भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १३९ ] भगवान्‌के मन्दिरमें लेपन एवं संकीर्तनका माहात्म्य २५५


तुम्हें ब्रह्मराक्षस होना पड़ा है। तुम मुझे बताओ।'

ब्रह्मराक्षस बोला—'मैं पूर्वजन्ममें चरकगोत्रीय सोमशर्मा नामका एक यायावर ब्राह्मण था। मुझे यद्यपि वेदके सूत्र और मन्त्र कुछ भी ठीक-ठीक ज्ञात न थे, फिर भी यज्ञादि कर्म करानेमें लगा रहता था। लोभ और मोहसे आकृष्ट होकर फिर मैं मूर्खोँका पौरोहित्य करने लगा—उनके यज्ञ, हवन आदिका कार्य कराने लगा। एक समयकी बात है कि जब मैं संयोगवश एक 'पाञ्चरात्र' संज्ञक यज्ञ करा रहा था कि इतनेमें ही मुझे उदरशूल उत्पन्न हुआ और मेरे प्राण निकल गये। उसकी पूर्णाहुति नहीं हुई। अतः मेरी यह स्थिति हुई है। उस दूषित कर्मके प्रभावसे ही मैं ब्रह्मराक्षस हो गया। मैंने उस यज्ञमें मन्त्रहीन, स्वरहीन और नियमविरुद्ध प्राग्वंश* आदिकी स्थापना की थी, हवन भी अविधिपूर्वक ही कराया। उसी कर्म-दोषके परिणामस्वरूप मुझे यह राक्षसी योनि प्राप्त हुई है। अब तुम अपने गीतका फल देकर मेरा उद्धार करो। विष्णुगीतके पुण्यद्वारा अब मुझ अधमको शीघ्र ही इस पापसे मुक्त कर दो।'

देवि! वह चण्डाल एक उत्तमव्रती व्यक्ति था। उसने ब्रह्मराक्षसकी बात सुनकर उसके वचनोंका सहर्ष अनुमोदन किया, साथ ही बोला—'राक्षस! यदि मेरे गीतके फलसे तुम शुद्धमना एवं क्लेशमुक्त हो सकते हो तो लो, मैंने अत्यन्त सुन्दर स्वरोंसे जो सर्वोत्कृष्ट गान किया है, उसीका फल मैं तुम्हें प्रदान करता हूँ। जो पुरुष श्रीहरिके सामने इस भक्ति-संगीतका गान करता है, वह लोगोंको अत्यन्त कठिन परिस्थितियोंसे भी तार देता है।' ऐसा कहकर उस चण्डालने उस गीतका फल ब्रह्मराक्षसको दे दिया। भद्रे! फलतः वह ब्रह्मराक्षस तत्काल एक दिव्य पुरुषके रूपमें परिवर्तित हो गया। ऐसा जान पड़ता था, मानो वह शरद्-ऋतुका चन्द्रमा हो। मेरे गुणयुक्त गीतोंका फल अनन्त है। देवि! यह मैंने भक्ति-संगीतके गायनके श्रेष्ठ फलका वर्णन कर दिया, जिस गीतके एक शब्दके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरसे तर जाता है।

अब जो वाद्यका फल होता है, उसे बताता हूँ, इसकी सहायतासे वसिष्ठने देवताओंसे शबला गौको प्राप्त किया था। (शम्पा) झाँप और ताल अथवा इनके संयोग-प्रयोगसे मनुष्य नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक कुबेरके भवनमें जाकर इच्छानुसार आनन्दका उपभोग करता है। फिर वहाँसे अवकाश मिलनेपर झाँप और तालोंसे सम्पन्न होकर स्वतन्त्रतापूर्वक मेरे लोकोंमें पहुँच जाता है। अब जो मनुष्य मेरी आराधनाके समय नृत्य करता है, उसका पुण्य कहता हूँ, सुनो। इसके फलस्वरूप वह संसार-बन्धनको काटकर मेरे लोकको प्राप्त करता है।

जो मानव जागरण करके गीत और वाद्यके साथ मेरे सामने नृत्य करता है, वह जम्बूद्वीपमें जन्म पाकर, राजाओंका भी राजा होता है और सम्पूर्ण धर्मोंसे सम्पन्न होकर वह सम्पूर्ण पृथ्वीका रक्षक होता है। मेरा भक्त मुझे पुष्प और उपहार अर्पणकर मेरे लोकको प्राप्त होता है। वसुंधरे! जो सत्कर्मके पथपर पैर रखकर मेरी उपासना करता है तथा जो पुष्पोंको लाकर मेरे ऊपर चढ़ाता है, वह महान् उत्तम कर्मका सम्पादन कर लेता है, अतः वह मेरे लोकमें जानेका अधिकारी हो जाता है। वसुंधरे! जो मनुष्य प्रातःकाल


* 'प्राग्वंशशाला'—यह वेदीके पूर्व ओरमें बनी हुई पत्नी-शाला है, जिसमें घरके स्त्री, बच्चे आदि बैठते हैं। भागवत (४।५।१४)-की टीकामें अधिकांश व्याख्याताओंने इसे यज्ञशालाका बाँस माना है, पर वह ठीक नहीं लगता। द्रष्टव्य—श्रौतकोश भाग ३, 'श्रौतपदार्थनिर्वचनम्' ३।१३—१५।