वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४७-अगस्त्य-गीता
अध्याय ४५-४६ ] श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत ९९
मुझे कोई संतान नहीं है। द्विजवर ! इस कारण तपस्याद्वारा अपने शरीरको मैं सुखाना चाहता हूँ।
याज्ञवल्क्यजी बोले—राजन् ! तपस्यामें बड़ा क्लेश उठाना पड़ता है, अतः तुम यह विचार छोड़ दो। मैं तुम्हें अत्यन्त सरल उपाय बताता हूँ। उसे करनेसे तुम्हें अवश्य पुत्र प्राप्त हो जायगा।
फिर उन्होंने उस यशस्वी राजाको इस वैशाख मासके शुक्लपक्षमें होनेवाला यही परशुराम-द्वादशीव्रत बतलाया। पुत्रकी अभिलाषा रखनेवाले राजा वीरसेनने भी पूर्ण विधिके साथ यह व्रत सम्पन्न किया। फलस्वरूप उन्हें राजा नल-जैसा परम धार्मिक पुत्र प्राप्त हुआ, जिन ‘पुण्यश्लोक’ राजाकी कीर्ति अबतक संसारमें गायी जाती है। यह तो इस व्रतके फलका प्रासङ्गिक उल्लेखमात्र हुआ, वस्तुतः जो यह व्रत करता है, उसे सुपुत्र तथा जीवनभर विद्या, श्री और कान्ति सब सुलभ हो जाती है और परलोकमें उसे जो सुख होता है, वह कहता हूँ, सुनो। इस व्रतको करनेवाले व्यक्ति एक कल्पतक, अप्सराओंके साथ आनन्द करते हुए ब्रह्माजीके लोकमें रहते हैं। फिर जब पुनः सृष्टि आरम्भ होती है तब वे चक्रवर्ती राजा होते हैं और तीस हजार वर्षोंकी उन्हें लम्बी आयु प्राप्त होती है।
[अध्याय ४४]
श्रीराम एवं श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार ज्येष्ठमासके शुक्लपक्षमें श्रीराम-द्वादशी व्रत होता है। मनुष्यको चाहिये कि वह संकल्प करके विधिके साथ विविध प्रकारके पवित्र पुष्पोंसे परम प्रभु परमात्माकी पूजा करे। ‘ॐ रामाभिरामाय नमः’ कहकर श्रीभगवान्के दोनों चरणोंकी, ‘ॐ त्रिविक्रमाय नमः’ कहकर कटिदेशकी, ‘ॐ धृतविश्वाय नमः’ कहकर उनके उदरकी, ‘ॐ संवत्सराय नमः’ से हृदयकी, ‘ॐ संवर्तकाय नमः’ से कण्ठकी, ‘ॐ सर्वास्त्रधारिणे नमः’ से भुजाओंकी, ‘ॐ पाञ्चजन्याय नमः’ से शङ्खकी तथा ‘ॐ सुदर्शनचक्राय नमः’ से चक्रकी एवं ‘ॐ सहस्रशिरसे नमः’ से भगवान्के शिरःप्रदेशकी पूजा करे। इस प्रकार विधिवत् पूजाकर पूर्वोक्त विधिद्वारा एक कलश स्थापितकर उसे वस्त्रसे आच्छादित करे। फिर उस कलशपर भगवान् राम एवं लक्ष्मणकी सुवर्णमयी प्रतिमा रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और पुत्रकी इच्छावाला व्रती प्रातःकाल उन प्रतिमाओंको ब्राह्मणोंको दे दे।
पहले पुत्र न होनेपर महाराज दशरथने भी पुत्रकी कामनासे वसिष्ठजीकी बड़ी आराधनाकर जब पुत्रोत्पत्तिका उपाय पूछा तो मुनिने उन्हें यही विधान बतलाया था। इस व्रतके रहस्यको जानकर राजा दशरथने इसका अनुष्ठान किया, जिसके फलस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि महान् शक्तिशाली रामरूपमें उनके पुत्र हुए। महामुने ! उस समय सनातन श्रीहरिने अपनेको (राम, लक्ष्मणादि) चार रूपोंमें विभक्त कर लिया था। यह तो यहाँकी बात हुई, अब परलोककी बात सुनो। जबतक इन्द्र और सम्पूर्ण देवता स्वर्गमें रहते हैं, तबतक इस व्रतका करनेवाला पुरुष स्वर्गमें विविध भोगोंको भोगता है। वहाँकी अवधि समाप्त हो जानेपर वह पुनः मर्त्यलोकमें आता है। यहाँ आनेपर वह सौ यज्ञ करनेवाला राजा होता है। जो इस व्रतको निष्कामभावसे करता है, उस पुरुषके समस्त पाप समाप्त हो जाते हैं। साथ ही उसे भगवान् श्रीहरिका कैवल्य-पद भी प्राप्त हो जाता है, जो स्वच्छ एवं सनातन है।
