वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१२ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२५ |
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दिखलाया और कहा—'ब्राह्मणदेव! आप कुछ घबड़ाये-से क्यों दीखते हैं? क्या आपने कुछ विशेष बात देखी है? आप कुछ मुझे व्यग्र-से दीख रहे हैं। अस्तु! जो कुछ हो, अब आप पूर्ण सावधान हो जाइये!'
मेरे इस प्रकार कहनेपर उस ब्राह्मणने अपना मस्तक भूमिपर टेक दिया और दुःखी होकर बार-बार दीर्घ श्वास लेता हुआ कहने लगा—
"जगद्गुरो! ये ब्राह्मण मुझसे कह रहे हैं कि 'तुमने पूर्वाह्नकी वेलामें वस्त्र, दण्ड और कमण्डलु आदि वस्तुएँ यहाँ रखीं और फिर अपराह्नमें यहाँ आये हो? क्या तुम इस स्थानको भूल गये थे?' माधव! इधर समस्या यह है कि निषादकी योनिमें कन्यारूपसे उत्पन्न होकर मैं एक निषादकी स्त्रीके रूपमें पचास वर्षोंतक रहा। उस शरीरसे उस कुकर्मी निषादद्वारा मेरे तीन पुत्र और चार पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। फिर एक दिन जब मैं गङ्गामें स्नान करनेके लिये यहाँ आकर तटपर अपना वस्त्र रखकर निर्मल जलमें स्नान करने लगा और डुबकी लगायी तो पुनः मुझे मुनियोंद्वारा अभिलषित तपस्वीका रूप प्राप्त हो गया। माधव! मैं तो सदा आपकी सेवामें लगा रहता था, किंतु पता नहीं, मेरे किस विकृत कर्मका ऐसा फल हो गया, जिसके परिणामस्वरूप मुझे निषादके यहाँ नरककी यातना भोगनी पड़ी? मैंने तो केवल माया-दर्शनका वर माँगा था, परंतु मेरे ध्यानमें और कोई पाप नहीं आता, जिसके फलस्वरूप आपने मुझे नरकमें गिरा दिया।"
वसुंधरे! उस समय वह ब्राह्मण बड़ी करुणाके साथ ग्लानि प्रकट कर रहा था। इसपर मैंने उससे कहा—"ब्राह्मणश्रेष्ठ! आप चिन्ता न करें। मैंने आपसे पहले ही कहा था कि ब्राह्मणदेवता! आप मुझसे अन्य वर माँग लें; किंतु आपने मुझसे वरके रूपमें माया-दर्शनकी ही याचना की। द्विजवर! आपने वैष्णवी माया देखनेकी इच्छा की थी, उसे ही तो देखा है। विप्रवर! दिन, अपराह्न, पचास वर्ष और निषादका घर—तत्त्वतः यह सब कहीं कुछ भी नहीं है। यह सब केवल वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है। आपने कोई भी अशुभ कर्म नहीं किया है। आश्चर्यमें पड़कर आप जो पश्चात्ताप कर रहे हैं, वह सब भी मायाके अतिरिक्त कुछ नहीं है। न तुम्हारे द्वारा किया हुआ अर्चन भ्रष्ट हुआ है, न तुम्हारी तपस्या ही नष्ट हुई है। द्विजवर! पूर्वजन्ममें तुमने कुछ ऐसे कर्म अवश्य किये थे, जिसके फलस्वरूप यह परिस्थिति तुम्हें प्राप्त हुई। हाँ! पूर्वजन्ममें तुमने मेरे एक शुद्ध ब्राह्मण भक्तका अभिवादन नहीं किया था। यह उसीका फल है कि तुम्हें इस दुःखपूर्ण प्रारब्धका भोग भोगना पड़ा। मेरे शुद्ध भक्त मेरे ही स्वरूप हैं। ऐसे ब्राह्मणोंको जो लोग प्रणाम करते हैं, वे वस्तुतः मुझे ही प्रणाम करते हैं और वे तत्त्वतः मुझे जान जाते हैं—इसमें कोई संदेह नहीं। जो ब्राह्मण मेरे दर्शनकी अभिलाषा करते हैं, वे ब्राह्मण मेरे भक्त, शुद्धस्वरूप एवं पूज्य हैं। विशेषरूपसे कलियुगमें मैं ब्राह्मणका ही रूप धारण करके रहता हूँ, अतएव जो ब्राह्मणका भक्त है, वह निःसंदेह मेरा ही भक्त है। ब्राह्मण! अब तुम सिद्ध हो चुके हो, अतः अपने स्थानपर पधारो। जिस समय तुम अपने प्राणोंका त्याग करोगे, उस समय तुम मेरे उत्तम स्थान—श्वेतद्वीपको प्राप्त करोगे, इसमें कोई संदेह नहीं।"
वरारोहे! इस प्रकार कहकर मैं वहीं अन्तर्धान हो गया और उस ब्राह्मणने फिर कठोर तपस्या आरम्भ की। अन्तमें वह 'मायातीर्थ'* में अपना
* यह 'मायातीर्थ' या 'मायापुरी'—'हरिद्वार' का ही नामान्तर है।