंगे।' फिर उनमें परस्पर विवाद छिड़ गया, कोई कहता 'यह मेरा है' और कोई कहता कि 'मेरा।' इस प्रकार खेल-खेलमें ही उनमें झगड़ा होने लग गया और महान् कलह-कोलाहल मच गया। तबतक एक बालकने उसे उठाकर गङ्गाके जलमें फेंक दिया, साथ ही कहा—'भाई! यह तुम्हीं लोगोंका है, इससे मेरा कोई प्रयोजन नहीं है।'

वसुंधरे! इस प्रकार वह मृत खञ्जरीट (खंडरिच) पक्षी गङ्गाके जलसे भलीभाँति भीग गया। जहाँ वह गङ्गामें पड़ा था, वह 'आदित्यतीर्थ' था। फिर तो वह उस तीर्थके प्रभावसे अनेक उत्तम यज्ञ करनेवाले धन एवं रत्नसे परिपूर्ण किसी वैश्यके घरमें उत्पन्न हुआ। वसुंधरे! वह रूपवान्, गुणवान्, विवेकी, पवित्र तथा मुझमें भक्ति रखनेवाला पुरुष हुआ।

सुव्रते! इस प्रकार उस बालकके बारह वर्ष बीत गये। एक बार जब माता और पिता सुखसे बैठे हुए थे, उनपर उस गुणी बालककी दृष्टि पड़ी। उसने पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम करके कहा—'पिताजी! यदि आपलोग मेरा प्रिय करना चाहते हों तो मुझे एक वर देनेकी कृपा करें। मेरी प्रार्थना यह है कि आप दोनों मेरे मनोरथमें किसी प्रकारकी बाधा न डालें। पिताजी! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ, आप मेरे गुरु हैं, जैसा आप कहेंगे वही होगा।'

देवि! अपने पुत्रकी यह बात सुनकर दम्पती हर्षसे भर गये और उन्होंने सुन्दर नेत्रोंवाले बालकसे यह बात कही—'पुत्र! तुम जो-जो कहोगे और जो कुछ तुम्हारे हृदयमें बात हो, हमलोग वह सब कर देंगे। बस, अब तुम विश्वासपूर्वक बोलो। पुत्र! हमारी तीन हजार गायें हैं, जो सभी खूब दूध देती हैं। तुम जिसे चाहो, उसे इन्हें दे सकते हो, इसमें लेशमात्र विचारनेकी आवश्यकता नहीं है। यदि तुम चाहो तो हमारा व्यापारका काम बहुत विख्यात है, उसका भी सारा अधिकार तुम्हें सौंप दूँ। तुम न्यायपूर्वक उसकी व्यवस्था करो अथवा मित्रोंको धन बाँट दो। पुत्र! तुम धन-धान्य, रत्न आदि जिसे जो भी चाहो, उसे दे सकते हो, इसमें कोई भी प्रतिबन्ध नहीं है। हम अच्छे कुल तथा जातिमें उत्पन्न


* इसे 'ममोला' या 'धोबिन'-चिड़िया भी कहते हैं। गोस्वामीजीने 'कृष्णगीतावली' २२।२ के 'मनहुँ इन्दुपर 'खंजरीट' दोऊ कछुक करुन विधि रचे सँवारी'—पदम 'खञ्जरीट' का तथा मानस २।१९६।७, ३।२९।१० और ४।१५।६ तथा 'विनयपत्रिका' १५।२ आदिमें 'खंजन' शब्दका प्रयोग किया है।