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वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

१०६- माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार) का माहात्म्य

अध्याय १२२ ] कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र*) -का माहात्म्य १९७

कोकामुखतीर्थ (वराहक्षेत्र*) -का माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! अब मैं तुम्हें गोपनीयोंमें भी एक परम गोपनीय रहस्य बतलाता हूँ, जिसके प्रभावसे पशु-योनिमें गये हुए प्राणी भी पापसे मुक्त हो जाते हैं, इसे तुम ध्यानसे सुनो। जो मानव अष्टमी और चतुर्दशी तिथिमें स्त्रीसङ्ग नहीं करता तथा दूसरेके अन्नको खाकर उसकी निन्दा नहीं करता, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। बाल्यकालमें भी जो सदा मेरे व्रतका पालन करता है, जो जिस-किसी प्रकारसे भी सदा संतुष्ट रहता है तथा जो माता-पिताकी पूजा करता है, वह मेरे लोकमें जाता है। जो परिश्रमसे भी प्राप्त सामग्रीको बाँटकर खाता-पीता है, जो गुणी, दाता तथा संयतभोक्ता है तथा जो सभी कर्तव्य-कार्योंमें स्वतः लगा रहता है एवं अपने मनको सदा वशमें किये रहता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। जो कुत्सित कर्म नहीं करता, जो ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करता है, समर्थ होकर भी जो सम्पूर्ण प्राणियोंपर क्षमा-दया करता है, वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। जो निःस्पृह रहकर दूसरोंकी सम्पत्तिके प्रति कभी लोभ नहीं करता, ऐसा पुरुष मेरे लोकमें जाता है। वरारोहे! एक गोपनीय विषय जो देवताओंके लिये भी दुष्प्राप्य एवं दुर्ज्ञेय है, उसे अब मैं तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो। जरायुज, अण्डज, उद्भिज्ज और स्वेदज—इन चार प्रकारके प्राणियोंकी जो हिंसा नहीं करता, जो पवित्रात्मा एवं दयाशील है और जो 'कोकामुख' नामक तीर्थमें अपने प्राणोंका परित्याग करता है, वह मुझे परम प्रिय है। मेरी कृपादृष्टिसे वह कभी वियुक्त नहीं होता।'

पृथ्वी बोली—माधव! मैं आपकी शिष्या, दासी और आपमें अटल श्रद्धा रखनेवाली हूँ, आपमें भक्ति रखनेके बलपर आपसे पूछती हूँ कि वाराणसी, चक्रतीर्थ, नैमिषारण्य, अट्टहासतीर्थ, भद्रकर्णह्रद, द्विरण्ड, मुकुट, मण्डलेश्वर, केदारक्षेत्र, देवदारुवन, जालेश्वर, दुर्ग, गोकर्ण, कुब्जाम्रेश्वर, एकलिङ्ग—ऐसे प्रसिद्ध एवं पवित्र तीर्थस्थानोंको छोड़कर आप 'कोकामुख' क्षेत्रकी ही इतनी प्रशंसा क्यों करते हैं?

भगवान् वराह बोले—भीरु! तुम्हारा कहना ठीक है, बात ऐसी ही है, 'कोकामुख' मुझे अत्यन्त ही प्रिय है। अब 'कोकामुख'-क्षेत्र जिन कारणोंसे अधिक प्रसिद्ध है, वह मैं तुम्हें बताता हूँ। तुमसे जिन क्षेत्रोंका वर्णन किया है, वे सभी भगवान् रुद्रसे सम्बन्ध रखनेवाले 'पाशुपततीर्थ' हैं, जिन्हें 'पाशुपत-क्षेत्र' कहते हैं, किंतु यह 'कोकामुख-क्षेत्र' मुझ श्रीहरिका है। वरानने! इसी विषयमें मैं तुम्हें एक परम प्रसिद्ध उपाख्यान बताता हूँ, इसमें 'कोकामुख' क्षेत्रकी प्रसिद्धिका हेतु संनिहित है।

एक बार इस 'कोकामुख'-क्षेत्रमें मांसके लोभमें एक व्याध घूम रहा था। वहीं एक अल्प जलवाले सरोवरमें एक मत्स्य भी रहता था। उसको देखकर व्याधने तुरंत ही बंसी (कटिया)-से उसे बाहर खींच लिया, तथापि वह बलवान् मत्स्य उसके हाथसे तुरंत निकल गया। इतनेमें एक बाजकी दृष्टि, जो आकाशमें चक्कर लगा रहा था, उस मत्स्यपर पड़ी और वह उसको पकड़नेके लिये नीचे उतरा और फिर उसे पकड़कर तेजीसे उड़ चला। परंतु वह भी उसके बोझको न सँभाल सका और उस मछलीके साथ


* इसका उल्लेख आगे १४०वें अध्यायमें भी है। नंदलाल देके अनुसार यह स्थान नाथपुरके पास तम्बर, अरुणा और सुनकोशी नदियोंके त्रिवेणी सङ्गमद्वारा निर्मित है। (Geographical Dictionary of Ancient and Mediaeval India, Page 101;

१९८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२२

ही इसी ‘कोकामुख’-क्षेत्रमें गिर पड़ा। किंतु आश्चर्य ! वह गिरते ही इस तीर्थके प्रभावसे रूप, गुण एवं वयसे युक्त एक कुलीन राजपुत्रके रूपमें परिणत हो गया ! कुछ समय बाद उसी व्याधकी स्त्री भी मांस लिये हुए वहाँ जा पहुँची। इतनेमें ही मांसके लिये लालायित रहनेवाली एक मादा चील भी उसके हाथसे मांस छीननेके लिये आयी, जो मांस छीननेके लिये बार-बार झपाटा मारने लगी। उसी क्षण बलपूर्वक मांस लेनेकी इच्छा रखनेवाली उस मादा चीलपर व्याधने बाण मारा, जिससे वह मेरे इस ‘कोकामुख-क्षेत्र’ में गिर पड़ी और उसके प्राण निकल गये।

तदनन्तर उस चीलने चन्द्रपुर नामक नगरमें सुन्दरी राजपुत्रीके रूपमें जन्म ग्रहण किया। उसका यश बड़ी तेजीसे चारों ओर फैलने लगा। वह कन्या धीरे-धीरे बढ़ती गयी और शनैः-शनैः रूप, गुण, अवस्था एवं सभी (चौंसठ) कलाओंके ज्ञानसे सम्पन्न हो गयी, परंतु वह पुरुषोंकी सदा निन्दा करती। उसे रूपवान्, गुणवान्, शूर-वीर तथा सौम्य स्वभावके पुरुषोंकी चर्चा भी अच्छी न लगती थी और वह उनकी भी निन्दा किया करती थी। युवती होनेपर उसका ‘आनन्दपुर’ नगरके एक शकजातिके पुरुषके साथ विवाह हुआ। विवाहके बाद दोनों पति-पत्नी गार्हस्थ्यधर्मका पालन करते हुए साथ रहने लगे। फिर वे परस्पर प्रेमके बन्धनमें इस प्रकार बँध गये कि एक मुहूर्त भी कोई किसीको छोड़ना न चाहता था। अब वही कन्या अत्यन्त नम्र होकर अपने स्वामीकी सब प्रकार सेवा करने लगी।

एक दिन मध्याह्नके समय राजकुमारके सिरमें तीव्र वेदना उत्पन्न हुई। अनेक कुशल वैद्य चिकित्सामें लगे; किंतु उसकी शिरोव्यथा दूर न हो सकी। अन्य मन्त्र-यन्त्र भी विफल हुए। इस प्रकार पर्याप्त समय बीत जानेके बाद एक दिन उस राजकुमारीने अपने स्वामीसे यह जिज्ञासा की—‘प्रभो! आपके सिरमें जो यह वेदना है, यह क्या और कैसे है ? यदि मुझपर आपका तनिक भी स्नेह हो तो आप मुझे इसे तत्त्वतः बतानेकी कृपा कीजिये। अनेक कुशल वैद्य आपका उपचार कर रहे हैं, पर उन्हें वेदना दूर करनेमें सफलता नहीं मिलती है। इसपर राजकुमारने कहा—‘भद्रे! क्या तुम यह भूल गयी कि यह मनुष्य-शरीर व्याधियोंका ही मन्दिर है? यह मनुष्य-शरीर रोग और दुःखोंसे ही भरा है, संसाररूपी सागरमें पड़े हुए मुझसे तुम्हें बार-बार ऐसा प्रश्न करना उचित नहीं है।’ राजकुमारके ऐसा कहनेपर उस राजकन्याके मनमें उत्सुकता अब और बढ़ गयी।

कुछ दिन बाद पुनः उस राजपुत्रीने अत्यन्त आग्रहपूर्वक उस प्रश्नको राजकुमारसे पूछा। इसपर शक-नरेशने अपनी भार्यासे कहा—‘भद्रे! तुम इस मानुषी भावका त्याग करो और अपने पूर्वजन्मकी बातें स्मरण करो। अथवा यदि तुम्हें पूर्वजन्मकी बातें जाननी हों तो कल्याणि! तुम चलकर मेरे माता-पिताको प्रसन्न करो। तुम उनकी पूजा करो; क्योंकि उन्होंने मुझे अपने उदरमें धारण किया था। उनका सम्मान करके और उनकी आज्ञा लेनेके पश्चात् मैं ‘कोकामुख’क्षेत्रमें चलकर तुम्हें निःसंदेह यह प्रसङ्ग सुनाऊँगा। अनिन्दिते! अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान देवताओंके लिये भी दुर्लभ है। सारा वृत्तान्त मैं तुम्हें वहीं बताऊँगा।’

तदनन्तर वह राजकुमारी अपने सास और श्वशुरके सामने गयी और उनके चरणोंको पकड़कर बोली—‘मुझे आप दोनोंसे कुछ निवेदन करना है। मैं इस विषयमें आपलोगोंसे अनुमति प्राप्त करना चाहती हूँ। फिर उसने कहा कि ‘हम दोनों स्त्री-पुरुष आपकी आज्ञासे पवित्र ‘कोकामुख’नामक

अध्याय १२२ ] कोकामुखतीर्थ ( वराहक्षेत्र*) -का माहात्म्य [ १९९

क्षेत्रमें जाना चाहते हैं। आपलोग ही हमारे गुरु हैं। इस कार्यकी गरिमाको देखकर आप हमलोगोंको रोकें नहीं। आजतक मैंने कभी कुछ भी आपलोगोंसे नहीं माँगा है। यह प्रथम अवसर है कि हम आपके सामने याचना करने आये हैं। अतः आपलोग मेरी इस याचनाको पूर्ण करनेकी कृपा करें। समस्या यह है कि आपके ये कुमार निरन्तर सिरकी वेदनासे पीड़ित रहते हैं और दोपहरके समयमें तो ये मृतकके तुल्य हो जाते हैं। कोई भी उपचार सफल नहीं हो रहा है। ये सब सुख-भोगोंको छोड़कर सदा पीड़ासे दुःखी रहते हैं। इनका यह दुःख 'कोकामुख'क्षेत्रमें गये बिना दूर होनेका नहीं है।'

उस समय शकजातियोंके अध्यक्ष उन नरेशने पुत्रवधूकी बात सुनकर अपने हाथसे पुत्र एवं पुत्रवधूके सिरको सहलाकर कहा—'पुत्र ! 'कोकामुख'क्षेत्रमें जानेकी बात तुमलोगोंके मनमें कैसे आयी? हाथी, घोड़े, सवारियाँ, अप्सराओंकी तुलना करनेवाली स्त्रियाँ, कोष और रत्नभंडार तथा सात अङ्गोंसहित हमारी यह सम्पूर्ण राज्य-सम्पत्ति आदि सभी तुम्हारे अधीन हैं। तुम इन सबको ले लो। सारी सम्पत्तियोंका उत्तराधिकारी पुत्र ही होता है। मेरे प्राण तुम्हींमें सदा बसे रहते हैं। तुम 'कोकामुख' क्षेत्र मत जाओ।' पिताके इस प्रकार कहनेपर राजकुमारने उनके चरण पकड़ लिये और नम्रतापूर्वक कहने लगा—'पिताजी ! राज, कोष, सवारी अथवा सेनासे मेरा क्या प्रयोजन? मैं तो अभी उस 'कोकामुख'-क्षेत्रमें ही जाना चाहता हूँ। मैं सिरकी वेदनासे नितान्त पीड़ित हूँ। यदि मैं जीवित रहा, तब राज्य, सेना और कोष भी मेरे ही होंगे, इसमें कोई संशय नहीं, पर इस पीड़ासे मुक्ति तो मुझे वहाँ जानेसे ही मिलेगी।