४८-अगस्त्य-गीतामें पशुपालकका चरित्र
१०० | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४७
दुर्वासाजी कहते हैं—इसी प्रकार आषाढ़-मासके शुक्लपक्षमें श्रीकृष्ण-द्वादशीव्रत होता है। व्रतीको चाहिये कि संकल्प करके विधिके साथ ‘ॐ चक्रपाणये नमः’, ‘ॐ भूपतये नमः’, ‘ॐ पाञ्चजन्याय नमः’, ‘ॐ सुदर्शनाय नमः’, ‘ॐ पुरुषाय नमः’ कहकर श्रीकृष्णरूपधारी भगवान् श्रीहरिकी क्रमशः भुजा, कण्ठ, शङ्ख, चक्र एवं सिरका पूजन करे। पूजा करनेके बाद इसी प्रकार अग्रभागमें वह पूर्ववत् कलश स्थापितकर उसे वस्त्रसे आच्छादित कर दे। फिर उसके ऊपर सनातन श्रीहरिके चतुर्व्यूहरूपमें अवतरित स्वर्णनिर्मित श्रीकृष्णकी प्रतिमा स्थापित करे। फिर चन्दन एवं पुष्प आदिसे उसकी विधिवत् पूजा करे। तदनन्तर पूर्वकी भाँति वह प्रतिमा वेदपाठी ब्राह्मणको दान कर दे। इस प्रकार नियमके साथ व्रत करनेवालेको जो पुण्य प्राप्त होता है, उसे सुनो—
यदुवंशमें वसुदेव नामक एक श्रेष्ठ कुशल पुरुष हुए हैं। उनकी पत्नीका नाम देवकी था। देवकी पतिके साथ-ही-साथ सभी व्रतोंका अनुष्ठान करती थीं। साथ ही वे पातिव्रत-धर्मका भी पूर्णरूपसे पालन करती थीं। परंतु उन साध्वीको कोई पुत्र न था। बहुत समय व्यतीत हो जानेपर एक बार श्रीनारदजी वसुदेवजीके घर आये। उन्होंने भक्तिपूर्वक मुनिकी पूजा की। फिर नारदजीने कहा—‘वसुदेव! मैं यह देवताओंसे सम्बन्धित एक कार्य बताता हूँ, उसे सुनो। अनघ! मैंने स्वयं देखा है, देवताओंकी सभामें जाकर पृथ्वीने कहा है—‘देवताओ! अब मैं भार ढोनेमें असमर्थ हो गयी हूँ। दुर्जन दल बाँधकर मुझे दुःख दे रहे हैं। अतः आपलोग उनका संहार करें।’
‘इस प्रकार पृथ्वीके कहनेपर उन देवताओंने भगवान् नारायणका ध्यान किया। ध्यान करते ही भगवान् श्रीहरिने उनके सामने प्रकट होकर कहा—‘देवताओ! यह कार्य मैं स्वयं करनेके लिये उद्यत हूँ, इसमें कोई संशय नहीं। मैं मनुष्यके रूपमें मर्त्यलोकमें जाऊँगा, किंतु जो स्त्री अपने पतिके साथ आषाढ़मासके शुक्लपक्षमें द्वादशीव्रतका अनुष्ठान करेगी, मैं उसीके गर्भमें निवास करूँगा।’ भगवान् श्रीहरिके ऐसा कहनेपर देवता तो अपने स्थानपर चले गये, पर मैं (नारदजी) यहाँ आ गया हूँ। मेरे आनेका विशेष कारण यह है कि आपकी कोई संतान (जीवित) नहीं है। अतः आपको यह बतला दूँ।’ इसी द्वादशीव्रतके करनेसे वसुदेवजीको श्रीकृष्ण-जैसे पुत्रकी प्राप्ति हुई। साथ ही उन यदुश्रेष्ठको विशाल वैभव भी प्राप्त हो गया। जीवनमें सुख भोगकर अन्तमें वे भगवान् श्रीहरिके परम धामको गये। मुने! आषाढ़मासमें होनेवाली द्वादशीव्रतकी यह विधि मैंने तुम्हें बतला दी। [अध्याय ४५-४६]
