वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २६० | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १४१ |
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मेरे कर्ममें स्थित रहनेवाला वह मनुष्य प्राणोंका परित्याग कर आदित्योंके पाससे अलग होकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठित होता है।
यहीं 'सोमाभिषेक' नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है, जहाँ मैंने चन्द्रमाका ब्राह्मणोंके राजाके रूपमें अभिषेक किया था। उन अत्रिनन्दन चन्द्रमाने मुझे यहीं संतुष्ट किया था। वसुंधरे! चौदह करोड़ वर्षोंतक तपोऽनुष्ठान कर मेरी कृपासे चन्द्रमाको परम सिद्धि उपलब्ध हुई थी। यह सारा जगत् एवं इसकी उत्तम ओषधियाँ सब उन चन्द्रमाके ही अधिकारमें हैं। इसी स्थानपर इन्द्र, स्कन्द और मरुद्गण प्रकट और विलीन हुआ करते हैं। देवि! मुझसे सम्बन्ध रखनेवाली वहाँकी सभी वस्तुएँ सोममय होकर अन्तमें मुझमें स्थित हो जायँगी। वहाँ 'सोमगिरि' नामसे प्रसिद्ध एक ऐसा स्थान है, जहाँ भूमिपर, कुण्डमें एवं विशाल वनमें भी जलकी धाराएँ गिरती हैं। देवि! यह मैं तुम्हें बता चुका। जो मानव तीन राततक वहाँ रहकर स्नान करता है, वह सोमलोकको प्राप्तकर आनन्दका उपभोग करता है, इसमें कुछ भी संशय नहीं। देवि! फिर अत्यन्त कठोर तप करनेके बाद जब उसकी मृत्यु होती है तो वह चन्द्रलोकका उल्लङ्घन कर मेरे लोकको प्राप्त करता है।
देवि! मेरे इसी बदरिकाश्रमक्षेत्रमें 'उर्वशी-कुण्ड' नामक वह गुप्त क्षेत्र भी है, जहाँ उर्वशी नामकी अप्सरा मेरी दाहिनी जाँघको विदीर्ण कर प्रकट हुई थी। देवि! देवताओंका कार्य-साधन करनेके लिये मैं वहाँ (निरन्तर) तप करता रहता हूँ, पर मुझे कोई नहीं जानता, मैं स्वयं ही अपने-आपको जानता हूँ। वहाँ मेरे तपस्या करते हुए बहुत वर्ष बीत गये, किंतु इन्द्र, ब्रह्मा एवं महेश्वर आदि देवता भी यह रहस्य न जान सके।
देवि! 'बदरिकाश्रम' में तपका फल सुनिश्चित है, अतः स्वयं मैंने भी वहाँ रहकर बहुत वर्षोंतक तपस्या की है। पृथ्वीदेवि! वहाँपर मैं दस करोड़, दस अरब तथा कई पद्म वर्षोंतक तप करनेमें तत्पर रहा। उस समय मैं ऐसे गुप्त स्थानमें था कि देवतालोग भी मुझे देख न सके। अतः उन्हें महान् दुःख हुआ और वे अत्यन्त विस्मयमें पड़ गये। वसुंधरे! मैं तो तपमें संलग्न था और सभीको देख रहा था, किंतु मेरी योगमायाके प्रभावसे आवृत होनेके कारण उन सभीको मुझे देखनेकी शक्ति न थी। तब उन सब देवताओंने ब्रह्माजीसे कहा—'पितामह! भगवान् विष्णुके बिना जगत्में हमें शान्ति नहीं मिल रही है। तब देवताओंकी बात सुनकर लोक-पितामह ब्रह्मा मुझसे कहनेके लिये उद्यत हुए। देवि! उस समय मैं योगमायाके पटके भीतर छिपा था। अतः! उन्हें दर्शन न हो सका। अतएव देवता, गन्धर्व, सिद्ध और ऋषिगण परम प्रसन्न होकर मेरी स्तुति करनेके लिये चल पड़े। इन्द्रादि सभी देवता वहाँ मेरी प्रार्थना करने लगे। उन्होंने स्तुति की—'नाथ! आपके अदर्शनसे हम सब महान् दुःखी एवं उत्साहहीन हैं। हमसे कोई भी प्रयत्न होना शक्य नहीं है। हृषीकेश! आप महान् अनुग्रह करके हमारी रक्षा कीजिये।' बड़ी आँखोंसे शोभा पानेवाली पृथ्वि! देवताओंकी इस प्रार्थनापर मैंने उनपर कृपादृष्टि डाली। मेरे देखते ही वे परम शान्त हो गये। यह इसी उर्वशी-तीर्थकी विशेषता है। इस 'उर्वशी-कुण्ड' में जो मानव एक रात भी रहकर स्नान करता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं। वह 'उर्वशी' लोकमें जाकर अनन्त समयतक क्रीडा करनेका अवसर प्राप्त करता है। देवि! मेरी उपासनामें परायण रहनेवाला जो मानव वहाँ प्राणोंका त्याग करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर सीधे मुझमें ही लीन हो जाता है।
वसुंधरे! इस 'बदरिकाश्रम' का पुण्य जहाँ-