अन्तमें शक-नरेशने पुत्रकी बातपर विचार करके उसे जानेकी आज्ञा दे दी। जब राजकुमारने 'कोकामुख'की यात्रा आरम्भ की तो उसके साथ बहुत-से व्यापारीवर्ग और नागरिक स्त्री-पुरुष भी चल पड़े। बहुत समयके बाद वे सभी इस 'कोकामुख'क्षेत्रमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर राजकुमारीने अपने स्वामीसे ये वचन कहे—'स्वामिन् ! आपसे मैंने जो पहले प्रश्न किया था, उस समय आपने मुझे 'कोकामुख-क्षेत्र' में पहुँचकर बतलानेका आश्वासन दिया था, अतः अब बतानेकी कृपा कीजिये।' इसपर राजकुमारने अपनी भार्यासे स्नेहपूर्वक कहा—'प्रिये ! अब रात्रि हो गयी है। इस समय तुम सुखपूर्वक सो जाओ। वह सब मैं प्रातःकाल बताऊँगा।' प्रातःकाल वे दोनों स्नान करके रेशमी वस्त्र धारण करके बैठे। राजकुमारने सर्वप्रथम सिर झुकाकर भगवान् विष्णुको प्रणाम किया। तत्पश्चात् वह अपनी पत्नीको पकड़कर, पूर्व-उत्तर-भागमें (अपने मत्स्य-देहकी पड़ी) अस्थियोंको दिखाकर कहने लगा—'प्रिये ! ये मेरे पूर्व शरीरकी हड्डियाँ हैं। पूर्वजन्ममें मैं मत्स्य था। एक बार जब मैं इस 'कोकामुख' क्षेत्रके जलमें विचर रहा था कि एक व्याधने बंसीसे मुझे पकड़ लिया। उस समय मैं अपनी शक्ति लगाकर उसके हाथसे तो निकल गया; पर एक चील मुझे लेकर फिर उड़ गयी और नखोंसे मेरे शरीरको क्षत-विक्षत कर दिया। इतनेमें उससे छूटकर मैं गिर गया। उसीके किये हुए प्रहारके कारण अब भी मेरे सिरमें वेदना बनी रहती है। इस प्रसङ्गको केवल मैं ही जानता हूँ। मेरे बिना इस रहस्यको कोई दूसरा नहीं जानता। भद्रे ! तुमने जो बात पूछी थी, मैंने उसका रहस्य बतला दिया। सुन्दरि ! तुम्हारा कल्याण हो, अब तुम्हारा मन जहाँ लगे, वहाँ जा सकती हो।'

२००संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १२२

वसुंधरे! अब राजकुमारी भी करुण-स्वरमें अपने पतिसे कहने लगी—'भद्र! इसी कारण मैं भी अपनी गुप्त बात आपको नहीं बतला सकी थी। पूर्वजन्ममें मैं जैसी जो कुछ थी, अब वह आपसे बतलाती हूँ, आप सुनें। मैं पूर्वजन्ममें आकाशमें विचरनेवाली एक चील थी। भूख और प्याससे मुझे महान् कष्ट हो रहा था। खानेके योग्य पदार्थका अन्वेषण करती हुई मैं एक पेड़पर बैठी थी, इतनेमें मुझे एक व्याध दिखायी दिया। वह वनके बहुत-से पशुओंको मारकर उनके मांसोंको लेकर उसी मार्गसे गुजर रहा था। वह भी भूखसे व्याकुल था, अतः मांस-भारको अपनी पत्नीके पास रखकर उसे पकानेके विचारसे लकड़ी ढूँढ़ने निकला। काष्ठोंको एकत्रकर वह आग जलाने ही जा रहा था कि मैंने झपटकर अपने वज्रमय कठोर नखोंसे उस मांसपिण्डको उठा लिया। पर वह मांस-भार मेरे लिये दुर्वह था, अतः उसे दूर न ले जाकर वहीं समीप ही बैठी रही। इधर वह व्याध शिकारकी खोजमें लगा ही था। अब उसकी दृष्टि मांस खाती हुई मुझ चीलपर पड़ी। फिर तो उसने धनुष उठाया और मुझपर बाणका संधान कर मार गिराया। मैं वहाँसे लुढ़ककर चक्कर काटती हुई प्राणहीन और निश्चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिरी और मेरी जीवनलीला समाप्त हो गयी। किंतु इस 'कोकामुख' क्षेत्रकी महिमासे मेरे मनमें कोई कामना न रहनेपर भी मेरा जन्म राजाके घर हुआ। इस प्रकार मुझे आपकी स्त्री होनेका सौभाग्य प्राप्त हुआ। मेरे पूर्वजन्मकी ही ये हड्डियाँ हैं। अब इनका थोड़ा-सा भाग ही अवशेष है।' इस 'कोकामुख' तीर्थकी ही यह महिमा है जिसके फलस्वरूप तिर्यक् (तिरछी चलने या उड़नेवाली) योनिके जीवका भी उत्तम कुलमें जन्म हो जाता है। राजकुमारने भी साधु-साधु कहकर उसका बड़ा सम्मान किया। साथ ही उसे उस क्षेत्रमें होनेवाले कुछ धार्मिक कर्मोंका भी निर्देश किया और उन्हें राजकुमारीने सम्पन्न किया। अन्य लोगोंने भी जिन्हें जो प्रिय जान पड़ा, उस धर्मका आचरण किया। उस समय उस दम्पतिने प्रसन्नतासे आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको यथोचित द्रव्य-अन्न और रत्न भी दिये। वसुंधरे! उस समय अन्य भी जितने लोग वहाँ आये थे, उन सबने भी अपनी सामर्थ्यके अनुसार स्वयं व्रतका पालन करते हुए भक्तिपूर्वक ब्राह्मणोंको धन दिया। इस प्रकार वे लोग कुछ दिनोंतक वहीं रुके रहे और इसके फलस्वरूप वे श्वेतद्वीपको प्राप्त हुए। उस पुण्यमय धाममें पहुँचनेपर सभी पुरुष शुक्ल वस्त्र एवं दिव्य भूषणोंसे अलंकृत होकर सुशोभित-प्रकाशित होने लगे। वहाँ रहनेवाली स्त्रियाँ भी दिव्य वस्त्र एवं अलौकिक आभूषणोंसे आभूषित होकर रूप, तेज एवं सत्त्वसे युक्त होकर प्रकाशित होने लगीं।

देवि! यह मैंने तुमसे 'कोकामुख'क्षेत्रकी महिमा बतलायी, जहाँ मत्स्य और चील आदि कामनामुक्त जीवोंने भी उत्तम गति प्राप्त की थी, जिसे चान्द्रायणव्रत करने, जलमें शयन करने तथा भगवद्धर्मोंका आचरण करनेवाले भी बड़ी कठिनतासे प्राप्त कर पाते हैं। फिर वहाँ राजकुमार और राजकुमारी—इन दोनों व्यक्तियोंने बहुतसे उत्तम धान्य और रत्न दान किये। अन्य श्रद्धालु व्यक्तियोंने भी धर्माचरणकर प्रारब्धके अनुसार वाञ्छनीय मृत्यु प्राप्त की और उन्हें श्वेतद्वीप सुलभ हो गया। वह राजकुमार भी मनुष्यलोकके सभी श्रेष्ठ भोगोंको भोगकर सबसे उत्तम मेरे लोकको प्राप्त हुआ। सुमध्यमे! वहाँकी सभी सुवासिनी स्त्रियाँ भी मायाके प्रभावसे मुक्त हो गयीं। सबपर धर्म तथा मेरी भक्तिभावनाकी गहरी छाप पड़ी थी।

अध्याय १२३ ] पुष्पाडिका माहात्म्य २०१

मेरी कृपासे वे सब श्वेतद्वीप पहुँचौं। यह प्रसङ्ग धर्म, कीर्ति, शक्ति और महान् यशका उन्नायक है। यह सभी तपस्याओंमें महान् तप, आख्यानोंमें उत्तम आख्यान, कृतियोंमें सर्वोत्तम कृति तथा धर्मोंमें सर्वोत्कृष्ट धर्म है, जिसका वर्णन मैंने तुमसे किया। भद्रे! जो क्रोधी, मूर्ख, कृपण, अभक्त, अश्रद्धालु तथा शठ व्यक्ति हैं, उन्हें यह प्रसङ्ग नहीं सुनाना चाहिये, जो दीक्षित तथा सदसद्विचारशील हैं, यह प्रसङ्ग उन्हें ही सुनाना चाहिये। जो शास्त्र-पारगामी पुरुष मृत्युकाल उपस्थित होनेपर मनको सावधान करके इस प्रसङ्गको मनमें धारण करता है, वह जन्म-मरणके बन्धनसे छूट जाता है। जो इस विधिके अनुसार 'कोकामुख' क्षेत्रमें जाकर संयमपूर्वक जीवन व्यतीत करता है, वह भी उस परम सिद्धिको पाता है, जिसे पूर्वकालमें चील और मत्स्यने प्राप्त किया था।

[ अध्याय १२२ ]


पुष्पादिका माहात्म्य

पृथ्वी बोली—प्रभो! 'कोकामुख' तीर्थकी अद्भुत महिमा सुनकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। माधव! अब मैं यह जानना चाहती हूँ कि किस धर्म, तप अथवा कर्मके अनुष्ठानसे मनुष्य आपका दर्शन पा सकते हैं? प्रभो! कृपया प्रसन्न होकर आप मुझसे यह सारा प्रसङ्ग बतलाइये, यह मेरी प्रार्थना है।

भगवान् वराह बोले—देवि! पावस-ऋतुके बाद जलाशयोंके जल स्वच्छ हो जाते हैं, जब आकाश और चन्द्रमण्डल निर्मल दीखने लगते हैं, उस समय न अधिक शीत रहता है और न गर्मी। जब हंसोंका कलरव आरम्भ हो जाता है, कुमुद, रक्त कमल, नीले एवं अन्य कमलोंकी सुरभि सर्वत्र फैलने लगती है, उस समय कार्तिक मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथि मुझे अत्यन्त प्रिय है। उस अवसरपर जो मेरी पूजा करता है, मैं उसका फल बताता हूँ, सुनो—वसुंधरे! मेरा वह भक्त कल्पपर्यन्त धनी—लक्ष्मीका पात्र बना रहता है, जो दूसरे देवताके उपासकके लिये असम्भव है। माधवि! उस अवसरपर साधकको चाहिये कि मेरी आराधना कर इस स्तोत्रका पाठ करे। स्तोत्रका भाव यह है—'जगत्प्रभो! ब्रह्मा, रुद्र और ऋषि जिसकी पूजा एवं वन्दना करते हैं, लोकनाथ! उन आपकी आराधना करनेके उपयुक्त यह द्वादशी तिथि प्राप्त हुई है। आपसे मैं प्रार्थना करता हूँ, आप उठिये और निद्राका परित्याग कीजिये। मेघ चले गये, चन्द्रमाकी कलाएँ पूर्ण हो गयी हैं। शरद्-ऋतुमें विकसित होनेवाले पुष्प मैं आपको समर्पित करूँगा। अब आप जागनेकी कृपा करें। यशस्विनि! इस प्रकार द्वादशीको पुष्पाञ्जलि अर्पित कर मेरी उपासना करनेवाले भक्तोंको परमगति प्राप्त होती है।

शिशिर-ऋतुमें वनस्पतियाँ नवीन हो जाती हैं। उस समयके पुष्पोंसे मेरी अर्चना करनेके लिये पृथ्वीपर घुटनोंके बल बैठकर हाथोंमें फूल लेकर मेरा उपासक कहे—'तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले प्रभो! आप संसारके स्रष्टा हैं। यह शिशिर-ऋतु भी आपका ही स्वरूप है। यह शीत-समय सबके लिये दुस्तर एवं दुःसह है। इस समय मैं आपकी आराधना करता हूँ। आप इस संसारसे मेरा उद्धार करनेकी कृपा कीजिये।'

