वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२५ |
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विलाप करने लगा—'अहो! मेरी स्त्रीके ये वस्त्र और घड़ा तो नदीके तटपर ही पड़े हैं, किंतु गङ्गामें स्नान करनेके लिये आयी हुई मेरी पत्नी नहीं दिखायी पड़ रही है। लगता है, जब वह बेचारी दुःखी अबला स्नान कर रही होगी उस समय जिह्वालोलुप किसी ग्राहने उसे पानीमें पकड़ लिया होगा अथवा वह पिशाचों, भूतों या राक्षसोंका आहार बन गयी। प्रिये! मैंने कभी जाग्रत् या स्वप्नमें भी तुमसे कोई अप्रिय बात नहीं कही। लगता है किसी रोगसे वह उन्मत्त-सी होकर गङ्गाके तटपर चली आयी थी। पूर्वजन्ममें मैंने कौन-सा पापकर्म किया था, जो मेरे इस महान् संकटका कारण बन गया, जिसके फलस्वरूप मेरी पत्नी मेरे देखते-ही-देखते आँखोंसे ओझल हो गयी और अब उसका कहीं कुछ पता नहीं चल रहा है। फिर वह प्रलापमें कहने लगा—'प्रिये! तुम सदा मेरे चित्तका अनुसरण करती रही हो। सुभगे! मेरे पास आ जाओ। देखो, ये बालक डर गये हैं, इधर-उधर भटक रहे हैं और इन्हें अनाथ-जैसे क्लेशोंका सामना करना पड़ता है। सुन्दरि! तुम मुझे तथा इन तीन नन्हे-नन्हे बालकोंको तो देखो! चारों कन्याएँ और सभी बच्चे बड़ा कष्ट पा रहे हैं, इनपर ध्यान दो। मेरे ये छोटे-छोटे पुत्र तुम्हें पानेके लिये लालायित हो रो रहे हैं। मुझ पापीकी इन संतानोंकी तुम रक्षा करो। मुझे भी क्षुधा सता रही है, मैं प्याससे भी अत्यन्त व्याकुल हूँ। तुम्हें इसका पता होना चाहिये।'
(भगवान् वराह कहते हैं—) कल्याणि! उस समय जो ब्राह्मण स्त्रीका जन्म पाकर निषादकी पत्नी बना था और जो अब मेरी उस मायासे मुक्त होकर बैठा हुआ था, निषादके इस प्रकार कहनेपर लज्जाके साथ उससे कहने लगा—'अब तुम जाओ। तुम्हारी वह भार्या यहाँ नहीं है। वह तुम्हारा सुख और संयोग लेकर चली गयी और अब कभी न लौटेगी।' इधर वह निषाद जहाँ-तहाँ भटककर विलाप ही करता रहा। अब उस ब्राह्मणका हृदय करुणासे भर गया और कहने लगा—'जाओ, अब क्यों इतना कष्ट पा रहे हो। अनेक प्रकारके आहार हैं, उनसे बच्चोंकी रक्षा करना। ये बच्चे दयाके पात्र हैं। तुम कभी भी इनका परित्याग मत करना।'
संन्यासीकी बात सुनकर उनके सामने दुःख एवं शोकसे भरे हुए निषादने उनसे मधुर वाणीमें कहा—'निश्चय ही आप प्रधान मुनिवरोंमें भी श्रेष्ठ एवं धर्मात्माओंमें भी परम धर्मात्मा पुरुष हैं। विप्रवर! तभी तो आपके मीठे वचनोंसे मुझे सान्त्वना मिल गयी।' उस समय निषादकी बात सुनकर श्रेष्ठ व्रतका पालन करनेवाले मुनिके मनमें भी दुःख एवं शोक छा गया। उन्होंने मधुर वचनमें कहा—'निषाद! तुम्हारा कल्याण हो। अब विलाप करना बंद करो। मैं ही तो तुम्हारी प्रिय पत्नी बना था। वही मैं यहाँ गङ्गातटपर आया और स्नान करते हुए मैं एक मुनिके रूपमें परिवर्तित हो गया।'
फिर तो संन्यासीकी बात सुनकर निषादकी भी चिन्ताएँ दूर हो गयीं। उसने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणसे कहा—'विप्रवर! आप यह क्या कह रहे हैं, आजतक कभी ऐसी घटना नहीं घटी है। अथवा ऐसी घटना तो सर्वथा असम्भव है कि कोई स्त्री होकर पुनः पुरुष हो जाय।' अब दुःखके कारण ब्राह्मणके मनमें भी घबराहट उत्पन्न हो गयी। उस गङ्गाके तटपर ही ब्राह्मणने निषादसे मीठी बात कही—'धीवर! अब यथाशीघ्र इन बालकोंको लेकर अपने देशमें चले जाइये और क्रमानुसार सभी बच्चोंपर यथायोग्य स्नेह रखकर इनकी देखभाल रखिये।'