बुद्ध-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! श्रावणमासके शुक्लपक्षमें एकादशीके दिन बुद्धव्रत करनेका विधान है। पूर्वकथित विधिके अनुसार चन्दन एवं फूल आदिसे भगवान् श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। ‘ॐ दामोदराय नमः’, ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’, ‘ॐ सनातनाय नमः’, ‘ॐ श्रीवत्सधारिणे नमः’, ‘ॐ चक्रपाणये नमः’, ‘ॐ हरये नमः’, ‘ॐ मञ्जुकेशाय नमः’ तथा ‘ॐ भद्राय नमः’—इन मन्त्रोंके द्वारा क्रमशः भगवान् बुद्धरूपी श्रीहरिके चरण, कटिभाग, उदर, छाती, भुजाएँ, कण्ठ, सिर एवं शिखाकी क्रमशः अर्चना करनी चाहिये।
४९-उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप व्रत
अध्याय ४७] बुद्ध-द्वादशीव्रत [१०१
इस प्रकार सम्यक् रीतिसे पूजाकर पहलेके ही समान कलश स्थापित करे और दो वस्त्रोंसे उसे आच्छादितकर उसके ऊपर सम्पूर्ण संसारको अपने उदरमें धारण करनेकी शक्तिवाले देवेश्वर भगवान् श्रीहरिकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर विधानके अनुसार गन्ध, पुष्प आदिसे क्रमशः पूजन करे। तत्पश्चात् पहले-जैसे ही वेद और वेदाङ्गके पारगामी ब्राह्मणको वह प्रतिमा दे दे। मुने! यह विधि श्रावणमासकी एकादशी-व्रतकी कही गयी है। इस प्रकार नियमके साथ यदि व्रत किया जाय तो उसका जो प्रभाव होता है, वह कहता हूँ, सुनो।
प्राचीन समयकी बात है—सत्ययुगमें नृग नामसे प्रसिद्ध एक प्रतापी नरेश थे। जिन्हें आखेट (शिकार)-का बड़ा शौक था। अतः प्रायः वे गहन वनोंमें घूमते रहते थे। एक समयकी बात है, वे घोड़ेपर चढ़कर किसी वनमें बहुत दूर चले गये, जहाँ सिंह, बाघ, हाथी, सर्प और डाकुओंका निवास था। राजा नृगके पास इस समय अन्य कोई सहायक भी न था। वे घोड़ेको खोलकर एक वृक्षके नीचे श्रमसे थककर सो गये। इतनेमें ही रात हो गयी और चौदह हजार व्याधोंका एक दल मृगोंको मारनेके विचारसे वहाँ आ गया। व्याधोंने देखा राजा सोये हैं। उनका शरीर सोने और रत्नोंसे सुशोभित है। लक्ष्मी उनके अङ्ग-अङ्गकी शोभा बढ़ा रही हैं। अतः वे सभी वधिक तुरंत अपने सरदारके पास गये और उसे इसकी सूचना दी। सुवर्ण और रत्नके लोभमें पड़कर वह सरदार भी राजा नृगको मारनेके लिये उद्यत हो गया और वे व्याध हाथमें तलवार लेकर उन सोये हुए राजाके पास पहुँच गये। वे उन्हें पकड़ना ही चाहते थे कि राजाके शरीरसे सहसा चन्दन-माल्यादिसे विभूषित एक स्त्री प्रकट हो गयी। उसने चक्र उठाकर सभी व्याधों तथा म्लेच्छोंको मार डाला। उनका वधकर वह देवी उसी क्षण पुनः राजा नृगके शरीरमें समा गयी। इतनेमें राजा भी जग गये और देखा कि म्लेच्छ नष्ट हो गये हैं और देवी शरीरमें प्रविष्ट हो रही है। अब राजा घोड़ेपर सवार होकर वामदेवजीके आश्रमपर गये और उन्होंने भक्तिपूर्वक उनसे पूछा—'भगवन्! वह स्त्री कौन थी तथा वे मरे हुए व्याध कौन थे? आप मुझपर प्रसन्न होकर इस आश्चर्यजनक घटनाका रहस्य बतानेकी कृपा कीजिये।'