वसुंधरे! जो पुरुष भक्तिसहित इस भावनाके साथ शिशिर-ऋतुमें मेरी पूजा करता है, उसे परम सिद्धि प्राप्त होती है। अब मैं तुम्हें एक

२०२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२३

दूसरी बात बताता हूँ, तुम उसे सुनो। मार्गशीर्ष और वैशाख मास भी मुझे बहुत प्रिय हैं। उन मासोंमें मुझे पुष्पादि अर्पण करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसे मैं बतलाता हूँ। जो भाग्यशाली व्यक्ति मुझे पवित्र गन्ध-पुष्पादि पदार्थ अर्पित करता है, वह नौ हजार नौ सौ वर्षोंतक विष्णुलोकमें स्थिरतापूर्वक सुखसे निवास करता है—इसमें कोई संदेह नहीं। एक-एक गन्धयुक्त पुष्प-पत्र (या तुलसीपत्र*) देनेका यह महान् फल है। सदा श्रद्धासे सम्पन्न होकर चन्दन एवं पुष्पोंसे मेरी पूजा करनी चाहिये। जो पुरुष नियमपूर्वक रहकर कार्तिक, मार्गशीर्ष एवं वैशाख—इन तीन महीनोंकी द्वादशी तिथियोंके दिन खिले हुए पुष्पोंकी वनमाला तथा चन्दन आदिको मुझपर चढ़ाता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक मेरी पूजा कर ली। कार्तिक मासकी द्वादशी तिथिमें साखू वृक्षके फूल तथा चन्दनसे मेरी पूजा करनेका विधान है। भद्रे! इसी प्रकार मार्गशीर्ष मासमें चन्दन एवं कमलके पुष्पको एक साथ मिलाकर जो मुझे अर्पण करता है, उसे महान् फल प्राप्त होता है।

पृथ्वीदेवी भगवान्‌की बातोंको सुनकर हँस पड़ीं। पुनः वे नम्रतापूर्वक बोलीं—'प्रभो! वर्षमें तीन सौ साठ दिन तथा बारह मास होते हैं। उनमें आप केवल दो ही महीनोंकी द्वादशी तिथिकी ही मुझसे क्यों प्रशंसा करते हैं?' जब पृथ्वीदेवीने भगवान् वराहसे यह प्रश्न किया तब वराहभगवान्‌ने मुस्कुराते हुए कहा—देवि! जिस कारण ये दोनों मास मुझे अधिक प्रिय हैं, वह धर्मयुक्त वचन सुनो! तिथियोंमें द्वादशी तिथि सबसे श्रेष्ठ मानी जाती है, क्योंकि इसकी उपासनासे सम्पूर्ण यज्ञोंके अनुष्ठानसे भी अधिक फल प्राप्त होता है। हजारों ब्राह्मणोंको दान देनेका जो फल होता है, वह इस कार्तिक और वैशाख मासकी द्वादशीमें एकको ही दान देनेसे प्राप्त हो जाता है। क्योंकि इस कार्तिक मासकी द्वादशीके दिन मैं जगता हूँ और वैशाख मासकी द्वादशीमें सर्वशक्तिसम्पन्न हो जाता हूँ। वसुंधरे! इसके योगसे विपुल चिन्ता समाप्त हो जाती है। इसीसे मैंने इसकी महिमाका वर्णन किया है। इसलिये मेरे भक्त पुरुषको चाहिये कि मनको संयत रखकर वैशाख और कार्तिक मासकी द्वादशीके दिन हाथमें चन्दन, गन्ध और (तुलसी)पत्र लिये हुए इस मन्त्रका उच्चारण करे¹। मन्त्रका अर्थ यह है—'भगवन्! ये वैशाख और कार्तिक मास सदा सभी मासोंमें श्रेष्ठ माने जाते हैं। इस अवसरपर आप मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं चन्दन और तुलसीपत्रोंको अर्पित करूँ और आप इन्हें स्वीकार करें। साथ ही मुझमें धर्मकी वृद्धि कीजिये।' फिर 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर चन्दन एवं तुलसीपत्र अर्पित करना चाहिये। अब मैं गन्धयुक्त पत्र-पुष्पोंके गुण और उन्हें चढ़ानेके फलका वर्णन करता हूँ। मानव पवित्र होकर हाथमें चन्दन, गन्ध (तुलसी)पत्र और फूल लेकर 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'- का उच्चारण करते हुए उन्हें अर्पित करे। साथ ही यह मन्त्र कहे—'भगवन्! आप मुझे आज्ञा देनेकी कृपा करें। इन सुन्दर फूलों और मलयचन्दनसे मैं आपकी अर्चना करना चाहता हूँ। प्रभो! आपको मेरा नमस्कार है। इसे स्वीकार करें; मेरा मन परम पवित्र हो जाय—यह आपसे प्रार्थना है।' मेरे


* भगवन्नाज्ञापय इमं बहुतरं नित्यं वैशाखं चैव कार्तिकम्॥ गृहाण गन्धपत्राणि धर्ममेवं प्रवर्धय॥ नमो नारायणायेत्युक्त्वा गन्धपत्रं प्रदापयेत् (१२३। ३६-३७)। यहाँ यह ध्यान देनेकी बात है कि मूल वराहपुराणमें 'तुलसी' नहीं 'गन्धपत्र' शब्द ही प्रयुक्त है। हाजरा आदि कुछ विद्वानोंकी दृढ़ मान्यता है कि जिन पुराणोंमें 'तुलसी' शब्द नहीं है, वे अत्यधिक प्राचीन हैं। वेदोंमें भी 'तुलसी' शब्द नहीं है।

अध्याय १२४ ] वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य [ २०३

कर्ममें संलग्न रहनेवाला पुरुष, इन गन्ध-पुष्पोंको मुझे देता हुआ जो फल प्राप्त करता है, वह यह है कि उसका न पुनर्जन्म होता है और न मरण। उसके पास ग्लानि और क्षुधा भी नहीं भटक पाती। वह देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षतक मेरे लोकमें स्थान पाता है। चन्दनयुक्त एक-एक पुष्प अर्पित करनेका ऐसा फल है।

[अध्याय १२३]


वसन्त आदि ऋतुओंमें भगवान्की पूजा करनेकी विधि और माहात्म्य

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! फाल्गुन मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन पवित्र होकर शान्त मनसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनेका विधान है। इस वसन्त ऋतुमें क्रमशः कुछ श्वेत, कुछ पाण्डुरङ्गके जो अत्यन्त प्रशंसनीय गन्धसे युक्त सुन्दर पुष्प हैं, उनके द्वारा प्रसन्न-अन्तःकरण होकर मन्त्रद्वारा पूजा करनी चाहिये। सभी वस्तुएँ भगवान्‌से सम्बन्ध रखनेवाली एवं पवित्र हों। पूजाके पहले ‘ॐ नमो नारायणाय’ कहकर बादमें यह मन्त्र पढ़े*—जिसका भाव है, 'देवेश्वर! आप ॐकारस्वरूप हैं। शङ्ख, चक्र एवं गदासे आपकी भुजाएँ शोभा पाती हैं। जगत्प्रभो! आप महान् पराक्रमी पुरुष हैं। आपके लिये मेरा बारंबार नमस्कार है। प्रभो! वसन्त-ऋतुमें वृक्ष फूलोंसे लदे हैं। सर्वत्र गन्धयुक्त रस भरा है। अब आप इस पुष्प-युक्त वृक्ष, वन और पर्वतों तथा मुझपर अपनी कृपादृष्टि डालनेकी दया कीजिये।

सुमध्यमे! जो पुरुष फाल्गुन मासमें इस प्रकार मेरी पूजा करता है, उसे दुःखमय संसारमें आनेका संयोग नहीं प्राप्त होता, अपितु वह मेरे लोकको प्राप्त होता है। अब तुम जो श्रेष्ठ वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके फलकी बात मुझसे पूछ चुकी हो, उसे कहता हूँ, सुनो। शालवृक्ष तथा अन्य भी बहुत-से वृक्ष जब फूलोंसे परिपूर्ण हो जायें तो साधक उनके फूलोंको हाथमें लेकर मेरी आराधनाके लिये तत्पर हो जाय। उस अवसरपर मेरे प्रह्लाद, नारद आदि भागवतोंको भी पूज्य मानकर पूजा करे। माधवि! ऋषिलोग वेदोंमें कहे हुए मन्त्रोंद्वारा सदा मेरी स्तुति करते हैं। अप्सराओंद्वारा गीतों, वाद्यों एवं नृत्योंसे मैं सुपूजित होता रहता हूँ। अलौकिक दिव्य पुरुष मुझ पुराणपुरुषोत्तमका स्तवन करनेमें संलग्न रहते हैं। मैं सम्पूर्ण प्राणियोंका आराध्यदेव एवं सम्पूर्ण लोकोंका स्वामी हूँ। अतः सिद्ध, विद्याधर, किन्नर, यक्ष-पिशाच, उरग, राक्षस, आदित्य, वसु, रुद्रगण, मरुद्गण, विश्वेदेवता, अश्विनीकुमार, ब्रह्मा, सोम, इन्द्र, अग्नि, नारद-पर्वत, असित-देवल, पुलह, पुलस्त्य, भृगु, अङ्गिरा, मित्रावसु और परावसु—ये सब-के-सब मेरी स्तुतिमें सदा तत्पर रहते हैं।

उसी समय महान् ओजस्वी देवताओंके मुखसे निकली हुई प्रतिध्वनिको सुनकर भगवान् नारायणने पृथ्वीसे कहा—'महाभागे! देखो! देव-समुदाय वेदध्वनि कर रहा है। उनके मुखसे निकले हुए इस महान् शब्दको क्या तुम नहीं सुन रही हो?' इसपर पृथ्वीने भगवान् नारायणसे कहा—'भगवन्! आप जगत्‌की सृष्टि करनेमें परम कुशल हैं। देवतालोग वराहके रूपमें विराजमान आप प्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षा करते हैं, क्योंकि वे आपके द्वारा ही बनाये गये हैं।'

इसपर भगवान् नारायणने पृथ्वीको उत्तर दिया—'वसुंधरे! मैं अपने मार्गका अनुसरण


* ॐनमोऽस्तु देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर। नमोऽस्तु ते लोकनाथ प्रवीराय नमोऽस्तु ते॥ (१२४।५)

२०४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १२४ ]

करनेवाले उन देवताओंसे पूर्ण परिचित हूँ। एक हजार दिव्य वर्षोंतक मैंने केवल लीलामात्रसे तुम्हें अपने एक दाँतके ऊपर धारण कर रखा है। ब्रह्मासहित आदित्य, वसु एवं रुद्रगण तथा स्कन्द और इन्द्र आदि देवता मुझे देखनेके लिये यहाँ आना चाहते हैं।

वसुंधरा अब प्रभुके चरणोंपर गिर गयी। वह कहने लगी—'भगवन्! मैं रसातलमें पहुँच गयी थी। आपने ही मेरा वहाँसे उद्धार किया है। मैं आपकी शरणमें आयी हूँ। आपमें मेरी अचल श्रद्धा है। आप सर्वसमर्थ एवं मेरे लिये परम आश्रय हैं। भगवन्! मैं आपसे पूछना चाहती हूँ कि कर्मका स्वरूप क्या है? किस कर्मके प्रभावसे आप प्राप्त होते हैं तथा नर-जन्मकी सफलता किसमें है? भगवन्! शेष ऋतुओंमें किन पुष्पोंसे किस प्रकार आपकी पूजा करनेसे अथवा किस कर्मसे आप प्रसन्न होते हैं, उसे भी बतानेकी कृपा कीजिये।

