वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २०८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२५ |
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हुआ। देवि! मैंने उस समय उन्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया और कहा—'ब्राह्मणदेवता! मैं तुम्हारी तपस्यासे संतुष्ट हूँ, तुम मुझसे जो चाहो वर माँग लो। रत्न, सुवर्ण, गौएँ तथा अकण्टक राज्य—जो कुछ तुम्हारे हृदयमें हो माँगो, मैं सब कुछ तुम्हें दे सकता हूँ। अथवा विप्रवर, उस स्वर्गका सुख, जहाँ वाराङ्गनाएँ तथा आनन्दका अनुभव करनेकी अनन्त सामग्रियाँ हैं तथा जो सुवर्णके भाण्डोंसे सुशोभित एवं धन और रत्नोंसे परिपूर्ण है, जहाँ अप्सराएँ दिव्य रूप धारण किये रहती हैं, उसे ही माँग लो। अथवा जो भी इष्ट वस्तु तुम्हारे ध्यानमें आती हो, वह सब मेरे वरसे तुम्हें सुलभ हो सकती है।'
वसुंधरे! उस समय मेरी बात सुनकर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणने भूमिपर पड़कर मुझे साष्टाङ्ग प्रणाम किया और मधुर शब्दोंमें कहने लगे—'देव! आप मुझपर यदि रुष्ट न हों तो मैं आपसे जो वर माँग रहा हूँ, वही दीजिये। भगवन्! आपके द्वारा निर्दिष्ट वरदानों—सुवर्ण, गौएँ, स्त्री, राज्य, ऐश्वर्य एवं अप्सराओंसे सुशोभित स्वर्ग आदिसे माधव! मेरा कोई भी प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपकी मायाका—जिसकी सहायतासे आप सारी क्रीडाएँ करते हैं, रहस्य ही जानना चाहता हूँ।'
वसुंधरे! ब्राह्मणकी बात सुनकर मैंने कहा—'द्विजवर! मायासे तुम्हारा क्या प्रयोजन है? ब्राह्मणदेव! तुम अनुचित तथा अकार्यकी कामना कर रहे हो।' पर मेरी मायासे प्रेरित होकर उस ब्राह्मणने मुझसे पुनः यही कहा—'भगवन्! आप यदि मेरे किसी कर्म अथवा तपस्यासे तनिक भी संतुष्ट हैं तो मुझे बस वही वर दें (अर्थात् अपनी मायाका ही दर्शन करायें)।'
अब मैंने उस तपस्वी ब्राह्मणसे कहा—'द्विजवर! तुम 'कुब्जाम्रक'* तीर्थमें जाओ और वहाँ गङ्गामें स्नान करो, इससे तुम्हें मायाका दर्शन होगा।' देवि! मेरी इस बातको सुनकर ब्राह्मणने मेरी प्रदक्षिणा की और दर्शनकी अभिलाषासे वह ऋषिकेश चला गया। वहाँ उसने बड़ी सावधानीसे अपनी कुण्डी, दण्ड और भाण्डको गङ्गातटपर एक ओर रखकर विधिपूर्वक तीर्थकी पूजा की और उसके बाद वह गङ्गामें स्नान करनेके लिये उतरा। वह स्नानार्थ अभी डूबा ही था और उसके अङ्ग बस भींग ही रहे थे कि इतनेमें देखता है कि वह किसी निषादके घरमें उसकी स्त्रीके गर्भमें प्रविष्ट हो गया है। उस समय गर्भके क्लेशसे जब उसे असह्य वेदना होने लगी तो वह अपने मनमें सोचने लगा—'मेरे द्वारा अवश्य ही कोई बुरा कर्म बन गया है, जिससे मैं इस निषादीके गर्भमें आकर नरक-यातना भोग रहा हूँ। अहो! मेरी तपस्या एवं जीवनको धिक्कार है, जो इस हीन स्त्रीके गर्भमें वास कर रहा हूँ और नौ द्वारों तथा तीन सौ हड्डियोंसे पूर्ण विष्ठा और मूत्रसे सने रक्त-मांसके कीचड़में पड़ा हुआ हूँ। यहाँकी दुर्गन्ध असह्य है तथा कफ, पित्त, वायुसे उत्पन्न रोगों-दुःखोंकी तो कोई गणना ही नहीं। बहुत कहनेसे क्या प्रयोजन? मैं इस गर्भमें महान् दुःख पा रहा हूँ? अरे! देखो तो कहाँ तो वे भगवान् विष्णु, कहाँ मैं और कहाँ वह गङ्गाजीका जल? किसी प्रकार इस गर्भसे मेरा छुटकारा हो जाय तो फिर मैं उसी भक्तिकार्य—गङ्गा-स्नानादिमें लग जाऊँगा।'
इस प्रकार सोचते-सोचते वह ब्राह्मण शीघ्र ही निषादीके गर्भसे बाहर आया। पर भूमिपर गिरते
* यह 'ऋषिकेश' का ही अन्यतम (एक दूसरा) नाम है। इसका वर्णन वराहपु० अ० ५५, १२५-२६, महाभारत ३।८४।४०, कूर्मपुराण ३४।३४, ३६।१०, पद्मपुराण, स्वर्गखण्ड २८।४० तथा 'अर्चावतारस्थलवैभवदर्पण' पृ० १०० आदिपर भी है (—'नन्दलाल दे')।