वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२५ |
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पेट, दाँत, ओंठ, नाक, कान, नेत्र, कपोल, ललाट और जीभ इत्यादिसे संगठित प्राणीकी उत्पत्ति मेरी मायाका ही चमत्कार है। वही प्राणी जब खाता-पीता है तो जठराग्निके द्वारा उसका पाचन होता है। तत्पश्चात् जीवके शरीरसे वही अधोमार्गसे बाहर निकल जाता है, यह सब मेरी प्रबल मायाकी ही करामात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—इन पाँच विषयोंमें अन्न खानेसे प्रवृत्ति होती है, ये सभी कार्य मेरी मायाकी ही देन हैं।
देवि! कुछ जल आकाशस्थ बादलोंमें लटके रहते हैं और कुछ जलराशि भूमिपर नदी, सरोवर आदिमें रहती है। पर जिन नदियों आदिमें इस जलकी प्रतिष्ठा है, वे नदियाँ भी कभी बढ़ती और कभी घटती हैं—यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। वर्षा-ऋतुमें सभी नदियोंमें अथाह जल हो जाता है, बावलियाँ और तालाब जलसे भर जाते हैं, पर ग्रीष्म-ऋतुमें वे ही सब सूख जाते हैं, यह सब मेरी मायाका ही तो बल है। मेघ ‘लवणसमुद्र’ से खारा जल लेकर मधुर जलके रूपमें उसे भूलोकमें बरसाते हैं, यह मेरी मायाका ही प्रभाव है। रोगसे दुःखी हुए कितने प्राणी रसायन तथा ओषधियाँ खाते हैं और उस ओषधिके प्रभावसे नीरोग हो जाते हैं, किंतु कभी उसी ओषधिके देनेपर प्राणीकी मृत्यु भी हो जाती है, उस समय मैं ही कालका रूप धारण कर ओषधिकी शक्तिका हरण कर लेता हूँ, यह सब मेरी मायाका ही प्रभाव है। पहले गर्भकी रचना होती है, इसके उपरान्त पुरुष उत्पन्न हो जाता है, फिर युवावस्था होती है, बुढ़ापा भी आ जाता है, जिसमें सभी इन्द्रियोंकी शक्ति समाप्त हो जाती है—यह सब मेरी मायाका बल है। भूमिमें बीज गिराया जाता है और उससे अङ्कुरकी उत्पत्ति हो जाती है। तत्पश्चात् वह अङ्कुर अद्भुत पत्तोंसे सम्पन्न हो जाता है—यह विचित्रता मेरी मायाका ही स्वरूप है। एक ही बीज गिरानेसे वैसे ही अनेक अन्नके दाने निकल जाते हैं, वस्तुतः मैं ही अपनी मायाके सहयोगसे उसमें अमृत शक्तिकी उत्पत्ति कर देता हूँ।
जगत्को विदित है कि गरुड़ मुझ भगवान् विष्णुका वहन करते हैं। वस्तुतः मैं ही स्वयं गरुड़ बनकर वेगसे अपने-आपको वहन करता हूँ। जितने देवता जो यज्ञका भाग पाकर संतुष्ट होते हैं, उस अवसरपर मैं ही अपनी इस मायाका सृजनकर उन अखिल देवताओंको तृप्त करता हूँ, किंतु सभी प्राणी यही जानते हैं कि ये देवता ही सदा यज्ञका भाग ग्रहण करते हैं। पर वस्तुतः मैं ही मायाकी रचना कर देवताओंके लिये यज्ञ कराता हूँ। बृहस्पतिजी यज्ञ कराते हैं—यह जानकर संसारमें सभी लोग उनकी सेवा करते हैं। पर आङ्गिरसी मायाका सृजन करना और देवताओंके लिये यज्ञकी व्यवस्था करना मेरा ही काम है। सम्पूर्ण संसार जानता है कि वरुण देवताकी कृपासे समुद्रकी रक्षा होती है, किंतु वरुणसे सम्बन्ध रखनेवाली इस मायाका निर्माण कर मैं ही महान् समुद्रकी रक्षा करता हूँ। सारा विश्व यही जानता है कि कुबेरजी धनाध्यक्ष हैं। परंतु रहस्य यह है कि मैं ही मायाका आश्रय लेकर कुबेरके भी धनकी रक्षा करता हूँ। ‘इन्द्रने ही वृत्रासुरको मारा था,’ इस प्रकारकी बात संसार जानता है, किंतु वज्रसे वस्तुतः मैंने ही उसे मारा था। सूर्य, ध्रुव आदि तपते हैं—ऐसी बात सर्वविदित है किंतु तथ्य यह है कि इनमें मेरा ही तेज है। संसारमें लोग कहते हैं, अरे! जल कहाँ चला गया ? पर बात यह है कि बड़वानलका रूप धारणकर सम्पूर्ण जलका शोषण मैं ही करता हूँ। मायासे ओत-प्रोत वायुरूप बनकर मेघोंको संचालित करना मेरा ही