वामदेवजी बोले—राजन्! इसके पूर्वजन्ममें शूद्रजातिमें तुम्हारा जन्म हुआ था। उस समय ब्राह्मणोंके मुखसे तुमने श्रावणमासके शुक्ल-पक्षकी द्वादशीव्रतके अनुष्ठानकी बात सुनी और राजन्! बड़ी श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक तुमने उस दिन उपवास भी किया। अनघ! उसीका परिणाम है कि इस समय तुम्हें राज्य उपलब्ध हुआ है। वही द्वादशीदेवी सम्पूर्ण आपत्तियोंमें साकार होकर तुम्हारी रक्षा करती हैं। उसीके प्रयाससे ये घोर पापी एवं निर्दयी म्लेच्छ जीवनसे हाथ धो बैठे हैं। राजन्! श्रावण मासकी यह द्वादशी ही तुम्हारी रक्षिका है। इसमें इतनी अपार शक्ति है कि सहसा प्राप्त विपत्ति-कालमें भी तुम्हारी रक्षा हो जाती है और इसकी कृपासे तुम्हें राज्य भी सुलभ हो गया है। अब जो बारह मासोंकी द्वादशी करते हैं, उनके पुण्यका तो कहना ही क्या है। उनके प्रभावसे तो मानव इन्द्रलोकतक पहुँच जाता है।
[अध्याय ४७]
५०-शुभ-व्रत
१०२] | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [अध्याय ४८
कल्कि-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! पूर्वकथित व्रतोंकी भाँति ही भाद्रपदमासके शुक्लपक्षमें जो एकादशी होती है, उस तिथिमें कल्कि-व्रत करना चाहिये। इसमें विधिपूर्वक संकल्पकर देवाधिदेव भगवान् श्रीहरिकी इस प्रकार अर्चना करनी चाहिये। ‘ॐ कल्कये नमः’, ‘ॐ हृषीकेशाय नमः’, ‘ॐ म्लेच्छविध्वंसनाय नमः’, ‘ॐ शितिकण्ठाय नमः’, ‘ॐ खड्गपाणये नमः’, ‘ॐ चतुर्भुजाय नमः’, तथा ‘ॐ विश्वमूर्तये नमः’ कहकर क्रमशः भगवान् कल्किके चरण, कमर, उदर, कण्ठ, भुजा, हाथ एवं सिरकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद बुद्धिमान् पुरुष पहलेके समान ही सामने कलश स्थापितकर उसपर भगवान् कल्किकी सुवर्णनिर्मित प्रतिमा स्थापित-कर उसके ऊपर एक स्वच्छ वस्त्र लपेटकर चन्दन और पुष्पसे उस प्रतिमाको अलङ्कृत करे। पुनः प्रातःकाल उसे किसी शास्त्रके ज्ञाता ब्राह्मणको दान कर दे।
मुनिवर! इस प्रकार यह व्रत करनेपर जो फल प्राप्त होता है, उसे सुनो—बहुत पहले काशीपुरीमें विशाल नामक एक पराक्रमी राजा थे। बादमें उनके गोत्रके व्यक्तियोंने ही उनके राज्यको छीन लिया। अब वे गन्धमादन पर्वतके पवित्र बदरीवनके क्षेत्रमें चले गये और तप करने लगे। इसी समय किसी दिन श्रीनर-नारायणनामक पुराण एवं परम प्रसिद्ध ऋषि वहाँ पधारे। उन दोनों देवताओंने, जिन्हें सम्पूर्ण देवगण नमस्कार करते हैं और जिनके आगे किसीकी शक्ति काम नहीं देती, उस समय राजा विशालको देखा और मनमें विचार किया कि यह राजा बहुत पहलेसे यहाँ आया है और परब्रह्म परमात्मा विष्णुका निरन्तर ध्यान कर रहा है। अतः नर-नारायणने प्रसन्न होकर उन निष्पाप नरेशसे कहा—'राजेन्द्र! हमलोग तुम्हारी कल्याणकामनासे वर देने आये हैं। तुम हमसे कोई वर माँग लो।'
राजा विशालने कहा—आप दोनों कौन हैं, यह मैं नहीं जानता। फिर किसके सामने वर पानेकी प्रार्थना करूँ। मैं जिनकी आराधना करता हूँ, मेरी उन्हींसे वर-प्राप्तिकी हार्दिक इच्छा है।
राजाके इस प्रकार कहनेपर नर-नारायणने उनसे पूछा—'राजन्! तुम किसकी आराधना करते हो? अथवा कौन-सा वर पानेकी तुम्हें इच्छा है? हमलोग जानना चाहते हैं, तुम इसे बताओ।' ऐसा पूछनेपर राजा विशाल बोले—'मैं भगवान् विष्णुकी आराधना करता हूँ' और फिर वे चुपचाप बैठ गये। तब नर-नारायणने पुनः उनसे कहा—'राजन्! उन्हीं देवेश्वरकी कृपासे हम तुम्हें वर देनेके लिये आये हैं। तुम वर माँगो—तुम्हारे मनमें क्या अभिलाषा है?'
