भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १२५ ] माया-चक्रका वर्णन तथा मायापुरी ( हरिद्वार )-का माहात्म्य २०९

ही उसने जो गर्भमें निश्चय किया था, वह सब विस्मृत हो गया। अब वह धन-धान्यसे परिपूर्ण निषादके घरमें एक कन्याके रूपमें रहने लगा। भगवान् विष्णुकी मायासे मुग्ध होनेके कारण पूर्वकी कुछ भी बातें उसे याद न रहीं। इस प्रकार बहुत दिन बीत गये। फिर उस कन्याका विवाह हुआ। मायाके प्रभावसे ही उसके बहुतसे पुत्र और पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। अब कन्यारूपमें वह (ब्राह्मण) सभी भक्ष्य एवं अभक्ष्य वस्तुओंको भी खा लेता तथा पेय एवं अपेय वस्तुएँ भी पी लेता। वह निरन्तर (मत्स्यादि) जीवोंकी हिंसामें निरत रहता तथा कर्तव्याकर्तव्यज्ञानसे भी शून्य हो गया।

वसुंधरे! इस प्रकार जब निषादी स्त्रीरूपमें रहते उस ब्राह्मणके पचास वर्ष बीत गये, तब मैंने उसे पुनः स्मरण किया। वह (निषादीरूप ब्राह्मण) घड़ा लेकर विष्ठालिप्त वस्त्रोंको धोनेके लिये पुनः गङ्गाके तटपर गया और उसे एक ओर रखकर स्नान करनेके लिये गङ्गाके जलमें प्रविष्ट हुआ। कड़ी धूपसे संतप्त होनेके कारण उसका शरीर पसीनेसे लथपथ-सा हो रहा था। अतः उसकी इच्छा हुई कि सिर डुबाकर स्नान कर लूँ। पर ऐसा करते ही वह तपस्याका धनी (निषादीरूप) ब्राह्मण उसी क्षण पूर्ववत् तपस्वी बन गया। स्नान करके बाहर निकलते ही उसकी दृष्टि पूर्वके रखे हुए दण्ड, कमण्डलु और वस्त्रोंपर पड़ी, जिन्हें देखते ही उसे पहले-जैसा ज्ञान उत्पन्न हो गया। पूर्व समयमें उस ब्राह्मणने जिस प्रकार विष्णुकी माया जाननेकी कामना की थी, वह भी उसे याद हो आयी; गङ्गासे बाहर निकलकर अब उसने अपने वस्त्र पहने और लज्जित होकर वह वहीं पुनः बालुकापर बैठकर योग एवं तपके विषयमें विचार करने लगा और कहने लगा—'अरे! मुझ पापीद्वारा कितने निन्दनीय अकार्य कर्म बन गये।'

इस प्रकार उसने अपनेको निन्दनीय मानकर बहुत धिक्कारा और कहने लगा—'साधु पुरुषोंद्वारा निन्दित कर्म करनेवाले मुझको धिक्कार है। मैं सदाचारसे सर्वथा भ्रष्ट हो गया था, जिस कारण मुझे निषादकी योनिमें जाना पड़ा। इस कुलमें उत्पन्न होनेपर मैंने कितने ही भक्ष्य और अभक्ष्य वस्तुओंका सेवन किया और सभी प्रकारके जीवोंका वध किया, अभक्ष्य-भक्षण तथा अपेय वस्तुओंका पान किया और न बेचने योग्य वस्तुओंका विक्रय किया, मुझे वाच्यावाच्यका भी ध्यान न रहा। निषादके सम्पर्कसे मैंने अनेक पुत्रों और पुत्रियोंकी भी उत्पत्ति की। किस दुष्कर्मके फलस्वरूप मुझे निषादकी पत्नी होना पड़ा, यह भी विचार करने योग्य है।'

वसुंधरे! इधर तो वह ब्राह्मण इस प्रकार यहाँ ऐसा सोच रहा था, उधर निषाद क्रोध एवं दुःखसे पागल हो रहा था। वह उसी समय अपने पुत्रोंसे घिरा अपनी भार्याको खोजता हुआ हरिद्वार पहुँचा और वहाँ प्रत्येक तपस्वीसे अपनी उस स्त्रीके विषयमें पूछने लगा। फिर वह विलाप-सा करता हुआ कहने लगा—'प्रिये! तुम मुझे तथा अपने सभी पुत्रोंको छोड़कर कहाँ चली गयी? अभी दूध पीनेवाली तुम्हारी छोटी बालिका भूखसे व्याकुल होकर रो रही है। फिर वह वहाँ उपस्थित तपस्वियोंसे पूछने लगा—'तपस्वियो! मेरी पत्नी जल लेनेके लिये हाथमें घड़ा लेकर गङ्गाके तटपर आयी थी। क्या आपलोगोंने उसे देखा है? उस समय सभी मनुष्य जो हरिद्वारमें आये हुए थे, वे उस तपस्वी ब्राह्मण तथा उसके घड़ेको यथापूर्व उपस्थित देख रहे थे। इसके पश्चात् दुःखसे संतप्त उस निषादने जब अपनी प्रिय भार्याको नहीं देखा तो उसकी दृष्टि वस्त्र और घड़ेपर पड़ी। अब वह अत्यन्त करुण