भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा [ २१३

शरीर त्यागकर श्वेतद्वीपमें पहुँचा, जहाँ वह धनुष, बाण, तलवार और तूणीर (तरकस) धारणकर मेरा सारूप्य प्राप्तकर मुझ मायाके आश्रयदाताका सदा दर्शन करता रहता है। अतः वसुंधरे! तुम्हें भी इस मायासे क्या प्रयोजन? माया देखनेकी इच्छा करना ठीक नहीं। देवता, दानव और राक्षस भी मेरी मायाका रहस्य नहीं जानते।

वसुंधरे! यह 'माया-चक्र' नामक मायाकी आश्चर्यमयी कथा मैंने तुम्हें सुनायी। यह आख्यान पुण्योंसे युक्त तथा सुखप्रद है। जो पुरुष भक्तोंके सामने इसकी व्याख्या करता है और भक्तिहीनों तथा शास्त्रोंमें दोषदृष्टि रखनेवालोंसे नहीं कहता, उसकी जगत्में प्रतिष्ठा होती है। देवि! जो व्रती पुरुष इसका प्रातःकाल उठकर पाठ करता है, उसने मानो बारह वर्षोंतक तपपूर्वक मेरे सामने इसका पाठ किया। वसुंधरे! इस महान् आख्यानको जो सदा श्रवण करता है, उसकी बुद्धि कभी मायासे लिप्त नहीं होती और न उसे निकृष्ट योनियोंमें ही जाना पड़ता है।

[ अध्याय १२५]


कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा

इस प्रकार मायाके पराक्रमकी बातको सुनकर पृथ्वीने भगवान्‌से फिर पूछा।

पृथ्वी बोली—'भगवन्! आपने जिस 'कुब्जाम्रक'-तीर्थकी चर्चा की, उसमें रहने तथा स्नानादि करनेसे जो पुण्य होता है, आप अब उसे मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।

भगवान् वराह बोले—पृथ्वीदेवि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थका जो सार-तत्त्व है, अब उसे मैं तुम्हें विस्तारसे बतला रहा हूँ। सुन्दरि! 'कुब्जाम्रक' तीर्थकी जैसे उत्पत्ति हुई, जिस क्रमसे यह 'तीर्थ' बना, वहाँ जो अनुष्ठेय धर्म है तथा वहाँ प्राणत्याग करनेपर जिस लोककी प्राप्ति होती है, यह सब तुम ध्यान देकर सुनो। वसुंधरे! आदि सत्ययुगमें जब पृथ्वी जलमग्न थी, तब ब्रह्माजीकी प्रार्थनासे मैंने मधु और कैटभ नामक राक्षसोंका वध किया और ब्रह्मदेवकी रक्षा की। उसी समय मेरी दृष्टि अपने आश्रित भक्त रैभ्यमुनिपर पड़ी। वे अत्यन्त निष्ठासे सदा मेरी स्तुति-आराधनामें निरत रहते थे। वे युक्तिमान्, गुणी, परम पवित्र, कार्यकुशल और जितेन्द्रिय पुरुष थे और ऊपर बाँहें उठाकर दस हजार वर्षोंतक तपस्यामें संलग्न रहे। वे एक हजार वर्षोंतक केवल जल पीकर तथा पाँच सौ वर्षोंतक शैवाल खाकर तपस्या करते रहे। देवि! महात्मा रैभ्यकी इस तपस्यासे मेरा हृदय करुणासे अत्यन्त विह्वल हो उठा। उस समय हरिद्वारके कुछ उत्तर पहुँचकर मैंने एक आम्रके वृक्षका आश्रय लिया और उन मुनिको तपस्या करते देखा। मेरे आश्रय लेनेसे वह आम्र-वृक्ष थोड़ा कुबड़ा हो गया। मनस्विनि! इस प्रकार वह स्थान 'कुब्जाम्रक' नामसे प्रसिद्ध हो गया। यहाँपर (स्वतः) मरनेवाला व्यक्ति भी मेरे लोकमें ही रह जाता है।

मैंने रैभ्यमुनिको कुबड़े आम्रवृक्षका रूप धारण कर दर्शन दिया था, फिर भी वे मुझे पहचान गये और घुटनोंके बल भूमिपर गिरकर मेरी स्तुति की। वसुंधरे! अपने व्रतमें अडिग रहनेवाले उन मुनिको इस प्रकार अपनी स्तुति तथा प्रणाम करते देखकर मैंने प्रसन्न मनसे उन्हें वर माँगनेके लिये कहा। मेरी बात सुनकर उन तपस्वीने मीठी वाणीमें कहा—'भगवन्! आप जगत्के स्वामी हैं और याचना करनेवालोंकी आशा पूर्ण करते हैं। भगवन्! मधुसूदन!! यदि