राजा विशालने कहा—अनेक प्रकारकी दक्षिणासे सम्पन्न होनेवाले यज्ञ करके मैं भगवान् यज्ञेश्वरकी उपासना करना चाहता हूँ। आप वर देकर इसी मनोरथको पूर्ण करें।
उस समय राजाके पास नर और नारायण—दोनों महाभाग विराजमान थे। उनमेंसे नरने कहा—ये भगवान् नारायण हैं। अखिल जगत्को मार्ग दिखाना इनका प्रधान काम है। संसारकी सृष्टि करनेमें निपुण ये प्रभु मेरे साथ तपस्या करनेके विचारसे इस बदरीवनमें आ गये हैं। मत्स्य, कच्छप, वराह, नरसिंह, वामन और परशुराम—इन सब रूपोंसे पूर्वसमयमें इनका अवतार हो चुका है। इनकी शक्ति अपरिमेय है। फिर ये ही महाराज दशरथजीके घर राजा राम
अध्याय ४९ ] पद्मनाभ-द्वादशीव्रत १०३
हुए। उस समय इनका रूप महान् आकर्षक था। उस समय म्लेच्छ राक्षसोंको मार पृथ्वीका भार दूर कर सुखी किया था। कभी पापियोंसे भयभीत होकर नरसमुदायने इनकी स्तुति की थी। उस अवसरपर इन्होंने नरसिंहरूपसे अवतार लिया था। बलिको मोहनेके निमित्त वामन तथा क्षत्रियोंके हाथसे राज्य वापस करनेके लिये परशुराम ये बन चुके हैं। दुष्ट शत्रुओंको दमन करनेके लिये इन्होंने कृष्णका अवतार धारण किया है। अतः पण्डितजन इनकी उपासना करते हैं। यदि पुत्र-प्राप्तिकी कामना हो तो बुद्धिमान् पुरुष इनके बालकृष्ण-रूपकी उपासना करे। रूपकी इच्छा करनेवाला इनके बुद्धावतारकी तथा शत्रुका संहार चाहनेवाला कल्कि-अवतारकी उपासना करे—यह संशय-शून्य सिद्धान्त है।
इस प्रकारकी बातें स्पष्ट करके मुनिवर नरने राजा विशालको भगवान् हरिकी यह द्वादशी बतला दी। वे राजा इस व्रतको सम्पन्न करनेमें संलग्न भी हो गये। फलस्वरूप वे चक्रवर्ती राजा हुए। मुने! उन्हीं राजा विशालसे सम्बन्ध रखनेके कारण यह बदरीवन 'विशाल' नामसे प्रसिद्ध हुआ। वे नरेश इस जन्ममें सुखपूर्वक राज्यकर अन्तमें बदरीवनमें गये, जहाँ अनेक प्रकारके यज्ञ करके भगवान् नारायणके परम पदको प्राप्त किया। [अध्याय ४८]
पद्मनाभ-द्वादशीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—मुने! पूर्वकथित द्वादशीव्रतकी भाँति आश्विनमासके शुक्लपक्षमें यह व्रत भी है। उस तिथिमें पद्मनाभ भगवान्की अर्चना करनेकी विधि है। 'ॐ पद्मनाभाय नमः', 'ॐ पद्मयोनये नमः', 'ॐ सर्वदेवाय नमः', 'ॐ पुष्कराक्षाय नमः', 'ॐ अव्ययाय नमः', 'ॐ प्रभवाय नमः'—इन मन्त्रोंको पढ़कर क्रमशः भगवान् पद्मनाभके दोनों चरणों, कटिभाग, उदर, हृदय, हाथ एवं सिरकी पूजा करनी चाहिये। फिर 'सुदर्शनाय नमः' एवं 'कौमोदक्यै नमः' आदि कहकर भगवान्के आयुधोंकी पूजा करनी चाहिये। इसमें भी पूर्ववत् सामने कलश रखना चाहिये, उसपर भगवान् पद्मनाभकी सुवर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे, चन्दन-पुष्प आदिसे उसके अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। रात बीत जानेपर प्रातःकाल फिर वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। महामते! इस प्रकार व्रत करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह बताता हूँ, सुनो।
सत्ययुगकी बात है—भद्राश्व नामसे विख्यात एक शक्तिशाली राजा थे, जिनके नामपर 'भद्राश्ववर्ष' प्रसिद्ध हुआ है। एक बार कभी अगस्त्य मुनि उनके घर आये और कहने लगे—'राजन्! मैं सात रातोंतक तुम्हारे घरपर निवास करना चाहता हूँ।' राजा भद्राश्वने सिर झुकाकर मुनिको प्रणाम किया और कहा—'मुनिवर! आप अवश्य निवास करें।' राजा भद्राश्वकी सुन्दरी रानीका नाम कान्तिमती था। उसका तेज ऐसा था मानो बारहौं सूर्य एक साथ प्रकाश फैला रहे हों। इसी प्रकार राजाकी पाँच सौ सुन्दरियाँ भी थीं; जिनका व्रत संयमित था। सुन्दर स्वभाववाली वे सौतें दासीकी भाँति प्रतिदिन कार्यमें संलग्न रहती थीं। कान्तिमतीको ही राजाकी पटरानी होनेका सौभाग्य प्राप्त था। एक बार उस (रूप और तेजसे सम्पन्न कल्याणी कान्तिमती)-पर अगस्त्य मुनिकी दृष्टि पड़ी। साथ ही उसके भयसे कार्यमें तत्पर रहनेवाली उन सुन्दरी सौतोंको भी उन्होंने देखा।
