वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १४१ ] 'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य २५९
'बदरिकाश्रम' का माहात्म्य
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! उसी हिमालय पर्वतपर एक अत्यन्त गुह्य स्थान है, जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। इसे 'बदरिकाश्रम' कहते हैं। इसमें संसारसे उद्धार करनेकी दिव्य शक्ति है। जिनकी मुझमें श्रद्धा है, केवल वे ही उस भूमिमें पहुँचनेमें सफल होते हैं। उसे प्राप्त करनेपर मानवके सभी मनोरथ पूर्ण हो सकते हैं। उस ऊँचे पर्वतशिखरपर 'ब्रह्मकुण्ड' नामका एक प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ मैं हिममें स्थित होकर निवास करता हूँ। जो मनुष्य वहाँ तीन राततक उपवास रहकर स्नान करता है, वह 'अग्निष्टोम' यज्ञका फल प्राप्त करता है। मेरे व्रतमें आस्था रखनेवाला जितेन्द्रिय मनुष्य यदि वहाँ प्राणोंका त्याग करता है तो वह सत्यलोकका उल्लङ्घन कर मेरे धामको प्राप्त होता है। मेरे उसी उत्तम क्षेत्रमें एक 'अग्निसत्यपद' नामक स्थान है, जहाँ हिमालयके तीन शृङ्गोंसे जलकी विशाल धाराएँ गिरती हैं। मेरे कर्ममें परायण रहनेवाला जो मानव वहाँ तीन राततक निवास कर स्नान करता है, वह सत्यवादी एवं कार्यमें परम कुशल होता है। वहाँके जलका स्पर्श करके यदि कोई प्राणोंका त्याग करता है तो वह मेरे लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करता है।
देवि! इसी बदरिकाश्रममें 'इन्द्रलोक' नामका भी मेरा एक प्रसिद्ध आश्रम है। वहाँ इन्द्रने मुझे भलीभाँति संतुष्ट किया था। हिमालयके शृङ्गोंसे निरन्तर वहाँ जलकी मोटी धाराएँ गिरती हैं। उस विशाल शिलातलपर मेरा धर्म सदा व्यवस्थित रहता है। जो मानव वहाँ एक रात भी रहकर स्नान करता है, वह सत्यवक्ता एवं परम पवित्र होकर 'सत्यलोक' में प्रतिष्ठा पाता है। जो वहाँ नित्य व्रत करनेके पश्चात् अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें जाता है। बदरिकाश्रमसे सम्बन्ध रखनेवाला 'पञ्चशिख' नामका एक ऐसा तीर्थ है, जहाँ हिमालयकी पाँच चोटियोंसे जलकी धाराएँ गिरती हैं। वे धाराएँ पाँच नदीके रूपमें परिवर्तित हो गयी हैं। वहाँ जो मानव स्नान करता है, वह 'अश्वमेधयज्ञ' का फल प्राप्तकर देवताओंके साथ आनन्दका उपभोग करता है। दुष्कर तप करनेके पश्चात् यदि वहाँ कोई प्राण-त्याग करता है तो वह स्वर्गलोकका अतिक्रमण कर मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। मेरे उसी क्षेत्रमें 'चतुःस्रोत' नामसे प्रसिद्ध एक स्थान है। जहाँ हिमालयकी चारों दिशाओंसे जलकी चार धाराएँ गिरती हैं। जो मनुष्य एक रात भी वहाँ निवास कर स्नान करता है, वह स्वर्गके ऊर्ध्वभागमें आनन्दपूर्वक निवास करता है और वहाँसे भ्रष्ट होकर मनुष्यलोकमें जन्म लेनेपर मेरा भक्त होता है। फिर संसारके दुष्कर कर्म (कठिन साधना) करके प्राणोंका त्यागकर स्वर्गका अतिक्रमण कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
वसुंधरे! मेरे उसी क्षेत्रमें एक 'वेदधार' नामका तीर्थ है, जहाँ ब्रह्माजीके मुखसे चारों वेद प्रकट हुए थे। यहाँ चार विशाल जलकी धाराएँ ऊँची शिलापर गिरती हैं, जो मनुष्य चार राततक यहाँ रहकर स्नान करता है, वह चारों वेदोंके अध्ययनका अधिकारी होता है। जो मेरा उपासक मनुष्य वहाँ अपने प्राणोंका त्याग करता है, वह मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है। यहीं द्वादश दिव्य 'कुण्ड' नामक वह स्थान है, जहाँ मैंने बारह सूर्योंको स्थापित किया था। वहाँके पर्वत-शृङ्गकी जड़ विशाल है। इसके नीचे बहुत-सी शिलाएँ हैं। किसी भी द्वादशी तिथिको यदि कोई वहाँ स्नान करता है तो जहाँ द्वादश सूर्य रहते हैं, वह उस लोकमें जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। फिर