श्रीवराह भगवान् बोले—वसुंधरे! मोक्षमार्गमें अटल रहनेवाले मेरे भक्तोंने जिसका जप किया है, अब मैं उस मन्त्रका वर्णन करता हूँ, सुनो। उसमें ऐसी शक्ति है कि इसके निरन्तर पाठ करनेसे मेरी अवश्य तुष्टि होती है। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! आप सम्पूर्ण मासोंमें मुख्य माधव (वैशाख) मास हैं, अतः 'माधव' नामसे आपकी भी प्रसिद्धि है। वसन्त ऋतुमें चन्दन, रस और पुष्पादिसे अलंकृत आपकी प्रतिष्ठित प्रतिमाका दर्शन करके पुण्य प्राप्त करना चाहिये। जो सातों लोकोंमें शूरवीर और नारायण नामसे प्रसिद्ध हैं, ऐसे आप प्रभुका यज्ञोंमें निरन्तर यजन किया जाता है।'

इस प्रकार ग्रीष्म-ऋतुमें भी मेरे कथनका पालन करते हुए सम्पूर्ण विधियोंका आचरण करना चाहिये। उस समय भगवान्में श्रद्धा रखनेवाले सम्पूर्ण प्राणियोंको प्रिय आगे कहे जानेवाले मन्त्रका उच्चारण करना चाहिये। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! सम्पूर्ण मासोंमें प्रधानरूपसे आप ज्येष्ठ मासका रूप धारण करके शोभा पा रहे हैं। इस ग्रीष्म-ऋतुमें विराजमान आप प्रभुका दर्शन करना चाहिये, जिसके फलस्वरूप सारा दुःख दूर हो जाय।'

वरारोहे! इसी प्रकार तुम भी ग्रीष्म-ऋतुमें मेरी पूजा करो। इससे प्राणी जन्म और मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता तथा उसे मेरा लोक प्राप्त होता है। वसुंधरे! भूमण्डलपर शाल आदि जितने भी फूलवाले वृक्ष हैं तथा उस समय जितने गन्धपूर्ण उपलब्ध पुष्प हैं, उन सबसे मुझ श्रीहरिकी अर्चना करनेकी विधि है। ऐसे ही वर्षा-ऋतुके श्रावण आदि मासोंमें भी मुझसे सम्बन्ध रखनेवाले कर्मोंका अनुष्ठान करना चाहिये।

देवि! अब दूसरा वह कर्म तुम्हें बता रहा हूँ, जिसके प्रभावसे संसारसे मुक्ति मिल सकती है। कदम्ब, मुकुल, सरल और अर्जुन आदि देव-वृक्ष हैं। मेरी प्रतिमाकी स्थापना करके विधि-निर्दिष्ट कर्मके अनुसार इन वृक्षोंके फूलोंसे 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मेरा आदरपूर्वक अर्चन करना चाहिये। फिर प्रार्थना करे—'लोकनाथ! मेघके समान आपकी कान्ति है। आप अपनी महिमामें स्थित हैं। ध्यानमें परायण रहनेवाले आश्रित जन आपके जिस रूपका दर्शन करते हैं, वे इस वर्षा-ऋतुमें योगनिद्रामें अभिरुचि रखनेवाले एवं मेघ-वर्णसे सुशोभित आप प्रभुके दिव्य स्वरूपका दर्शन करें। आषाढ़ मासकी शुक्ल द्वादशी तिथिके दिन इस विधानसे जो पुरुष शान्ति प्रदान करनेवाले मेरे इस पवित्र कर्मका अनुष्ठान करता है, वह जन्म और मरणके बन्धनसे मुक्त हो जाता है। देवि! ये ऋतुओंके

१०७- कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश) का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा

अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०५

अनुसार उत्तम कर्म हैं, जिनका मैंने तुमसे वर्णन किया है। महाभागे! यह वृत्त सर्वथा गोपनीय है। इसके प्रभावसे मेरे कर्मपरायण रहनेवाले मनुष्य संसारसागरको तर जाते हैं। देवता भी इसे नहीं जानते; क्योंकि मैं भगवान् नारायण यहाँ स्वयं वराहके रूपमें विराजमान हूँ। इस प्रकारके ज्ञानका उन्हें भी अभाव है। यह विषय दीक्षा-हीन, मूर्ख, चुगली करनेवाले, निन्दित शिष्य एवं शास्त्रके अर्थोंमें दोषारोपण करनेवालेसे नहीं कहना चाहिये। गोघाती एवं धूर्तोंके बीच भी इसका कथन अनुचित है; क्योंकि उनके मध्य इसको कहनेसे लाभके बदले हानि ही होती है। जो भगवान्‌में श्रद्धा रखनेवाले हैं तथा जिन्होंने धार्मिक दीक्षा ली है, उनके सामने ही इसकी व्याख्या करनी चाहिये।

[अध्याय १२४]


माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—पवित्र व्रतोंका अनुष्ठान करनेवाली भगवती वसुंधराने छः ऋतुओंके वैष्णव-कृत्योंका वर्णन सुनकर भगवान् नारायणसे पुनः पूछा—'भगवन्! आपने मङ्गल एवं पवित्रमय जिन विषयोंका वर्णन किया है, जिनकी स्वर्गादि लोकों तथा मेरे भूलोकमें प्रसिद्धि हो चुकी है, वे आपके—वैष्णव-धर्मके कृत्य मेरे मनको आनन्दित कर रहे हैं। माधव! आपके मुखारविन्दसे निकले हुए इन कर्मोंको सुनकर मेरी बुद्धि निर्मल हो गयी। पर मेरे मनमें एक सूक्ष्म कौतूहल उत्पन्न हो गया है। मेरा हित करनेके विचारसे उसे आप बतलानेकी कृपा कीजिये। भगवन्! आप अपनी जिस मायाका सर्वदा वर्णन किया करते हैं, उसका स्वरूप क्या है तथा उसे 'माया' क्यों कहा जाता है? मैं इसे तथा इसके आन्तरिक रहस्योंको जानना चाहती हूँ।'

इसपर मायापति भगवान् नारायण हँसकर बोले—'पृथ्वी देवि! तुम जो मुझसे यह मायाकी बात पूछ रही हो, इसे न पूछनेमें ही तुम्हारी भलाई है। तुम व्यर्थमें यह कष्ट क्यों मोल लेना चाहती हो? इसे देखनेसे तो तुम्हें कष्ट ही होगा। ब्रह्मासहित रुद्र एवं इन्द्र आदि देवता भी आजतक मुझे तथा मेरी मायाको जाननेमें असफल रहे हैं, फिर तुम्हारी तो बात ही क्या? विशालाक्षि! जब मेघ पानी बरसाते हैं तो जलसे सारा जगत् भर उठता है। पर कभी वही सारा देश फिर शुष्कबंजर बन जाता है। कृष्णपक्षमें चन्द्रदेव क्षीण होते हैं और शुक्लपक्षमें बढ़ते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो प्रभाव है। सुन्दरि! अमावास्याकी रात्रिमें चन्द्रमा दृष्टिगोचर नहीं होते, हेमन्त-ऋतुमें कुएँका जल गर्म हो जाता है—विचारकी दृष्टिसे देखें तो यह सब मेरी माया ही है। इसी प्रकार ग्रीष्म-ऋतुमें जल ठंडा हो जाता है। पश्चिम दिशामें जाकर सूर्य अस्त हो जाते हैं। पुनः वे प्रातःकाल पूरबमें उदित होते हैं। प्राणियोंके शरीरमें रक्त और शुक्र—इन दोनोंका समावेश रहता है, वस्तुतः यह सब मेरी माया ही तो है। सुन्दरि! प्राणी गर्भमें आता है, उसे वहाँ सुख और दुःखका अनुभव होता है, पुनः उत्पन्न हो जानेपर उसे वह बात भूल जाती है। अपने कर्ममें रचा-पचा जीव अपने स्वरूपको भूल जाता है, उसकी स्पृहा समाप्त हो जाती है, वस्तुतः यह सब मेरी मायाका ही प्रताप है। कर्मके प्रभावसे जीव दूसरी जगह पहुँच जाता है। शुक्र और रक्तके संयोगसे जीवधारियोंकी उत्पत्ति होती है, दो भुजाएँ, दो पैर, बहुत-सी अँगुलियाँ, मस्तक, कटि, पीठ,

२०६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२५

पेट, दाँत, ओंठ, नाक, कान, नेत्र, कपोल, ललाट और जीभ इत्यादिसे संगठित प्राणीकी उत्पत्ति मेरी मायाका ही चमत्कार है। वही प्राणी जब खाता-पीता है तो जठराग्निके द्वारा उसका पाचन होता है। तत्पश्चात् जीवके शरीरसे वही अधोमार्गसे बाहर निकल जाता है, यह सब मेरी प्रबल मायाकी ही करामात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँच विषयोंमें अन्न खानेसे प्रवृत्ति होती है, ये सभी कार्य मेरी मायाकी ही देन हैं।

देवि! कुछ जल आकाशस्थ बादलोंमें लटके रहते हैं और कुछ जलराशि भूमिपर नदी, सरोवर आदिमें रहती है। पर जिन नदियों आदिमें इस जलकी प्रतिष्ठा है, वे नदियाँ भी कभी बढ़ती और कभी घटती हैं—यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। वर्षा-ऋतुमें सभी नदियोंमें अथाह जल हो जाता है, बावलियाँ और तालाब जलसे भर जाते हैं, पर ग्रीष्म-ऋतुमें वे ही सब सूख जाते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो बल है। मेघ ‘लवणसमुद्र’ से खारा जल लेकर मधुर जलके रूपमें उसे भूलोकमें बरसाते हैं, यह मेरी मायाका ही प्रभाव है। रोगसे दुःखी हुए कितने प्राणी रसायन तथा ओषधियाँ खाते हैं और उस ओषधिके प्रभावसे नीरोग हो जाते हैं, किंतु कभी उसी ओषधिके देनेपर प्राणीकी मृत्यु भी हो जाती है, उस समय मैं ही कालका रूप धारण कर ओषधिकी शक्तिका हरण कर लेता हूँ, यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। पहले गर्भकी रचना होती है, इसके उपरान्त पुरुष उत्पन्न हो जाता है, फिर युवावस्था होती है, बुढ़ापा भी आ जाता है, जिसमें सभी इन्द्रियोंकी शक्ति समाप्त हो जाती है—यह सब मेरी मायाका बल है। भूमिमें बीज गिराया जाता है और उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति हो जाती है। तत्पश्चात् वह अङ्कुर अद्भुत पत्तोंसे सम्पन्न हो जाता है—यह विचित्रता मेरी मायाका ही स्वरूप है। एक ही बीज गिरानेसे वैसे ही अनेक अन्नके दाने निकल जाते हैं, वस्तुतः मैं ही अपनी मायाके सहयोगसे उसमें अमृत शक्तिकी उत्पत्ति कर देता हूँ।

जगत्को विदित है कि गरुड़ मुझ भगवान् विष्णुका वहन करते हैं। वस्तुतः मैं ही स्वयं गरुड़ बनकर वेगसे अपने-आपको वहन करता हूँ। जितने देवता जो यज्ञका भाग पाकर संतुष्ट होते हैं, उस अवसरपर मैं ही अपनी इस मायाका सृजनकर उन अखिल देवताओंको तृप्त करता हूँ, किंतु सभी प्राणी यही जानते हैं कि ये देवता ही सदा यज्ञका भाग ग्रहण करते हैं। पर वस्तुतः मैं ही मायाकी रचना कर देवताओंके लिये यज्ञ कराता हूँ। बृहस्पतिजी यज्ञ कराते हैं—यह जानकर संसारमें सभी लोग उनकी सेवा करते हैं। पर आङ्गिरसी मायाका सृजन करना और देवताओंके लिये यज्ञकी व्यवस्था करना मेरा ही काम है। सम्पूर्ण संसार जानता है कि वरुण देवताकी कृपासे समुद्रकी रक्षा होती है, किंतु वरुणसे सम्बन्ध रखनेवाली इस मायाका निर्माण कर मैं ही महान् समुद्रकी रक्षा करता हूँ। सारा विश्व यही जानता है कि कुबेरजी धनाध्यक्ष हैं। परंतु रहस्य यह है कि मैं ही मायाका आश्रय लेकर कुबेरके भी धनकी रक्षा करता हूँ। ‘इन्द्रने ही वृत्रासुरको मारा था,’ इस प्रकारकी बात संसार जानता है, किंतु वज्रसे वस्तुतः मैंने ही उसे मारा था। सूर्य, ध्रुव आदि तपते हैं—ऐसी बात सर्वविदित है किंतु तथ्य यह है कि इनमें मेरा ही तेज है। संसारमें लोग कहते हैं, अरे! जल कहाँ चला गया ? पर बात यह है कि बड़वानलका रूप धारणकर सम्पूर्ण जलका शोषण मैं ही करता हूँ। मायासे ओत-प्रोत वायुरूप बनकर मेघोंको संचालित करना मेरा ही

अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०७

कार्य है। अमृतका निवास कहाँ है? इस गहन विषयको देवता भी नहीं जानते हैं, पर तथ्य यह है कि मेरी मायाके शासनसे वह ओषधिमें निवास करता है। संसार जानता है कि राजा ही प्रजाओंकी रक्षा करता है। किंतु तथ्य यह है कि राजाका रूप धारण करके मैं ही स्वयं पृथ्वीका पालन करता हूँ। युगकी समाप्तिके अवसरपर ये जो बारह सूर्य उदित होते हैं, उनमें मैं ही अपनी शक्तिका आधान करके वह कार्य सम्पन्न करता रहता हूँ। वसुंधरे! संसारमें मायाकी सृष्टि करना मुझपर निर्भर है। देवि! सूर्य अपने किरणसे सम्पूर्ण जगत्में निरन्तर ताप पहुँचाता है। ऐसी स्थितिमें किरणमयी मायाकी सृष्टि करना और सम्पूर्ण संसारमें उसका प्रसारण करना मेरे ही हाथका खेल है। जिस समय संवर्तक मेघ मूसल-जैसी धाराओंसे जल बरसाते हैं, उस अवसरपर मायाका आश्रय लेकर संवर्तक मेघोंद्वारा मैं ही समस्त जगत्‌को जलसे भर देता हूँ। वरारोहे! मैं जो शेषनागकी शय्यापर सोता हूँ, यह मेरी मायाका ही पराक्रम है। शेषनागका रूप धारण करना और उनपर शयन करना यह सब एकमात्र मेरी योगमायाका ही कार्य है। वसुंधरे! वाराही मायाका आश्रय लेकर मैंने तुम्हें ऊपर उठाया था—क्या तुम यह भूल गयी?

तुम भी वैष्णवी मायाका लक्ष्य हुई हो, क्या इस बातको नहीं जानती हो। सुश्रोणि! सत्रह बार तो तुम मेरे दाढ़ोंपर नित्य प्रलयकालमें आश्रय पा चुकी हो। उस समय मेरे द्वारा मायाका सृजन हुआ था और तुम 'एकार्णव'—समुद्रमें डूब रही थी। मैं मायाके ही योगसे जलमें रहता हूँ। ब्रह्मा और रुद्रका सृजन करना और भरण-पोषण करना मेरी ही मायाका कार्य है। फिर भी मेरी मायासे मोहित हो जानेके कारण वे मेरी इस मायाको नहीं जानते हैं। पितरोंका समुदाय जो सूर्यके समान तेजस्वी है, वह भी वस्तुतः मैं ही हूँ तथा पितृमयी मायाका आश्रय लेकर पितरोंका रूप धारण कर मैं ही पितृभाग कव्यको ग्रहण करता हूँ। अधिक क्या, एक दूसरी विचित्र बात सुनो, जो एक बार एक (पुरुष) ऋषि भी मायाद्वारा स्त्रीके स्वरूप (योनि)-में परिणत (परिवर्तित) कर दिये गये थे।

पृथ्वी बोली—भगवन्! उस ऋषिने कौन-सा अपकर्म किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें स्त्रीकी योनि प्राप्त हुई? इस बातसे तो मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आप यह सारा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। उस ब्राह्मणश्रेष्ठने फिर स्त्रीरूप धारण कर कौन-से पापयुक्त कर्म किये, यह सब भी विस्तारसे बतायें। पृथ्वीकी बात सुनकर श्रीभगवान् अत्यन्त प्रसन्न हो गये और मधुर वचनमें कहने लगे, देवि! यह विषय अत्यन्त गूढ़ और महत्त्वपूर्ण है। सुन्दरि! तुम यह धर्मयुक्त कथा सुनो। देवि! मेरी माया ज्ञान एवं विश्वकी सभी वस्तुओंको आच्छादित किये है, उसकी बात सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस मायाके प्रभावसे सोमशर्मा नामक ऋषि भी प्रभावित हुए थे। इससे वे उत्तम, मध्यम और अधम—अनेक प्रकारकी स्थितियोंके चक्करमें घूमते रहे। फिर मेरी मायाकी प्रेरणासे उन्हें पुनः ब्राह्मणत्व सुलभ हुआ। सोमशर्मा उत्तम ब्राह्मण होकर भी स्त्रीकी योनिमें परिवर्तित हो गये, यद्यपि उसमें भी उनके द्वारा कोई विकृत कर्म नहीं हुआ और न कोई अपराध ही किया। वसुंधरे! बात यह है कि वे (सोमशर्मा) सदा मेरी आराधना, उपासनादि कर्मोंमें ही लगे रहते थे। वे निरन्तर मेरी रमणीय आकृति—मेरे सुन्दर स्वरूपका ही चिन्तन करते रहते। भामिनि! इस प्रकार पर्याप्त समयतक उनकी भक्ति, तपश्चर्या, अनन्यभावसे स्तुति करते रहनेपर मैं उनपर प्रसन्न

२०८संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२५

हुआ। देवि! मैंने उस समय उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'ब्राह्मणदेवता! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ, तुम मुझसे जो चाहो वर माँग लो। रत्न, सुवर्ण, गौएँ तथा अकण्टक राज्य—जो कुछ तुम्हारे हृदयमें हो माँगो, मैं सब कुछ तुम्हें दे सकता हूँ। अथवा विप्रवर, उस स्वर्गका सुख, जहाँ वाराङ्गनाएँ तथा आनन्दका अनुभव करनेकी अनन्त सामग्रियाँ हैं तथा जो सुवर्णके भाण्डोंसे सुशोभित एवं धन और रत्नोंसे परिपूर्ण है, जहाँ अप्सराएँ दिव्य रूप धारण किये रहती हैं, उसे ही माँग लो। अथवा जो भी इष्ट वस्तु तुम्हारे ध्यानमें आती हो, वह सब मेरे वरसे तुम्हें सुलभ हो सकती है।'

वसुंधरे! उस समय मेरी बात सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने भूमिपर पड़कर मुझे साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मधुर शब्दोंमें कहने लगे—'देव! आप मुझपर यदि रुष्ट न हों तो मैं आपसे जो वर माँग रहा हूँ, वही दीजिये। भगवन्! आपके द्वारा निर्दिष्ट वरदानों—सुवर्ण, गौएँ, स्त्री, राज्य, ऐश्वर्य एवं अप्सराओंसे सुशोभित स्वर्ग आदिसे माधव! मेरा कोई भी प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपकी मायाका—जिसकी सहायतासे आप सारी क्रीडाएँ करते हैं, रहस्य ही जानना चाहता हूँ।'

वसुंधरे! ब्राह्मणकी बात सुनकर मैंने कहा—'द्विजवर! मायासे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ब्राह्मणदेव! तुम अनुचित तथा अकार्यकी कामना कर रहे हो।' पर मेरी मायासे प्रेरित होकर उस ब्राह्मणने मुझसे पुनः यही कहा—'भगवन्! आप यदि मेरे किसी कर्म अथवा तपस्यासे तनिक भी संतुष्ट हैं तो मुझे बस वही वर दें (अर्थात् अपनी मायाका ही दर्शन करायें)।'

अब मैंने उस तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'द्विजवर! तुम 'कुब्जाम्रक'* तीर्थमें जाओ और वहाँ गङ्गामें स्नान करो, इससे तुम्हें मायाका दर्शन होगा।' देवि! मेरी इस बातको सुनकर ब्राह्मणने मेरी प्रदक्षिणा की और दर्शनकी अभिलाषासे वह ऋषिकेश चला गया। वहाँ उसने बड़ी सावधानीसे अपनी कुण्डी, दण्ड और भाण्डको गङ्गातटपर एक ओर रखकर विधिपूर्वक तीर्थकी पूजा की और उसके बाद वह गङ्गामें स्नान करनेके लिये उतरा। वह स्नानार्थ अभी डूबा ही था और उसके अङ्ग बस भींग ही रहे थे कि इतनेमें देखता है कि वह किसी निषादके घरमें उसकी स्त्रीके गर्भमें प्रविष्ट हो गया है। उस समय गर्भके क्लेशसे जब उसे असह्य वेदना होने लगी तो वह अपने मनमें सोचने लगा—'मेरे द्वारा अवश्य ही कोई बुरा कर्म बन गया है, जिससे मैं इस निषादीके गर्भमें आकर नरक-यातना भोग रहा हूँ। अहो! मेरी तपस्या एवं जीवनको धिक्कार है, जो इस हीन स्त्रीके गर्भमें वास कर रहा हूँ और नौ द्वारों तथा तीन सौ हड्डियोंसे पूर्ण विष्ठा और मूत्रसे सने रक्त-मांसके कीचड़में पड़ा हुआ हूँ। यहाँकी दुर्गन्ध असह्य है तथा कफ, पित्त, वायुसे उत्पन्न रोगों-दुःखोंकी तो कोई गणना ही नहीं। बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन? मैं इस गर्भमें महान् दुःख पा रहा हूँ? अरे! देखो तो कहाँ तो वे भगवान् विष्णु, कहाँ मैं और कहाँ वह गङ्गाजीका जल? किसी प्रकार इस गर्भसे मेरा छुटकारा हो जाय तो फिर मैं उसी भक्तिकार्य—गङ्गा-स्नानादिमें लग जाऊँगा।'

इस प्रकार सोचते-सोचते वह ब्राह्मण शीघ्र ही निषादीके गर्भसे बाहर आया। पर भूमिपर गिरते


* यह 'ऋषिकेश' का ही अन्यतम (एक दूसरा) नाम है। इसका वर्णन वराहपु० अ० ५५, १२५-२६, महाभारत ३।८४।४०, कूर्मपुराण ३४।३४, ३६।१०, पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड २८।४० तथा 'अर्चावतारस्थलवैभवदर्पण' पृ० १०० आदिपर भी है (—'नन्दलाल दे')।

अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी ( हरिद्वार )-का माहात्म्य २०९

ही उसने जो गर्भमें निश्चय किया था, वह सब विस्मृत हो गया। अब वह धन-धान्यसे परिपूर्ण निषादके घरमें एक कन्याके रूपमें रहने लगा। भगवान् विष्णुकी मायासे मुग्ध होनेके कारण पूर्वकी कुछ भी बातें उसे याद न रहीं। इस प्रकार बहुत दिन बीत गये। फिर उस कन्याका विवाह हुआ। मायाके प्रभावसे ही उसके बहुतसे पुत्र और पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। अब कन्यारूपमें वह (ब्राह्मण) सभी भक्ष्य एवं अभक्ष्य वस्तुओंको भी खा लेता तथा पेय एवं अपेय वस्तुएँ भी पी लेता। वह निरन्तर (मत्स्यादि) जीवोंकी हिंसामें निरत रहता तथा कर्तव्याकर्तव्यज्ञानसे भी शून्य हो गया।

वसुंधरे! इस प्रकार जब निषादी स्त्रीरूपमें रहते उस ब्राह्मणके पचास वर्ष बीत गये, तब मैंने उसे पुनः स्मरण किया। वह (निषादीरूप ब्राह्मण) घड़ा लेकर विष्ठालिप्त वस्त्रोंको धोनेके लिये पुनः गङ्गाके तटपर गया और उसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये गङ्गाके जलमें प्रविष्ट हुआ। कड़ी धूपसे संतप्त होनेके कारण उसका शरीर पसीनेसे लथपथ-सा हो रहा था। अतः उसकी इच्छा हुई कि सिर डुबाकर स्नान कर लूँ। पर ऐसा करते ही वह तपस्याका धनी (निषादीरूप) ब्राह्मण उसी क्षण पूर्ववत् तपस्वी बन गया। स्नान करके बाहर निकलते ही उसकी दृष्टि पूर्वके रखे हुए दण्ड, कमण्डलु और वस्त्रोंपर पड़ी, जिन्हें देखते ही उसे पहले-जैसा ज्ञान उत्पन्न हो गया। पूर्व समयमें उस ब्राह्मणने जिस प्रकार विष्णुकी माया जाननेकी कामना की थी, वह भी उसे याद हो आयी; गङ्गासे बाहर निकलकर अब उसने अपने वस्त्र पहने और लज्जित होकर वह वहीं पुनः बालुकापर बैठकर योग एवं तपके विषयमें विचार करने लगा और कहने लगा—'अरे! मुझ पापीद्वारा कितने निन्दनीय अकार्य कर्म बन गये।'