५१-धन्य-व्रत
| १०४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ४९ |
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राजा भद्राश्व तो रानी कान्तिमतीके प्रसन्न मुखको प्रतिक्षण देखता ही रहता था। ऐसी परम सुन्दरी रानीको देखनेके कुछ समय बाद अगस्त्यजी आनन्दमें विह्वल होकर बोले—‘राजन्! आप धन्य हैं, धन्य हैं।’ इसी प्रकार दूसरे दिन रानीको देखकर अगस्त्य मुनिने कहा—‘अरे! यह तो सारा विश्व वञ्चित रह गया।’ फिर तीसरे दिन उस रानीको देखकर यों कहने लगे—‘अहो! ये मूर्ख गोविन्द भगवान्को भी नहीं जानते, जिन्होंने केवल एक दिनकी प्रसन्नतासे इस राजाको सब कुछ प्रदान किया था।’ चौथे दिन अगस्त्य मुनिने अपने दोनों हाथोंको ऊपर उठाकर फिर कहा—‘जगत्प्रभो! आपको साधुवाद—धन्यवाद है, स्त्रियाँ धन्य हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य! तुम्हें पुनः-पुनः धन्यवाद है। भद्राश्व! तुम्हें धन्यवाद है। हे अगस्त्य! तुम भी धन्य हो। प्रह्लाद एवं महाव्रती ध्रुव! तुम सभी धन्य हो।’
इस प्रकार उच्च स्वरसे कहकर अगस्त्य मुनि राजा भद्राश्वके सामने नाचने लगे। फिर तो ऐसे कार्यमें संलग्न अगस्त्य मुनिको देखकर रानीसहित उस नरेशने मुनिसे पूछा—‘ब्रह्मन्! आपके इस हर्षका क्या कारण है? आप क्यों इस प्रकार नृत्य कर रहे हैं?’
मुनिवर अगस्त्यने कहा— राजन्! बड़े आश्चर्यकी बात है। तुम कितने अज्ञानी हो; साथ ही तुम्हारा अनुगमन करनेवाले ये मन्त्री, पुरोहित और अन्य अनुजीवी भी मूर्ख ही हैं, जो मेरी बात समझ नहीं पाते।
इस प्रकार अगस्त्य मुनिके कहनेपर राजा भद्राश्वने हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मन्! आपके मुखसे उच्चरित पहेलीको हम नहीं समझ पा रहे हैं। अतः महाभाग! यदि आप अनुग्रह करना चाहते हों तो मुझे बतानेकी कृपा करें।’
अगस्त्यजी बोले— राजन्! पूर्वजन्ममें यह रानी किसी नगरमें हरिदत्त नामक एक वैश्यके घरमें दासीका काम करती थी। उस समय भी तुम्हीं इसके पति थे। हरिदत्तके ही यहाँ तुम भी सेवावृत्तिसे एक कर्मचारीका काम करते थे। एक समयकी बात है, आश्विनमासके शुक्लपक्षकी द्वादशीका व्रत नियमपूर्वक करनेके लिये वह वैश्य तत्पर हुआ। स्वयं भगवान् विष्णुके मन्दिरमें जाकर पुष्प एवं धूप आदिसे उन प्रभुकी पूजा की। तुम दोनों—स्त्री एवं पुरुष उस वैश्यकी सुरक्षाके लिये साथ थे। पूजनोपरान्त वह वैश्य तो अपने घर लौट आया। महामते! दीपक बुझ न जायें, इसलिये तुम दोनोंको वहीं रहनेकी आज्ञा दे दी। उस वैश्यके चले जानेपर तुमलोग दीपकोंको भलीभाँति जलाकर वहीं बैठे रहे। राजन्! तुमलोग पूरी एक रात—जबतक सबेरा न हुआ, तबतक वहाँसे नहीं हटे। कुछ दिनोंके बाद आयु समाप्त हो जानेके कारण तुम दोनों स्त्री-पुरुषोंकी मृत्यु हो गयी। उस पुण्यके प्रभावसे राजा प्रियव्रतके घर तुम्हारा जन्म हुआ और तुम्हारी यह पत्नी, जो उस जन्ममें वैश्यके यहाँ दासीका काम करती थी, अब रानी हुई है। वह दीपक दूसरेका था। भगवान् विष्णुके मन्दिरमें केवल उसे प्रज्वलित रखनेका काम तुम्हारा था। यह उसीका ऐसा फल है। फिर जो अपने द्रव्यसे श्रीहरिके सामने दीपक प्रज्वलित करे, उसका जो पुण्य है, उसकी संख्या तो की ही नहीं जा सकती। इसीसे मैंने कहा—‘राजन्! आप धन्य हैं!’ आप धन्य हैं!’ सत्ययुगमें पूरे वर्षतक, त्रेतायुगमें आधे वर्षतक तथा द्वापरयुगमें तीन महीनोंतक भक्तिपूर्वक श्रीहरिकी पूजा करनेसे विद्वान् पुरुष जो फल प्राप्त करते हैं, कलियुगमें उतना फल केवल ‘नमो नारायणाय’ कहकर प्राप्त किया
