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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १३८ ] वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव [ २४७

भाग्यशालिनी हो। सुनो! जिन मनुष्योंने पूर्वजन्ममें सद्धर्मोंका पालन किया है, पर किसी बुरे कर्मके दोषसे पशुकी योनिमें जन्म पा जाते हैं, वे किन्हीं अन्य जन्मोंके उपार्जित पुण्यों तथा तीर्थ-स्नान, जप एवं महान् दान तथा देवार्चनोंके प्रभावसे ही भले तीर्थमें मरनेका संयोग प्राप्त करते हैं।

तीर्थोंके दर्शन एवं अवगाहन करनेके प्रभावसे पाप नष्ट हो जाते हैं। वस्तुतः धर्मानुमोदित इस वराहक्षेत्र-कर्मकी गति बड़ी गहन है। उसके प्रभावसे जो बहुत छोटा-सा दीखता है, वह बहुत बड़ा बननेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है और उसे अद्भुत पुण्यकी प्राप्ति होती है। इसीसे उस शृगाली एवं गीधको मनुष्ययोनि एवं साम्राज्यकी प्राप्ति हुई थी और उन्हें जन्मान्तरकी भी स्मृति बनी रही। यह सब इस तीर्थका ही प्रभाव है और अन्तमें वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए।

देवि! अब अन्य तीर्थकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनो। यहाँ एक 'वैवस्वत' नामका तीर्थ है, जहाँ पुत्रकी कामनासे कभी सूर्यदेवने कठोर तपस्या की थी और बादमें उन्होंने वहाँ दस हजार वर्षोंतक निरन्तर चान्द्रायण-व्रत भी किया था, फिर सात हजार वर्षोंतक वे मात्र वायुके आहारपर रहे। भद्रे! तब मैं उनपर संतुष्ट हुआ और उनसे वर माँगनेके लिये कहा। इसपर उन्होंने कहा—'भगवन्! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे एक पुत्र प्रदान करनेकी कृपा कीजिये।

फिर मेरे वरदानसे 'यम' और 'यमुना' नामकी उन्हें दो जुड़वीं संतानें हुईं। तबसे 'सौकरव' क्षेत्रके अन्तर्गतका यह तीर्थ 'वैवस्वततीर्थ' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वसुंधरे! जो मनुष्य वहाँ जाकर दिनके आठवें भागमें अर्थात् सूर्यास्तके कुछ पूर्व स्नानकर भोजन करता है, वह दस हजार वर्षोंतक सूर्यके लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। यदि किसी प्राणीकी वहाँ अनायास मृत्यु हो जाती है तो वह इस तीर्थके प्रभावसे यमपुरीमें नहीं जाता। भद्रे! इस 'सौकरव' तीर्थ (वराहक्षेत्र)-में स्नान करने और मरनेका फल तथा वहाँकी घटनाएँ मैंने तुम्हें बतला दीं। यह आख्यान भी आख्यानोंमें महान् तथा पवित्रोंमें परम पवित्र 'आख्यान' है तथा यह सौकरव-तीर्थोंमें परम श्रेष्ठ तीर्थ है। यहाँ संध्योपासन तथा जप-तप-अनुष्ठानके फल परम उत्तम हैं। यह परम तेज एवं सभी भागवत पुरुषोंका परम प्रिय रहस्य है। जिसे दूसरोंकी निन्दा करनेका स्वभाव है एवं जो अज्ञानी हैं, उनके सामने इसका उपदेश नहीं करना चाहिये। जिनकी भगवान्में श्रद्धा है, जो वेदज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दीक्षा ले रखी है, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंको जानते हैं, उन्हीं लोगोंके सामने यह दिव्य प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। यह सौकरव-क्षेत्रमें प्राप्त होनेवाला महान् पुण्य तुमसे बतला दिया। पृथ्वि! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर इसका पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक मेरा ध्यान कर लिया, इसमें कोई संदेह नहीं है, उसे शाश्वत मुक्ति सुलभ हो जाती है। जो इसके केवल एक अध्यायका भी पाठ कर लेता है, वह अपने दस कुलोंको तार देता है। [अध्याय १३७]


वराहक्षेत्रान्तर्वर्ती 'आदित्यतीर्थ' का प्रभाव (खञ्जरीटकी कथा)

सूतजी कहते हैं—भगवान् वराहके मुखारविन्दसे वराहक्षेत्रकी महिमा, गुणस्तुति और जात्यन्तर-परिवर्तनकी शक्ति सुनकर पृथ्वीदेवीका हृदय आश्चर्यसे भर गया, अतः उन्होंने भगवान् नारायणसे कहा—प्रभो! 'वराहक्षेत्र' में मरा हुआ प्राणी न चाहनेपर भी मनुष्य-जन्म पानेका अधिकारी