इस प्रकार उसने अपनेको निन्दनीय मानकर बहुत धिक्कारा और कहने लगा—'साधु पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करनेवाले मुझको धिक्कार है। मैं सदाचारसे सर्वथा भ्रष्ट हो गया था, जिस कारण मुझे निषादकी योनिमें जाना पड़ा। इस कुलमें उत्पन्न होनेपर मैंने कितने ही भक्ष्य और अभक्ष्य वस्तुओंका सेवन किया और सभी प्रकारके जीवोंका वध किया, अभक्ष्य-भक्षण तथा अपेय वस्तुओंका पान किया और न बेचने योग्य वस्तुओंका विक्रय किया, मुझे वाच्यावाच्यका भी ध्यान न रहा। निषादके सम्पर्कसे मैंने अनेक पुत्रों और पुत्रियोंकी भी उत्पत्ति की। किस दुष्कर्मके फलस्वरूप मुझे निषादकी पत्नी होना पड़ा, यह भी विचार करने योग्य है।'

वसुंधरे! इधर तो वह ब्राह्मण इस प्रकार यहाँ ऐसा सोच रहा था, उधर निषाद क्रोध एवं दुःखसे पागल हो रहा था। वह उसी समय अपने पुत्रोंसे घिरा अपनी भार्याको खोजता हुआ हरिद्वार पहुँचा और वहाँ प्रत्येक तपस्वीसे अपनी उस स्त्रीके विषयमें पूछने लगा। फिर वह विलाप-सा करता हुआ कहने लगा—'प्रिये! तुम मुझे तथा अपने सभी पुत्रोंको छोड़कर कहाँ चली गयी? अभी दूध पीनेवाली तुम्हारी छोटी बालिका भूखसे व्याकुल होकर रो रही है। फिर वह वहाँ उपस्थित तपस्वियोंसे पूछने लगा—'तपस्वियो! मेरी पत्नी जल लेनेके लिये हाथमें घड़ा लेकर गङ्गाके तटपर आयी थी। क्या आपलोगोंने उसे देखा है? उस समय सभी मनुष्य जो हरिद्वारमें आये हुए थे, वे उस तपस्वी ब्राह्मण तथा उसके घड़ेको यथापूर्व उपस्थित देख रहे थे। इसके पश्चात् दुःखसे संतप्त उस निषादने जब अपनी प्रिय भार्याको नहीं देखा तो उसकी दृष्टि वस्त्र और घड़ेपर पड़ी। अब वह अत्यन्त करुण

२१०संक्षिप्त श्रीवराहपुराण[ अध्याय १२५

विलाप करने लगा—'अहो! मेरी स्त्रीके ये वस्त्र और घड़ा तो नदीके तटपर ही पड़े हैं, किंतु गङ्गामें स्नान करनेके लिये आयी हुई मेरी पत्नी नहीं दिखायी पड़ रही है। लगता है, जब वह बेचारी दुःखी अबला स्नान कर रही होगी उस समय जिह्वालोलुप किसी ग्राहने उसे पानीमें पकड़ लिया होगा अथवा वह पिशाचों, भूतों या राक्षसोंका आहार बन गयी। प्रिये! मैंने कभी जाग्रत् या स्वप्नमें भी तुमसे कोई अप्रिय बात नहीं कही। लगता है किसी रोगसे वह उन्मत्त-सी होकर गङ्गाके तटपर चली आयी थी। पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पापकर्म किया था, जो मेरे इस महान् संकटका कारण बन गया, जिसके फलस्वरूप मेरी पत्नी मेरे देखते-ही-देखते आँखोंसे ओझल हो गयी और अब उसका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। फिर वह प्रलापमें कहने लगा—'प्रिये! तुम सदा मेरे चित्तका अनुसरण करती रही हो। सुभगे! मेरे पास आ जाओ। देखो, ये बालक डर गये हैं, इधर-उधर भटक रहे हैं और इन्हें अनाथ-जैसे क्लेशोंका सामना करना पड़ता है। सुन्दरि! तुम मुझे तथा इन तीन नन्हे-नन्हे बालकोंको तो देखो! चारों कन्याएँ और सभी बच्चे बड़ा कष्ट पा रहे हैं, इनपर ध्यान दो। मेरे ये छोटे-छोटे पुत्र तुम्हें पानेके लिये लालायित हो रो रहे हैं। मुझ पापीकी इन संतानोंकी तुम रक्षा करो। मुझे भी क्षुधा सता रही है, मैं प्याससे भी अत्यन्त व्याकुल हूँ। तुम्हें इसका पता होना चाहिये।'

(भगवान् वराह कहते हैं—) कल्याणि! उस समय जो ब्राह्मण स्त्रीका जन्म पाकर निषादकी पत्नी बना था और जो अब मेरी उस मायासे मुक्त होकर बैठा हुआ था, निषादके इस प्रकार कहनेपर लज्जाके साथ उससे कहने लगा—'अब तुम जाओ। तुम्हारी वह भार्या यहाँ नहीं है। वह तुम्हारा सुख और संयोग लेकर चली गयी और अब कभी न लौटेगी।' इधर वह निषाद जहाँ-तहाँ भटककर विलाप ही करता रहा। अब उस ब्राह्मणका हृदय करुणासे भर गया और कहने लगा—'जाओ, अब क्यों इतना कष्ट पा रहे हो। अनेक प्रकारके आहार हैं, उनसे बच्चोंकी रक्षा करना। ये बच्चे दयाके पात्र हैं। तुम कभी भी इनका परित्याग मत करना।'

संन्यासीकी बात सुनकर उनके सामने दुःख एवं शोकसे भरे हुए निषादने उनसे मधुर वाणीमें कहा—'निश्चय ही आप प्रधान मुनिवरोंमें भी श्रेष्ठ एवं धर्मात्माओंमें भी परम धर्मात्मा पुरुष हैं। विप्रवर! तभी तो आपके मीठे वचनोंसे मुझे सान्त्वना मिल गयी।' उस समय निषादकी बात सुनकर श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले मुनिके मनमें भी दुःख एवं शोक छा गया। उन्होंने मधुर वचनमें कहा—'निषाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब विलाप करना बंद करो। मैं ही तो तुम्हारी प्रिय पत्नी बना था। वही मैं यहाँ गङ्गातटपर आया और स्नान करते हुए मैं एक मुनिके रूपमें परिवर्तित हो गया।'

फिर तो संन्यासीकी बात सुनकर निषादकी भी चिन्ताएँ दूर हो गयीं। उसने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! आप यह क्या कह रहे हैं, आजतक कभी ऐसी घटना नहीं घटी है। अथवा ऐसी घटना तो सर्वथा असम्भव है कि कोई स्त्री होकर पुनः पुरुष हो जाय।' अब दुःखके कारण ब्राह्मणके मनमें भी घबराहट उत्पन्न हो गयी। उस गङ्गाके तटपर ही ब्राह्मणने निषादसे मीठी बात कही—'धीवर! अब यथाशीघ्र इन बालकोंको लेकर अपने देशमें चले जाइये और क्रमानुसार सभी बच्चोंपर यथायोग्य स्नेह रखकर इनकी देखभाल रखिये।'

अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २११

ब्राह्मणके इस प्रकार कहनेपर भी निषाद वहाँसे नहीं गया, उसने मीठे स्वरमें उनसे पूछा—'विप्रवर! आपके द्वारा कौन-सा पाप बन गया था, जिससे आप स्त्री बन गये थे और अब फिर पुरुष हो गये? यह मुझे बतानेकी कृपा करें।'

इसपर ऋषिने कहा—'मैं हरिद्वार तीर्थके तटवर्ती क्षेत्रोंमें भ्रमण करता और एक ही बार भोजन कर जगदीश्वर जनार्दनकी पूजा करता रहता था। उन प्रभुके दर्शनकी आकाङ्क्षासे मैंने बहुत-से उत्तम धर्म-कर्म किये। बहुत समय बीत जानेके पश्चात् मुझे भगवान् श्रीहरिने दर्शन दिया और मुझसे वर माँगनेको कहा। मैंने प्रार्थना की—'प्रभो! आप भक्तोंपर कृपा करनेवाले सर्वव्यापक पुरुष हैं। आप मुझे अपनी मायाका दर्शन कराइये।'

इसपर भगवान् विष्णुने कहा था—'ब्राह्मणदेव! माया देखनेकी इच्छा छोड़ दो।' किंतु मैंने बार-बार उनसे वही आग्रह किया, तब भगवान्‌ने कहा—'अच्छा, नहीं मानते हो तो 'कुब्जाम्रक' क्षेत्र (ऋषिकेश)-में जाओ। वहाँ गङ्गामें स्नान करनेपर तुम्हें माया दिखलायी पड़ेगी और वे अन्तर्धान हो गये। मैं भी माया-दर्शनकी लालसासे गङ्गातटपर गया और वहाँ अपने दण्ड, कमण्डलु एवं वस्त्रको यत्नसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये निर्मल जलमें पैठा। इसके बाद मैं कुछ भी न जान सका कि कहाँ क्या है और क्या हो रहा है? तत्पश्चात् मैं किसी मल्लाहिनके उदरसे कन्याके रूपमें उत्पन्न होकर तुम्हारी पत्नी बन गया। वही मैं आज फिर किसी कारण जब गङ्गाके जलमें पैठकर स्नान करने लगा तो पहले-जैसे ही ऋषिके रूपमें परिणत हो गया हूँ। निषाद! देखो, पहले-जैसे ही यहाँ मेरी कुण्डी और मेरे वस्त्र भी विराजमान हैं। पचास वर्षोंतक मैं तुम्हारे घरमें रह चुका हूँ, परंतु मेरे पास जो दण्ड एवं वस्त्र थे, जिन्हें गङ्गाके तटपर मैंने रखा था, अभी जीर्ण-शीर्ण नहीं हुए हैं और न वे गङ्गाके प्रवाहोंद्वारा प्रवाहित ही हुए हैं।

ब्राह्मणके इस प्रकार कहते ही वह निषाद सहसा गायब हो गया। उसके साथ जो बालक थे, वे भी तिरोहित हो गये। देवि! यह देखकर वह ब्राह्मण भी चकित होकर पुनः तपमें संलग्न हो गया। उसने अपनी भुजाओंको ऊपर उठाकर साँसकी गति भी रोक ली और केवल वायुके आहारपर रहने लगा। इस तरह अपराह्न हो गया। इस प्रकार कुछ समय तपस्या कर जब वह जलसे बाहर आया तो श्रद्धापूर्वक पूजाके लिये कुछ पुष्पोंको तोड़कर विधिपूर्वक भगवान्‌की पूजा करनेके लिये वीरासनसे बैठ गया। अब बहुत-से प्रधान तपस्वी ब्राह्मणोंने जो वहाँ गङ्गामें स्नान करनेके लिये आये थे, उसे घेर लिया और उससे कहने लगे—'द्विजवर! आपने आज पूर्वाह्नमें अपने दण्ड, कमण्डलु और अन्य उपकरण यहाँ रख दिये थे और स्नान कर मल्लाहोंके पास गये थे, फिर क्या आप यह स्थान भूलकर कहीं अन्यत्र चले गये थे? आपके आनेमें इतनी देर कैसे हुई?'