५२-कान्ति-व्रत
अध्याय ५० ] धरणीव्रत १०५
जा सकता है। इसमें कोई संशय नहीं। इसीलिये मेरे मुखसे निकल गया, 'यह सारा जगत् वञ्चित हो गया है।' मैंने केवल भक्तिकी बात कही है। भगवान् विष्णुके सम्मुख दूसरेके जलाये दीपकको प्रज्वलित कर देनेमात्रसे ऐसा फल प्राप्त हुआ है। अब जो मैंने मूर्ख होनेकी बात कही, इसका अभिप्राय इतना ही है कि भगवान्के मन्दिरमें दीप-दान करनेके महत्त्वको ये लोग नहीं जानते। मैंने ब्राह्मणों और राजाओंको धन्यवाद इसलिये दिया है कि जो अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा भक्तिके साथ उक्त विधिसे श्रीहरिकी उपासना करते हैं, वे धन्यवादके पात्र होते हैं। मुझे उन प्रभुके अतिरिक्त इस जगत्में अन्य कुछ भी नहीं दीखता, अतः मैंने अपनेको भी धन्य कहा। इस स्त्रीको तथा तुम्हें धन्य बतानेका कारण यह है कि यह एक वैश्यके घर सेविका थी और तुम भी सेवाका ही कार्य करते थे। स्वामीके चले जानेपर तुमलोगोंने भगवान्के मन्दिरमें दीपकको प्रज्वलित रखा। अतः यह स्त्री और इससे बढ़कर तुम धन्यवादके पात्र हो। प्रह्लादके शरीरमें आसुर भावनाके बीज थे, फिर भी परमपुरुष परमात्माको छोड़कर उनकी दृष्टिमें अन्य कोई सत्ता न थी, अतः मैंने उन्हें धन्य कहा है। ध्रुवका जन्म राजाके घरमें हुआ था। बचपनमें ही वे वनमें चले गये और वहाँ भगवान् विष्णुकी आराधनाकर सर्वोत्कृष्ट सुन्दर स्थान प्राप्त किया। महाराज! इसलिये मैंने ध्रुवको भी साधु कहा है।
अगस्त्यजीसे राजा भद्राश्वने संक्षेपूपसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की थी; अतः मुनिने कहा—'राजन्! अब कार्तिककी पूर्णिमाका पर्व आ गया है। मैं पुष्करक्षेत्र जा रहा हूँ'—यों कहकर वे चल पड़े। पुष्कर जाते समय ही वे राजा भद्राश्वके महलपर रुके थे और उन मुनिवरने राजाको वहीं द्वादशीव्रत करनेका उपदेश दिया था। चलते समय मुनि राजाको पुत्र-प्राप्तिका आशीर्वाद दे गये।
राजा भद्राश्वने भी भगवान् पद्मनाभकी द्वादशीका व्रत किया। फलतः वे पुत्र-पौत्र और उत्तम-से-उत्तम भोगोंसे सम्पन्न होकर अन्तमें भगवान् पद्मनाभके धामको प्राप्त हुए। [अध्याय ४९]
धरणीव्रत
दुर्वासाजी कहते हैं—अगस्त्यजी पुष्कर तीर्थमें जाकर पुनः राजा भद्राश्वके भवनपर ही वापस आ गये। मुनिको अपने यहाँ आये देखकर उन राजाके मनमें महान् हर्ष हुआ। उन धार्मिक नरेशने उन्हें आसनपर बैठाया और पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे पूजा कर कहने लगे—'भगवन्! आपके आदेशानुसार आश्विनमासकी द्वादशीकी व्रतविधिका मैंने अनुष्ठान किया। अब कार्तिक-मासमें यह व्रत करनेसे जो पुण्य होता है, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।'
अगस्त्यजी बोले—राजन्! कार्तिकमासकी विधिपूर्वक द्वादशी-व्रतके और फलकी बात मैं तुमसे कहता हूँ, तुम उसे सावधान होकर सुनो। व्रतीको मेरे द्वारा पहले बताये विधानके अनुसार संकल्प करके स्नान करना चाहिये। फिर भगवान् नारायणकी 'ॐ सहस्रशिरसे नमः', 'ॐ पुरुषाय नमः', 'ॐ विश्वरूपिणे नमः', 'ॐ ज्ञानास्त्राय नमः', 'ॐ श्रीवत्साय नमः', 'ॐ जगद्ग्रसिष्णवे नमः', 'ॐ दिव्यमूर्तये नमः' तथा 'ॐ सहस्रपादाय नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा क्रमशः सिर, भुजा, कण्ठ, अस्त्रों, हृदयदेश, उदर, कटिभाग तथा चरणदेशकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष अनुलोम-क्रमसे
