भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 256

अध्याय १३७ ] वराहक्षेत्रकी महिमाके प्रसङ्गमें गीध और शृगालका वृत्तान्त २४५

डालते हैं, बालकोंका वध करते हैं तथा स्त्रीकी हत्या करनेमें नहीं हिचकते, ऐसे व्यक्ति दण्डके पात्र हैं। कोई भी सुन्दर स्त्री सामने आ जाय तो तुम्हें आँखें मूँद लेनी (कुदृष्टि नहीं डालनी) चाहिये। दूसरोंके अर्जित धनके प्रति तुम्हें लोभ नहीं करना चाहिये और न अन्यायसे ही धन कमाना चाहिये। तुम्हें न्यायपूर्वक पूरी तैयारी तथा दक्षतासे अपने देशकी रक्षा करनी चाहिये। तुम सदा उद्योगशील होकर तत्पर रहना और मन्त्रियोंकी मन्त्रणाका पालन करना, वे जो बात बतायें, उन्हें विचारपूर्वक करना। अपने शरीरकी रक्षापर पूरा ध्यान देना है। बेटा! यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहते हो तो तुम्हारे जिस व्यवहारसे प्रजा आनन्दसे रहे एवं ब्राह्मण जिससे संतुष्ट रहें, तुम्हें वही कर्म करना चाहिये। राजाओंके लिये सात प्रकारके महान् व्यसन कहे गये हैं—उनसे तुम्हें सदा दूर रहना चाहिये। तुम्हारी सम्पत्तिमें किसी प्रकार दोष आ जाय, ऐसा काम तुम्हें कभी भी नहीं करना चाहिये। राज्यकर्मके सम्बन्धमें अपने मन्त्रीसे तुम्हें किसी प्रकार अप्रिय वचन नहीं कहना चाहिये। मैं इस समय तीर्थमें जानेके लिये प्रस्तुत हूँ, तुमको मुझे रोकना नहीं चाहिये। पुत्र! यदि मुझे प्रसन्न करना चाहते हो तो इतना काम करनेके लिये शीघ्र उद्यत हो जाओ।'

पृथ्वीदेवि! उस समय पिताकी बात सुनकर राजकुमारने उनके पैर पकड़ लिये और उनसे करुणापूर्वक वचन कहना आरम्भ किया। राजकुमारने कहा—'पिताजी! आप यदि यहाँ नहीं रहेंगे तो राज्य, खजाना और सेनासे मुझे कोई प्रयोजन नहीं है। आपके बिना मैं जीवित नहीं रह सकता। भले ही आपने अभिषेक करके मुझे राजा बना दिया। पर पिताजी! मैं तो केवल बालकोंके खेल ही जानता हूँ। राजालोग जिस प्रकार राज्यकी व्यवस्था करते हैं, उन सभीसे तो मैं सर्वथा अनभिज्ञ हूँ।'

अपने पुत्रकी बात सुनकर राजाने उससे सामपूर्वक कहा—'पुत्र! तुम जो कहते हो कि 'मैं कुछ नहीं जानता' तो इस विषयमें तुम्हारे मन्त्री एवं नगरके रहनेवाले सत्पुरुष सब कुछ बता देंगे।' देवि! उस समय अपने पुत्रको इस प्रकारका उपदेश देकर कलिङ्गनरेश धर्मशास्त्रकी विधिके अनुसार 'सौकरव (वराह) क्षेत्र' में जानेके लिये तैयार हो गया। उसे वहाँ जाते देखकर वहाँके रहनेवाले लोग भी अपनी स्त्री तथा पुत्रोंके सहित सब-के-सब पीछे चल पड़े। इतना ही नहीं, अन्तःपुरकी स्त्रियाँ भी बड़ी प्रसन्नतासे हाथी, घोड़े, रथ आदि सवारियोंपर चढ़कर उसके पीछे-पीछे चल पड़ीं।

इस प्रकार वह कलिङ्गराज बहुत समयके पश्चात् 'सौकरव' तीर्थमें पहुँचा और वहाँ पहुँचकर धन-धान्यका यथोचित दान किया और इस प्रकार धर्म करते हुए धीरे-धीरे समय बीतता गया। इस प्रकार कुछ दिन बीत जानेके पश्चात् राजाने अपनी पत्नीसे यह मधुर वचन कहा—'सुन्दरि! आज मेरे जीवनके हजार वर्ष पूरे हो गये। अब मैंने तुमसे जो पूछा था, उस परम गोपनीय विषयको मुझे बताओ।' इसपर वह राजकुमारी राजाके दोनों चरणोंको पकड़कर बोली—'मानद! महाभाग! आप मुझसे जो बात पूछ रहे हैं, उसे तीन रातोंतक उपवास करनेके बाद आप सुननेकी कृपा करें।' उसने पत्नीकी बातका अनुमोदन किया और कहा—'कमलनयनि! तुम जैसी बात कहती हो, वह मुझे पसंद है। फिर स्नानकर तीन राततक नियमपूर्वक रहनेके लिये संकल्प किया। तदनन्तर तीन राततक नियमपूर्वक रहकर दम्पतीने स्नान किया और पवित्र रेशमी