वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी (हरिद्वार)-का माहात्म्य २०७
कार्य है। अमृतका निवास कहाँ है? इस गहन विषयको देवता भी नहीं जानते हैं, पर तथ्य यह है कि मेरी मायाके शासनसे वह ओषधिमें निवास करता है। संसार जानता है कि राजा ही प्रजाओंकी रक्षा करता है। किंतु तथ्य यह है कि राजाका रूप धारण करके मैं ही स्वयं पृथ्वीका पालन करता हूँ। युगकी समाप्तिके अवसरपर ये जो बारह सूर्य उदित होते हैं, उनमें मैं ही अपनी शक्तिका आधान करके वह कार्य सम्पन्न करता रहता हूँ। वसुंधरे! संसारमें मायाकी सृष्टि करना मुझपर निर्भर है। देवि! सूर्य अपने किरणसे सम्पूर्ण जगत्में निरन्तर ताप पहुँचाता है। ऐसी स्थितिमें किरणमयी मायाकी सृष्टि करना और सम्पूर्ण संसारमें उसका प्रसारण करना मेरे ही हाथका खेल है। जिस समय संवर्तक मेघ मूसल-जैसी धाराओंसे जल बरसाते हैं, उस अवसरपर मायाका आश्रय लेकर संवर्तक मेघोंद्वारा मैं ही समस्त जगत्को जलसे भर देता हूँ। वरारोहे! मैं जो शेषनागकी शय्यापर सोता हूँ, यह मेरी मायाका ही पराक्रम है। शेषनागका रूप धारण करना और उनपर शयन करना यह सब एकमात्र मेरी योगमायाका ही कार्य है। वसुंधरे! वाराही मायाका आश्रय लेकर मैंने तुम्हें ऊपर उठाया था—क्या तुम यह भूल गयी?
तुम भी वैष्णवी मायाका लक्ष्य हुई हो, क्या इस बातको नहीं जानती हो। सुश्रोणि! सत्रह बार तो तुम मेरे दाढ़ोंपर नित्य प्रलयकालमें आश्रय पा चुकी हो। उस समय मेरे द्वारा मायाका सृजन हुआ था और तुम 'एकार्णव'—समुद्रमें डूब रही थी। मैं मायाके ही योगसे जलमें रहता हूँ। ब्रह्मा और रुद्रका सृजन करना और भरण-पोषण करना मेरी ही मायाका कार्य है। फिर भी मेरी मायासे मोहित हो जानेके कारण वे मेरी इस मायाको नहीं जानते हैं। पितरोंका समुदाय जो सूर्यके समान तेजस्वी है, वह भी वस्तुतः मैं ही हूँ तथा पितृमयी मायाका आश्रय लेकर पितरोंका रूप धारण कर मैं ही पितृभाग कव्यको ग्रहण करता हूँ। अधिक क्या, एक दूसरी विचित्र बात सुनो, जो एक बार एक (पुरुष) ऋषि भी मायाद्वारा स्त्रीके स्वरूप (योनि)-में परिणत (परिवर्तित) कर दिये गये थे।
पृथ्वी बोली—भगवन्! उस ऋषिने कौन-सा अपकर्म किया था, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें स्त्रीकी योनि प्राप्त हुई? इस बातसे तो मुझे बड़ा आश्चर्य हो रहा है। आप यह सारा प्रसङ्ग बतानेकी कृपा कीजिये। उस ब्राह्मणश्रेष्ठने फिर स्त्रीरूप धारण कर कौन-से पापयुक्त कर्म किये, यह सब भी विस्तारसे बतायें। पृथ्वीकी बात सुनकर श्रीभगवान् अत्यन्त प्रसन्न हो गये और मधुर वचनमें कहने लगे, देवि! यह विषय अत्यन्त गूढ़ और महत्त्वपूर्ण है। सुन्दरि! तुम यह धर्मयुक्त कथा सुनो। देवि! मेरी माया ज्ञान एवं विश्वकी सभी वस्तुओंको आच्छादित किये है, उसकी बात सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। इस मायाके प्रभावसे सोमशर्मा नामक ऋषि भी प्रभावित हुए थे। इससे वे उत्तम, मध्यम और अधम—अनेक प्रकारकी स्थितियोंके चक्करमें घूमते रहे। फिर मेरी मायाकी प्रेरणासे उन्हें पुनः ब्राह्मणत्व सुलभ हुआ। सोमशर्मा उत्तम ब्राह्मण होकर भी स्त्रीकी योनिमें परिवर्तित हो गये, यद्यपि उसमें भी उनके द्वारा कोई विकृत कर्म नहीं हुआ और न कोई अपराध ही किया। वसुंधरे! बात यह है कि वे (सोमशर्मा) सदा मेरी आराधना, उपासनादि कर्मोंमें ही लगे रहते थे। वे निरन्तर मेरी रमणीय आकृति—मेरे सुन्दर स्वरूपका ही चिन्तन करते रहते। भामिनि! इस प्रकार पर्याप्त समयतक उनकी भक्ति, तपश्चर्या, अनन्यभावसे स्तुति करते रहनेपर मैं उनपर प्रसन्न