वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १४० ] कोकामुख-बदरी-क्षेत्रका माहात्म्य २५७
करता है, तब आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
इसी 'कोका' मण्डलमें 'चतुर्धारा' नामक एक स्थान है। वहाँ ऊँचे पर्वतसे धाराएँ गिरती हैं। जो मानव पाँच राततक निवास करते हुए वहाँ स्नान करता है, वह कुशद्वीपमें निवास करनेके पश्चात् मेरे लोकमें स्थान पाता है। कर्मफलको सुखमें परिवर्तित करनेवाला यहाँ एक 'अनित्य' नामक प्रसिद्ध क्षेत्र है, जिसे देवतालोग भी जाननेमें असमर्थ हैं, फिर मनुष्योंकी तो बात ही क्या? श्रेष्ठ गन्धोंवाली पृथ्वि! वहाँ एक दिन-रात निवास करके स्नान करनेवाला पुरुष पुष्करद्वीपमें जन्म पाता है और फिर वह सभी पापोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको जाता है। वहीं मेरा एक अत्यन्त गोपनीय 'ब्रह्मसर' नामसे प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ शिलातलपर एक पवित्र धारा गिरती है। जो मेरा भक्त पाँच राततक वहाँ निवासकर स्नान करता है, वह सूर्यलोकको प्राप्त होता है। सूर्यधाराके आश्रयमें रहनेवाला वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।
देवि! यहीं मेरा एक परम गुप्त स्थान है, जिसे 'धेनुवट' कहते हैं। वहाँ ऊँची शिलासे एक मोटी धारा गिरती है। मेरे कर्ममें संलग्न जो पुरुष वहाँ प्रतिदिन स्नान करता और सात राततक रह जाता है तो उसे ऐसा माना जाता है कि उसने सातों समुद्रोंमें स्नान कर लिया है। फलतः वह मेरी उपासनामें लगा हुआ सातों द्वीपोंमें विहार करता चलता है तथा अन्तमें मेरा ध्यान-भजन करते हुए मरकर वह सातों द्वीपोंका अतिक्रमण-कर मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है। देवि! यहाँपर 'कोटिवट' नामका एक गुप्तक्षेत्र है, जहाँ वटवृक्षकी जड़से निकलकर एक धारा गिरती है। वहाँ एक राततक निवास करके स्नान करनेवाला मनुष्य मेरे उस पर्वत-शृङ्गपर वटके पत्तोंकी संख्याके हजार गुने वर्षोंतक रूप और सम्पत्तिसे सम्पन्न रहता है। फिर देवि! मृत्यु होनेपर वह अग्निके समान तेजस्वी होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
देवि! मेरे इस क्षेत्रमें 'पाप-प्रमोचन' नामका एक गुप्त स्थान है। जो कोई वहाँ एक दिन-रात रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंमें पारंगत होकर जन्म पाता है। वहीं एक कौशिकी नामकी नदी है। जो मानव वहाँ पाँच रात्रितक निवास करता हुआ स्नान करता है, वह इन्द्रलोकमें जाता है। कौशिकी नदीसे होकर वहाँ एक धारा बहती है। जो मनुष्य एक रात रहकर उसमें स्नान करता है, उसे यमलोकके घोर कष्टोंको नहीं भोगना पड़ता। मेरा वह भक्त प्राणोंका त्यागकर मेरे धाममें चला जाता है।
भद्रे! मेरे बदरीक्षेत्रमें एक और विशिष्ट स्थान है, जिसके प्रभावसे मनुष्य संसार-सागरको लाँघ जाते हैं। उसका नाम 'द्रंष्ट्राङ्कुर' है और यहीं कोका नदीका उद्गम स्थान है। इस गुह्य स्थानको जाननेमें सभी असमर्थ हैं, इस कारण लोग वहाँ जा नहीं पाते। भद्रे! वहाँ स्नान करके एक दिन-रात पवित्रभावसे निवास करनेवाला मानव 'शाल्मलि' द्वीपमें जन्म पाता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति प्राणत्याग करनेके उपरान्त 'शाल्मलि' द्वीपका भी परित्यागकर मेरे संनिकट पहुँच जाता है।
महाभागे! वहीं एक परम फलदायक दूसरा गुप्त स्थान भी है, जिसे 'विष्णुतीर्थ' कहते हैं। वहाँ पर्वतके बीचसे जलकी धारा निकलकर 'कोका' नदीमें गिरती है। उस जलको 'त्रिस्रोतस्' कहते हैं, यह सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करानेवाला है। पृथ्वीदेवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य संसारके बन्धनको काटकर वायुदेवताके लोकको प्राप्त होता है और वायुका स्वरूप धारण करके ही वह