देवि! जब उस मुनिने ब्राह्मणोंकी बात सुनी तो वह मौन हो गया। साथ ही बैठकर वह मन-ही-मन ब्राह्मणोंद्वारा निर्दिष्ट बातपर सोचने लगा। "एक ओर तो उधर पचास वर्षका समय व्यतीत हो गया है और इधर अमावस्या भी आज ही है। ये सब ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं 'तुमने पूर्वाह्नमें अपने वस्त्रोंको यहाँ स्नानके लिये रखा तो अब अपराह्नमें इन्हें लेने क्यों आये हो? तुम्हें इतनी देर कैसे हो गयी,' यह सब क्या बात है?" देवि! ठीक इसी समय मैंने ब्राह्मणको पुनः अपना रूप

२१२संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२५

दिखलाया और कहा—'ब्राह्मणदेव! आप कुछ घबड़ाये-से क्यों दीखते हैं? क्या आपने कुछ विशेष बात देखी है? आप कुछ मुझे व्यग्र-से दीख रहे हैं। अस्तु! जो कुछ हो, अब आप पूर्ण सावधान हो जाइये!'

मेरे इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने अपना मस्तक भूमिपर टेक दिया और दुःखी होकर बार-बार दीर्घ श्वास लेता हुआ कहने लगा—

"जगद्गुरो! ये ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं कि 'तुमने पूर्वाह्नकी वेलामें वस्त्र, दण्ड और कमण्डलु आदि वस्तुएँ यहाँ रखीं और फिर अपराह्नमें यहाँ आये हो? क्या तुम इस स्थानको भूल गये थे?' माधव! इधर समस्या यह है कि निषादकी योनिमें कन्यारूपसे उत्पन्न होकर मैं एक निषादकी स्त्रीके रूपमें पचास वर्षोंतक रहा। उस शरीरसे उस कुकर्मी निषादद्वारा मेरे तीन पुत्र और चार पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। फिर एक दिन जब मैं गङ्गामें स्नान करनेके लिये यहाँ आकर तटपर अपना वस्त्र रखकर निर्मल जलमें स्नान करने लगा और डुबकी लगायी तो पुनः मुझे मुनियोंद्वारा अभिलषित तपस्वीका रूप प्राप्त हो गया। माधव! मैं तो सदा आपकी सेवामें लगा रहता था, किंतु पता नहीं, मेरे किस विकृत कर्मका ऐसा फल हो गया, जिसके परिणामस्वरूप मुझे निषादके यहाँ नरककी यातना भोगनी पड़ी? मैंने तो केवल माया-दर्शनका वर माँगा था, परंतु मेरे ध्यानमें और कोई पाप नहीं आता, जिसके फलस्वरूप आपने मुझे नरकमें गिरा दिया।"

वसुंधरे! उस समय वह ब्राह्मण बड़ी करुणाके साथ ग्लानि प्रकट कर रहा था। इसपर मैंने उससे कहा—"ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप चिन्ता न करें। मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ब्राह्मणदेवता! आप मुझसे अन्य वर माँग लें; किंतु आपने मुझसे वरके रूपमें माया-दर्शनकी ही याचना की। द्विजवर! आपने वैष्णवी माया देखनेकी इच्छा की थी, उसे ही तो देखा है। विप्रवर! दिन, अपराह्न, पचास वर्ष और निषादका घर—तत्त्वतः यह सब कहीं कुछ भी नहीं है। यह सब केवल वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है। आपने कोई भी अशुभ कर्म नहीं किया है। आश्चर्यमें पड़कर आप जो पश्चात्ताप कर रहे हैं, वह सब भी मायाके अतिरिक्त कुछ नहीं है। न तुम्हारे द्वारा किया हुआ अर्चन भ्रष्ट हुआ है, न तुम्हारी तपस्या ही नष्ट हुई है। द्विजवर! पूर्वजन्ममें तुमने कुछ ऐसे कर्म अवश्य किये थे, जिसके फलस्वरूप यह परिस्थिति तुम्हें प्राप्त हुई। हाँ! पूर्वजन्ममें तुमने मेरे एक शुद्ध ब्राह्मण भक्तका अभिवादन नहीं किया था। यह उसीका फल है कि तुम्हें इस दुःखपूर्ण प्रारब्धका भोग भोगना पड़ा। मेरे शुद्ध भक्त मेरे ही स्वरूप हैं। ऐसे ब्राह्मणोंको जो लोग प्रणाम करते हैं, वे वस्तुतः मुझे ही प्रणाम करते हैं और वे तत्त्वतः मुझे जान जाते हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। जो ब्राह्मण मेरे दर्शनकी अभिलाषा करते हैं, वे ब्राह्मण मेरे भक्त, शुद्धस्वरूप एवं पूज्य हैं। विशेषरूपसे कलियुगमें मैं ब्राह्मणका ही रूप धारण करके रहता हूँ, अतएव जो ब्राह्मणका भक्त है, वह निःसंदेह मेरा ही भक्त है। ब्राह्मण! अब तुम सिद्ध हो चुके हो, अतः अपने स्थानपर पधारो। जिस समय तुम अपने प्राणोंका त्याग करोगे, उस समय तुम मेरे उत्तम स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त करोगे, इसमें कोई संदेह नहीं।"

वरारोहे! इस प्रकार कहकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और उस ब्राह्मणने फिर कठोर तपस्या आरम्भ की। अन्तमें वह 'मायातीर्थ'* में अपना


* यह 'मायातीर्थ' या 'मायापुरी'—'हरिद्वार' का ही नामान्तर है।

१०८- दीक्षासूत्रका वर्णन

अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा [ २१३

शरीर त्यागकर श्वेतद्वीपमें पहुँचा, जहाँ वह धनुष, बाण, तलवार और तूणीर (तरकस) धारणकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मुझ मायाके आश्रयदाताका सदा दर्शन करता रहता है। अतः वसुंधरे! तुम्हें भी इस मायासे क्या प्रयोजन? माया देखनेकी इच्छा करना ठीक नहीं। देवता, दानव और राक्षस भी मेरी मायाका रहस्य नहीं जानते।

वसुंधरे! यह 'माया-चक्र' नामक मायाकी आश्चर्यमयी कथा मैंने तुम्हें सुनायी। यह आख्यान पुण्योंसे युक्त तथा सुखप्रद है। जो पुरुष भक्तोंके सामने इसकी व्याख्या करता है और भक्तिहीनों तथा शास्त्रोंमें दोषदृष्टि रखनेवालोंसे नहीं कहता, उसकी जगत्में प्रतिष्ठा होती है। देवि! जो व्रती पुरुष इसका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक तपपूर्वक मेरे सामने इसका पाठ किया। वसुंधरे! इस महान् आख्यानको जो सदा श्रवण करता है, उसकी बुद्धि कभी मायासे लिप्त नहीं होती और न उसे निकृष्ट योनियोंमें ही जाना पड़ता है।

[ अध्याय १२५]


कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा

इस प्रकार मायाके पराक्रमकी बातको सुनकर पृथ्वीने भगवान्‌से फिर पूछा।

पृथ्वी बोली—'भगवन्! आपने जिस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थकी चर्चा की, उसमें रहने तथा स्नानादि करनेसे जो पुण्य होता है, आप अब उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले—पृथ्वीदेवि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थका जो सार-तत्त्व है, अब उसे मैं तुम्हें विस्तारसे बतला रहा हूँ। सुन्दरि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थकी जैसे उत्पत्ति हुई, जिस क्रमसे यह 'तीर्थ' बना, वहाँ जो अनुष्ठेय धर्म है तथा वहाँ प्राणत्याग करनेपर जिस लोककी प्राप्ति होती है, यह सब तुम ध्यान देकर सुनो। वसुंधरे! आदि सत्ययुगमें जब पृथ्वी जलमग्न थी, तब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैंने मधु और कैटभ नामक राक्षसोंका वध किया और ब्रह्मदेवकी रक्षा की। उसी समय मेरी दृष्टि अपने आश्रित भक्त रैभ्यमुनिपर पड़ी। वे अत्यन्त निष्ठासे सदा मेरी स्तुति-आराधनामें निरत रहते थे। वे युक्तिमान्, गुणी, परम पवित्र, कार्यकुशल और जितेन्द्रिय पुरुष थे और ऊपर बाँहें उठाकर दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें संलग्न रहे। वे एक हजार वर्षोंतक केवल जल पीकर तथा पाँच सौ वर्षोंतक शैवाल खाकर तपस्या करते रहे। देवि! महात्मा रैभ्यकी इस तपस्यासे मेरा हृदय करुणासे अत्यन्त विह्वल हो उठा। उस समय हरिद्वारके कुछ उत्तर पहुँचकर मैंने एक आम्रके वृक्षका आश्रय लिया और उन मुनिको तपस्या करते देखा। मेरे आश्रय लेनेसे वह आम्र-वृक्ष थोड़ा कुबड़ा हो गया। मनस्विनि! इस प्रकार वह स्थान 'कुब्जाम्रक' नामसे प्रसिद्ध हो गया। यहाँपर (स्वतः) मरनेवाला व्यक्ति भी मेरे लोकमें ही रह जाता है।

मैंने रैभ्यमुनिको कुबड़े आम्रवृक्षका रूप धारण कर दर्शन दिया था, फिर भी वे मुझे पहचान गये और घुटनोंके बल भूमिपर गिरकर मेरी स्तुति की। वसुंधरे! अपने व्रतमें अडिग रहनेवाले उन मुनिको इस प्रकार अपनी स्तुति तथा प्रणाम करते देखकर मैंने प्रसन्न मनसे उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मेरी बात सुनकर उन तपस्वीने मीठी वाणीमें कहा—'भगवन्! आप जगत्के स्वामी हैं और याचना करनेवालोंकी आशा पूर्ण करते हैं। भगवन्! मधुसूदन!! यदि

२१४संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२६

आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं यह चाहता हूँ कि जबतक यह संसार रहे तथा अन्य लोक रहें, तबतक आपका यहाँ निवास हो और जनार्दन जबतक आप यहाँ स्थित रहें, तबतक आपमें मेरी निष्ठा बनी रहे। प्रभो! यदि आप मुझपर संतुष्ट हैं तो मेरा यह मनोरथ पूर्ण करनेकी कृपा कीजिये।'

वसुंधरे! उस समय ऋषिवर रैभ्यकी बात सुनकर पुनः मैंने कहा—'ब्रह्मर्षे! बहुत ठीक। ऐसा ही होगा।' फिर उन ब्राह्मणने बड़े हर्षके साथ मुझसे कहा—'प्रभो! आप इस प्रधान तीर्थकी महिमा भी बतलानेकी कृपा करें और मैं उसे सुनूँ। यही नहीं, इस क्षेत्रमें अन्य भी जितने क्षेत्र हैं, उनका भी आप माहात्म्य बतलायें।' देवि! तब मैंने कहा—'ब्रह्मन्! तुम मुझसे जो पूछ रहे हो, वह विषय तत्त्वपूर्वक सुनो। मेरा 'कुब्जाम्रक' तीर्थ परम पवित्र स्थान है। इसका सेवन करनेसे सभी सुख सुलभ हो जाते हैं। यह 'कुब्जाम्रक' तीर्थ कुमुदपुष्पकी आकृतिमें स्थित है। यहाँ केवल स्नान करनेसे मानव स्वर्ग प्राप्त कर लेता है। कार्तिक, अगहन एवं वैशाख मासके शुभ अवसरपर जो पुरुष यहाँ दुष्कर धर्मोंका अनुष्ठान करता है, वह स्त्री, पुरुष अथवा नपुंसक ही क्यों न हो—अपने प्राणोंका त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।'

वसुंधरे! 'कुब्जाम्रक'तीर्थमें जो दूसरा तीर्थ है, उसे भी बतलाता हूँ, सुनो। सुन्दरि! यहाँ 'मानस' नामसे मेरा एक प्रसिद्ध तीर्थ है। सुनयने! वहाँ स्नान कर मनुष्य इन्द्रके नन्दनवनमें जाता है और अप्सराओंके साथ देवताओंके वर्षसे एक हजार वर्षोंतक वह आनन्दका उपभोग करता रहता है।

वसुंधरे! अब यहाँके एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ सुनो—वह स्थान 'मायातीर्थ'के नामसे विख्यात है, जिसके प्रभावसे मायाकी जानकारी प्राप्त हो जाती है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला पुरुष दस हजार वर्षोंतक मेरी भक्तिमें रत रहता है। यशस्विनि! 'मायातीर्थ'में जो प्राण छोड़ता है, महान् योगियोंके समान वह मेरे लोकको प्राप्त होता है।

