भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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२५६संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १४०

उठकर इसका पाठ करता है, वह अपने पूर्वकी दस तथा आगे होनेवाली दस पीढ़ियोंको तार देता है। मूर्खों एवं निन्दकोंके सामने इसका प्रवचन नहीं करना चाहिये। यह धर्मोंमें परम धर्म और क्रियाओंमें परम क्रिया है। शास्त्रकी निन्दा करनेवाले व्यक्तिके सामने कभी भी इसका कथन नहीं करना चाहिये। जो मुझमें श्रद्धा रखते हैं तथा जिनमें मुक्तिकी अभिलाषा है, उनके सामने ही उसका पठन-पाठन करना चाहिये।

[ अध्याय १३९ ]


कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य

पृथ्वी बोली— भगवन्! आपने जिन तीर्थोंके माहात्म्यका वर्णन किया है, उन्हें मैं सुन चुकी। अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि आप सगुण-साकार विग्रह धारणकर सदा किस क्षेत्रमें सुशोभित होते हैं; जहाँ आपका उत्तम कर्म सम्पादनकर श्रेष्ठ गति प्राप्त की जाय?

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! कोकामुख-^१ तीर्थका नाम तो मैं तुम्हें पहले बता ही चुका हूँ, जो गिरिराज हिमालयकी तलहटीमें स्थित है। इसके अतिरिक्त दूसरा लोहार्गल^२ नामका एक स्थान है, जिसे मैं एक क्षण भी नहीं छोड़ता। ऐसे तो ज्ञानकी दृष्टिसे चर-अचर सारा जगत् मुझसे व्याप्त है और कोई भी स्थान मुझसे रिक्त नहीं, किंतु जो लोग मेरी गूढ़ गतिको जानना चाहते हैं, वे मेरी आराधनामें लगनेकी इच्छासे यथाशीघ्र 'कोकामुख' जानेका प्रयल करें।

धरणीने पूछा— जगत्प्रभो! जब आप सर्वत्र रहते हैं, तो आप 'कोकामुख' क्षेत्रको ही कैसे श्रेष्ठ बतलाते हैं?

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! 'कोकामुख' क्षेत्रसे बढ़कर कोई भी स्थान मेरे लिये श्रेष्ठ, पवित्र, उत्तम या प्रिय नहीं है। जो व्यक्ति 'कोकामुख' क्षेत्रमें पहुँच गया, वह पुनः इस संसारमें जन्म नहीं पाता। 'कोकामुख' क्षेत्रके समान दूसरा कोई स्थान न हुआ, न आगे होगा। वहाँ मेरी मूर्तिकी गुप्तरूपसे निवास है।

पृथ्वी बोली— देवेश्वर! आप सर्वोपरि देवता हैं। भक्तोंको अभय प्रदान करना आपका स्वाभाविक गुण है। अब इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जितने गोपनीय स्थान हैं, उन्हें मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह कहते हैं— देवि! जहाँ इसमें मुख्य पर्वतसे सदा जलकी बूँदें भूमिपर गिरती हैं, उस स्थानको 'जलबिन्दु' तीर्थ कहते हैं। वहाँ पृथ्वीपर मूसलकी तुलना करनेवाली पर्वतसे एक धारा गिरती है, जिसका नाम 'विष्णुधारा' है। जो वहाँ मात्र एक दिन-रात उपवासकर यत्नपूर्वक स्नान करता है, उसे एक हजार 'अग्निष्टोम-यज्ञों' के अनुष्ठान करनेका फल प्राप्त होता है और उसकी बुद्धिमें कर्तव्यनिर्धारणमें कभी व्यामोह नहीं होता। फिर अन्तमें वह 'विष्णुधारा' के तटपर ही मरनेका सौभाग्य प्राप्तकर नित्य मेरी इस मूर्तिक दर्शन करता रहता है, इसमें कोई संशय नहीं। उस 'कोकामुख' क्षेत्रमें एक 'विष्णुपद' नामका स्थान है। वसुंधरे! वहाँ भी मेरी मूर्ति है, किंतु इस रहस्यको कोई नहीं जानता। देवि! जो व्यक्ति वहाँ स्नानकर एक रात निवास करता है, वह मुझमें श्रद्धा रखनेवाला व्यक्ति 'क्रौञ्च' द्वीपमें जन्म पाता है और अन्तमें जब प्राणोंका त्याग


१. देखिये पृष्ठ १९७ और उसकी टिप्पणी।
२. द्रष्टव्य-अध्याय १५१ तथा पृष्ठ २६४ की टिप्पणी।