वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४०
वहाँ निवास करता है। फिर मेरी उपासनामें संलग्न रहता हुआ वह व्यक्ति जब प्राणोंका त्याग करता है, तब उस लोकसे चलकर मेरे लोकमें पहुँच जाता है। यहीं 'कौशिकी' और 'कोका' के सङ्गमपर एक श्रेष्ठ स्थान है, जिसके उत्तर भागमें 'सर्वकामिका' नामकी शिला शोभा पाती है। वहाँ स्नानपूर्वक जो एक दिन-रात निवास करता है, उसकी प्रशस्त एवं विशाल कुलमें उत्पत्ति होती है और उसे जातिस्मरता प्राप्त होती है (पूर्वजन्मकी सारी बातें याद रहती हैं)। इस कौशिकी-कोकासङ्गममें (सर्वकामिका शिलाके पास) स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्ग अथवा भूमण्डल जहाँ कहीं भी जाना चाहता है या जो कुछ प्राप्त करना चाहता है, वह सब कुछ ही प्राप्त कर लेता है। मेरी आराधनामें तत्पर रहनेवाला मानव उस स्थानपर प्राणोंके परित्याग करनेके बाद सब प्रकारकी आसक्तियोंसे मुक्त हो करके मेरे लोकमें चला जाता है। भद्रे! 'कोकामुख' क्षेत्रमें 'मत्स्यशिला' नामक एक गुह्य स्थान है। उस श्रेष्ठ स्थानपर कौशिकी नदीसे निकली हुई तीन धाराएँ गिरती हैं। देवि! यदि उसमें स्नान करते समय जलमें मछली दिखलायी पड़ जाय तो उसे समझना चाहिये कि स्वयं भगवान् नारायण ही मुझे प्राप्त हो गये। सुन्दरि! मत्स्यको देखनेके पश्चात् यजन (पूजन) करता हुआ पुरुष मधु और लाजा (लावा)-से समन्वित अर्घ्य प्रदान करे। देवि! जो मेरे ऐसे उत्तम एवं परम गुह्य क्षेत्रमें स्नान करता है, वह मेरुपर्वतके उत्तर भागमें 'पद्मपत्र' नामक स्थानपर निवास करता है। कुछ दिन वहाँ रहनेके पश्चात् मेरे उस गोपनीय स्थानको जब छोड़ता है, तब मेरे लोकमें चला जाता है।
वसुंधरे! पाँच योजनके विस्तारमें मेरा 'कोकामुख' नामक क्षेत्र है। उसे जाननेवाला पापकर्ममें लिप्त नहीं होता। अब एक दूसरे स्थानका परिचय सुनो। परम रमणीय इस 'कोकामुख' क्षेत्रमें जहाँ मैं दक्षिण दिशाकी ओर मुख करके बैठता हूँ, वहीं 'शिलाचन्दन' नामका एक स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। पुरुषकी आकृतिसे सम्पन्न होनेपर भी मैं वहाँ वराहका रूप धारण करके रहता हूँ। वहाँ सुन्दर ऊँचा मुख और ऊपरतक उठे हुए दाढ़सहित मैं अखिल विश्वको देखता हूँ। देवि! जो मेरे प्रेमी भक्त मुझे स्मरण करते हैं तथा मेरे उपास्य कर्मोंमें रत रहते हैं, उनके पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है। अतः वे पवित्रात्मा पुरुष संसार-बन्धनसे छूट जाते हैं। यह महत्त्वपूर्ण 'कोकामुखस्थान' गुह्योंमें भी परम गुह्य है और सिद्धोंके लिये परम सिद्धि-प्रदाता है। साधक पुरुष सांख्ययोगके प्रभावसे जिस महान् सिद्धिको प्राप्त नहीं कर पाते, वही सिद्धि 'कोकामुख' क्षेत्रमें जानेपर सहज सुलभ हो जाती है। वसुंधरे! यह रहस्य मैं तुम्हें बता चुका।
महाभागे! तुम्हारे प्रश्नके उत्तरमें मैंने श्रेष्ठ स्थानोंका वर्णन कर दिया। अब तुम अन्य कौन-सा प्रसङ्ग सुनना चाहती हो ? पृथ्वी देवि! मेरा कहा हुआ यह 'कोकामुख' तीर्थ सर्वोत्तम स्थान है। जो वहाँ जाकर दर्शन-स्नानादि करता है, वह अपने दस पूर्वके पुरुषोंको और दस आगे होनेवाले कुटुम्बियोंको तार देता है। फिर यदि वहाँ दैवयोगसे कदाचित् शरीरका परित्याग कर देता है तो वह परम शुद्ध भगवद्भक्तके कुलमें जन्म लेता है। उसका मन एकमात्र मुझमें लगता है और वह मेरे धर्मका प्रचारक होता है। जो मानव प्रातःकाल उठकर इसका सदा श्रवण करता है, वह शरीर त्यागनेके पश्चात् मेरे लोकमें जाता है। उसके पाँच सौ जन्मोंके सब पाप मिट जाते हैं और वह मेरा प्रिय भक्त हो जाता है। जो प्रातःकाल इस उपाख्यानको नित्य पढ़ता है, उसे मेरा उत्तम स्थान प्राप्त होता है, इसमें कोई संशय नहीं।
[अध्याय १४०]