वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २४६ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १३७ |
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वस्त्र धारणकर अलंकारोंसे अपने शरीरको आभूषित किया तथा भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। फिर राजकुमारीने अपने अलंकारोंको उतारकर मुझे (विष्णु-वराहको) अर्पण कर दिया तथा उस नरेशसे बोली—'नाथ! आइये! हम दोनों एकान्त स्थानपर चलें। आपके मनमें जिस गोपनीय बातको जाननेकी इच्छा है, उसे समझें।'
तत्पश्चात् कलिङ्गनरेश और काञ्ची-राजकुमारी एकान्त स्थानमें गये। फिर राजकुमारीने कहा—'राजन्! मैं पूर्वजन्ममें एक शृगाली थी, मेरा जन्म तिर्यक्-योनिमें हुआ था। मृगके भ्रमसे सोमदत्त नामक एक राजकुमारने बाण चलाया और मैं उससे बिंध गयी। मेरे सिरमें अब भी उस तीखे बाणके चिह्न (संस्कार) अवशेष हैं, आप इसे देखनेकी कृपा कीजिये। उसीके दोषसे मेरे सिरमें यह रोग सदा बना रहता है। काशीनरेशके कुलमें मेरा जन्म हुआ। फिर संयोग तथा अपने पिताजीकी कृपासे मैं आपकी पत्नी बन गयी हूँ। सौकरक्षेत्रके प्रभावसे मेरा ऐसा जन्म हुआ है और सिद्धि सुलभ हुई है। प्राणनाथ! आपको मेरा प्रणाम है।' यह कहकर फिर वह चुप हो गयी।
अब राजकुमारको भी अपने पूर्वजन्मकी स्मृति हो आयी। वह कहने लगा—'महाभागे! देखो, मैं भी पूर्वजन्ममें एक गीध था। उसी सोमदत्तने एक बाणद्वारा मुझे भी मार डाला था। इस तीर्थके परिणामस्वरूप मैं कलिङ्गदेशका राजा बना हूँ। मुझे बहुत कष्टका सामना करना पड़ता था। पर वही आज मैं महान् राज्यका अधिकारी बन गया था। सुशोभने! आज सिद्धि भी मेरे हाथमें आ गयी है। देखो, मेरे मनमें कोई भी संकल्प नहीं था, फिर भी सूकरक्षेत्रकी ऐसी महिमा है।'
वसुंधरे! इसके बाद वे दोनों दम्पती तथा वहाँ जो भी नगर-ग्रामनिवासी मेरे भक्त एवं प्रेमी उपस्थित थे, वे सभी यह प्रसङ्ग सुनकर हानि-लाभका विचार छोड़कर सर्वथा शुभ ध्यानमें संलग्न हो गये और वहीं प्राण त्यागकर आसक्तियोंसे शून्य होकर चतुर्भुज-रूप धारणकर शङ्ख, चक्रादि आयुधोंसे सज्जित होकर श्वेतद्वीप पहुँचे।
जो व्यक्ति इस प्रकार नियमके अनुसार इस तीर्थमें निवास करता है और उसकी वहाँ मृत्यु हो जाती है तो वह श्वेतद्वीपको अवश्य प्राप्त कर लेता है। वसुंधरे! यहीं एक आखेटक तीर्थ है। उसमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वह सुनो। यहाँ स्नान करनेवाले प्राणी नन्दनवनमें पहुँचकर ग्यारह हजार वर्षोंतक निरन्तर परमानन्दका उपभोग करते हैं। फिर जब वे स्वर्गसे च्युत होते हैं तो विशाल कुलमें उत्पन्न होकर मेरे भक्त होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। एक बात और, जो कोई मनुष्य यहाँके 'गृध्रवटनामक' तीर्थमें स्नान करता और संध्या, तर्पण आदि कर्म करता है, वह जो फल प्राप्त करता है, वह बतलाता हूँ। वह इस पुण्यके प्रभावसे नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक इन्द्रलोकमें पहुँचकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। फिर जब वह इन्द्रलोकसे च्युत होता है तो मेरे इस तीर्थके प्रभावसे वह मेरा भक्त बन जाता है और उसकी सारी आसक्तियाँ दूर हो जाती हैं।
भगवान् नारायणसे ऐसा सुनकर उत्तम व्रतका आचरण करनेवाली देवी पृथ्वी समस्त लोकोंके स्वामी भगवान् जनार्दनसे मधुर वचनोंमें बोली—'देव! किस कर्मके फलस्वरूप प्राणीको यह तीर्थ प्राप्त होता है अथवा वहाँ स्नान करने और मरनेका कैसे संयोग प्राप्त होता है, इसे यथार्थरूपसे कहनेकी कृपा कीजिये।
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! तुम महान्