देवी पृथ्वि! अब यहाँका एक दूसरा तीर्थ बतलाता हूँ—उस तीर्थका नाम 'सर्वकामिक' है। वैशाख मासकी द्वादशी तिथिके दिन जो कोई वहाँ स्नान करता है, वह पंद्रह हजार वर्षोंतक स्वर्गमें निवास करता है। यदि इस 'सर्वकामिक' तीर्थमें वह प्राण त्याग करता है तो सभी आसक्तियोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त होता है।

सुलोचने! अब एक 'पूर्णमुख' नामक तीर्थकी महिमा बतलाता हूँ, जिसे कोई नहीं जानता। गङ्गाका जल इधर प्रायः सर्वत्र शीतल रहता है, किंतु यहाँ जिस स्थानपर गङ्गामें गर्म जल मिले, उसे ही 'पूर्णतीर्थ' समझना चाहिये। देवि! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य चन्द्रलोकमें प्रतिष्ठा पाता है और पंद्रह हजार वर्षोंतक उसे चन्द्र-दर्शनका आनन्द मिलता है। फिर जब वह स्वर्गसे नीचे गिरता है तो ब्राह्मणके घर उत्पन्न होता है और मेरा पवित्र भक्त, कार्य-कुशल और सम्पूर्ण धर्म एवं गुणोंसे सम्पन्न होता है और अगहन महीनेके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन प्राण त्यागकर वह मेरे लोकमें पहुँचता है, जहाँ वह सदा मुझे चतुर्भुजरूपमें प्रकाशित देखता है तथा पुनः कभी जन्म और मृत्युके चक्करमें नहीं पड़ता।

वसुंधरे! मैं अब पुनः एक दूसरे तीर्थका वर्णन करता हूँ। यहाँ वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशीके दिन तप तथा धर्मके अनुष्ठानके पश्चात् अपने शरीरका त्याग करनेवाला पुरुष मेरे लोकको प्राप्त करता है, जहाँ जन्म-मृत्यु, ग्लानि, आसक्ति, भय तथा अज्ञानजनित अभिनिवेशादिसे उसे किसी

१०९- क्षत्रियादि-दीक्षा एवं गणान्तिकादीक्षाकी विधि तथा दीक्षित पुरुषके कर्तव्य

अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१५

प्रकारका क्लेश नहीं होता। अब मैं (ऋषिकेश)- में ही स्थित एक दूसरे तीर्थकी बात बतलाता हूँ। वह 'करवीर' नामसे प्रसिद्ध है एवं सम्पूर्ण लोकोंको सुखी करनेवाला है। शुभे! अब उसका चिह्न भी बतलाता हूँ, जिसकी सहायतासे ज्ञानी पुरुष इसे पहचान सकें। सुन्दरि! माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशी तिथिके दिन मध्याह्न कालके समय इस 'करवीर' तीर्थमें कनेरके फूल खिल जाते हैं—यह निश्चय है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मनुष्य स्वतन्त्रतापूर्वक सर्वत्र अव्याहत- गमन करनेमें पूर्ण समर्थ हो जाता है। यदि माघ मासकी द्वादशी तिथिके दिन उस क्षेत्रमें किसीकी मृत्यु हो जाती है तो उसे ब्रह्मा, रुद्र और मेरे दर्शनका सौभाग्य प्राप्त होता है। वसुंधरे! अब एक दूसरे तीर्थका प्रसङ्ग सुनो। भद्रे! उस 'कुब्जाम्रकक्षेत्र' का यह स्थान मुझे बहुत प्रिय है। इस स्थानका नाम 'पुण्डरीकतीर्थ' है, जो महान् फल देनेकी शक्तिवाला है। सुमुखि! उस तीर्थका विशेष चिह्न बतलाता हूँ, सुनो—'सुन्दरि! द्वादशी तिथिके दिन मध्याह्नकालमें वहाँ रथके चक्केकी आकृतिवाला एक कछुआ विचरण करता है।' वसुमति! अब तुमसे इसके विषयमें एक दूसरी बात बताता हूँ, उसे सुनो—'सुन्दरि! वहाँ अवगाहन करनेपर 'पुण्डरीकयज्ञ' के अनुष्ठानका फल मिलता है। यदि वहाँ किसीकी मृत्यु होती है तो उसे दस 'पुण्डरीक' यज्ञोंके अनुष्ठानका फल प्राप्त होता है।'

अब मैं 'कुब्जाम्रक' (ऋषिकेश)-में स्थित एक दूसरे—'अग्नितीर्थ' की बात बतलाता हूँ, उसे सुनो—'देवि! द्वादशी तिथिके दिन पुण्यात्मा लोगोंको ही इस तीर्थकी स्थिति ज्ञात होती है। कार्तिक, अगहन, आषाढ़ एवं वैशाख मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीके दिन जो पुरुष उस तीर्थमें यत्नपूर्वक निवास करता है, वह उस तीर्थका रहस्य जान सकता है।' वसुंधरे! उस तीर्थका चिह्न यह है कि हेमन्त ऋतुमें तो वहाँका जल उष्ण रहता है, पर ग्रीष्म ऋतुमें वह शीतल हो जाता है। महाभागे! इसी विचित्रताके कारण इस स्थानका नाम 'अग्नितीर्थ' पड़ गया है।

देवि! अब एक दूसरे तीर्थका परिचय देता हूँ, उसका नाम 'वायव्य-तीर्थ' है। उस तीर्थमें जो स्नान करके तर्पण आदि कार्य करता है, उसे वाजपेय-यज्ञका फल प्राप्त होता है। यह वायव्यतीर्थ एक 'सरोवर'के रूपमें है। वहाँ केवल पंद्रह दिनोंतक रहकर मेरी उपासना करते हुए जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसका इस पृथ्वीपर पुनः जन्म या मरण नहीं होता। वह चार भुजाओंसे युक्त होकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मेरे लोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। उस 'वायव्य' तीर्थकी पहचान यह है कि वहाँ वनमें पीपलके ऐसे वृक्ष हैं, जिनके पत्ते चौबीसों द्वादशियोंको निरन्तर हिलते ही रहते हैं।

पृथ्वि! अब 'कुब्जाम्रक' तीर्थके अन्तर्वर्ती 'शक्रतीर्थ' का परिचय देता हूँ। वसुंधरे! वहाँ इन्द्र हाथमें वज्र लिये हुए सुशोभित रहते हैं। महातपे! उस तीर्थमें दस रात्रि उपवास रहकर जो मनुष्य मर जाता है, वह मेरे लोकको प्राप्त कर लेता है। इस शक्रतीर्थके दक्षिण भागमें पाँच वृक्ष खड़े हैं, यही उसकी पहचान है। देवि! वरुणदेवने बारह हजार वर्षोंतक इस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थमें तपस्या की थी। अतः यहाँ स्नान करनेसे व्यक्ति आठ हजार वर्षोंतक वरुणलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। वहाँ ऊपरसे पानीकी एक धारा निरन्तर गिरती रहती है, यही उस तीर्थकी पहचान है।

पृथ्वि! उक्त 'कुब्जाम्रक'-तीर्थ (ऋषिकेश)- में 'सप्तसामुद्रक' नामका भी एक श्रेष्ठ स्थान है। उस तीर्थमें स्नान करनेवाला धर्मात्मा मनुष्य तीन

२१६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १२६

अश्वमेध-यज्ञोंका फल पा लेता है। यदि आसक्तिरहित होकर कोई प्राणी सात रातोंतक यहाँ निवास कर प्राणत्याग करता है तो वह मेरे लोकमें चला जाता है। सुन्दरि! अब उस ‘सप्तसामुद्रक’ तीर्थका लक्षण बताता हूँ, सुनो—‘वैशाख मासके शुक्लपक्षकी द्वादशी तिथिके दिन वहाँ एक विशेष चमत्कार दीखता है। उस दिन उस तीर्थमें गङ्गाका जल कभी तो दूधके समान उज्ज्वल वर्णका दीखता है और कभी पुनः उसी जलमें पीले रंगकी आभा प्रकट हो जाती है। फिर वही कभी लाल रंगमें परिणत हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद ही उसमें मरकतमणि तथा मोतीके समान झलक आने लगती है। आत्मज्ञानी पुरुष इन्हीं चिह्नोंसे उस तीर्थका ज्ञान प्राप्त करते हैं।’

शुभाङ्गि! कुब्जाम्रक तीर्थके मध्यवर्ती एक अन्य महान् तीर्थका अब तुम्हें परिचय देता हूँ। भगवान्‌में भक्ति रखनेवाले समस्त पुरुषोंके प्रिय उस तीर्थका नाम ‘मानसर’ है। उसमें स्नान करनेपर मानवको मानसरोवरमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। वहाँ इन्द्र, रुद्र एवं मरुद्गण आदि सम्पूर्ण देवताओंका उसे दर्शन मिलता है। वसुंधरे! इस तीर्थमें यदि कोई मनुष्य तीस रात्रियोंतक निवासकर मृत्युको प्राप्त होता है तो वह सम्पूर्ण सङ्गोंसे मुक्त होकर मेरे लोकको प्राप्त करता है। अब ‘मानसर’-तीर्थका स्वरूप बतलाता हूँ, जिससे मनुष्योंको उसकी पहचान हो जाय—जानकारी प्राप्त हो सके। वह तीर्थ पचास कोसके विस्तारमें है।

अब तुम्हें एक दूसरी बात बताता हूँ, उसे सुनो। इस ‘कुब्जाम्रक-तीर्थ’ में बहुत पहले एक महान् अद्भुत घटना घट चुकी है। उसका प्रसङ्ग यह है—जहाँ मेरे भोगकी सामग्री रखी पड़ी रहती थी, वहीं एक सर्पिणी निर्भय होकर निवास करती थी। वह अपनी इच्छासे चन्दन, माला आदि पूजनकी वस्तुओंको खाया करती। इतनेमें ही एक दिन वहाँ कोई नेवला आ गया और उसने स्वच्छन्दतासे आनन्द करनेवाली उस सर्पिणीको देख लिया। अब उस नेवले और सर्पिणीमें भयंकर युद्ध छिड़ गया। उस दिन माघ मासकी द्वादशी तिथि थी और दोपहरका समय था। यह संघर्ष मेरे उस मन्दिरमें ही पर्याप्त समयतक चलता रहा। अन्तमें सर्पिणीने नेवलेको डस लिया, साथ ही विषदिग्ध नेवलेने भी उस सर्पिणीको तुरंत मार गिराया। इस प्रकार वे दोनों आपसमें लड़कर मर गये। अब वह नागिन प्राग्ज्योतिषपुर (आसाम)-के राजाके यहाँ एक राजकुमारीके रूपमें उत्पन्न हुई। इधर उसी समय कोसलदेशमें उस नेवलेका भी एक राजाके यहाँ जन्म हुआ। देवि! वह राजकुमार रूपवान्, गुणवान् और सम्पूर्ण शास्त्रोंका ज्ञाता तथा सभी कलाओंसे युक्त था। दोनों अपने-अपने घर सुखपूर्वक रहते हुए इस प्रकार बढ़ने लगे, जैसे शुक्लपक्षका चन्द्रमा प्रतिरात्रि बढ़ता दीखता है। पर वह कन्या यदि कहीं किसी नेवलेको देख लेती तो तुरंत उसे मारनेके लिये दौड़ पड़ती। इसी प्रकार इधर राजकुमार भी जब किसी नागिन या साँपिनको देखता तो उसे मारनेके लिये तुरंत उद्यत हो जाता। कुछ दिन बाद मेरी कृपासे कोसल देशके राजकुमारने ही उस कन्याका पाणिग्रहण किया और इसके बाद वे दोनों लाक्षा एवं काष्ठकी तरह एक साथ रहने लगे। जान पड़ता था, मानो इन्द्र और शची नन्दनवनमें विहार कर रहे हों।

वसुंधरे! इस प्रकार उस राजकुमार एवं राजकुमारीके परस्पर प्रेमपूर्वक रहते हुए पर्याप्त समय व्यतीत हो गये। वे दोनों उपवनमें एक