५३-सौभाग्य-व्रत
१०६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५०
भी पूजन करें। फिर 'ॐ दामोदराय नमः' कहकर सभी अङ्गोंकी एक साथ पूजा करनी चाहिये।
इस प्रकार पूजाकर प्रतिमाके सामने चार कलश रखकर उनमें रत्न डालकर उन्हें उजले चन्दनसे लेपकर पुष्पमालासे अलङ्कृत तथा श्वेत वस्त्रसे आवेष्टितकर और उनपर तिलपूर्ण ताँबेका पात्र रखे। महाराज! फिर उनमें चारों समुद्रकी कल्पना करे। फिर उनके मध्यभागमें भगवान् श्रीहरिकी प्रतिमा स्थापितकर विधिवत् पूजा करनी चाहिये। उस दिन रातमें जागरणकर भगवान्की मानसिक पूजाकर वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करे। बहुत-से योगी पुरुष सोलह दलवाले चक्रमें योगीश्वर प्रभुकी अर्चना करते हैं। इस प्रकार पूजनका कार्य समाप्त हो जानेपर प्रातः चार समुद्रोंकी भावनासे कलशोंको चार ब्राह्मणको दान कर दे। प्रतिमा पाँचवें वेदज्ञ ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। दो अथवा चार प्रतिमाएँ भी देनेकी विधि है। यदि दान ग्रहण करनेवाले ब्राह्मण पञ्चरात्र-आगमके आचार्य हों तो सर्वोत्तम है; उन्हें देनेपर हजार व्रतोंका फल प्राप्त होता है। जो इस व्रतके रहस्यको स्पष्ट बतानेमें कुशल हैं तथा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधि सम्पन्न कराते हैं, ऐसे व्यक्तिको दान करनेसे वह करोड़ गुणा फल देता है। अपने गुरुके रहते दूसरेका आश्रय लेनेवाले और उसकी पूजा करनेवालेकी दुर्गति होती है। उसके किये हुए किसी दानका कोई फल नहीं, अतः प्रयत्न करके सर्वप्रथम गुरुका सम्मान करना चाहिये। इसके बाद दूसरेको दे। गुरु पढ़ा-लिखा हो अथवा कुछ भी न जानता हो, फिर भी उसे भगवान् श्रीहरिका स्वरूप जानना चाहिये। गुरु चाहे उत्तम मार्गका अनुसरण करता है अथवा अधम मार्गका; किंतु शिष्यके लिये एकमात्र वही गति है। जो व्यक्ति पहले गुरुका सम्मानकर फिर मूर्खताके कारण पीछे उसके प्रतिकूल व्यवहार करता है, वह पतित होता है और करोड़ युगोंतक उसे नरककी यातना भोगनी पड़ती है।
इस प्रकार दानकर द्वादशीके दिन भगवान् विष्णुकी पुनः विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। इसका नाम 'धरणीव्रत' है। पूर्वकालमें दक्षप्रजापतिने इस व्रतका आचरण किया था। फलस्वरूप वे प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित हुए और अन्तमें मुक्त होकर सनातन श्रीहरिमें लीन हो गये। हैहयवंशी कृतवीर्य नामक नरेशने भी यह व्रत किया था, जिसके प्रभावसे उसे कार्तवीर्य नामक पुत्र प्राप्त हुआ। अन्तमें वह भी सनातन श्रीहरिके लोकमें चला गया। शकुन्तलाने भी इसी प्रकार यह व्रत किया था, जिससे वह चक्रवर्ती राजा भरतकी माता बनी। यों ही प्राचीन समयमें अनेक चक्रवर्ती राजाओंने उक्त विधिसे यह व्रत किया है और इसके प्रतापसे वे प्रमुख चक्रवर्ती हो गये हैं—यह बात वेदोंमें बतायी गयी है। प्राचीन समयमें पातालमें डूबकर कालक्षेप करती हुई पृथ्वीने भी इस उत्तम व्रतको किया था। तभीसे यह व्रत धरणीव्रतके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पृथ्वीद्वारा यह व्रत सम्पन्न होते ही भगवान् श्रीहरिने परम संतुष्ट होकर उसी समय वराहका रूप धारण किया और इस प्रकार उसे ऊपर उठा लाये, जैसे नौका जलमें डूबते हुए प्राणीको बचा लेती है। मुने! इस धरणीव्रतका स्वरूप मैंने तुम्हें बता दिया। जो श्रेष्ठ पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा अथवा भक्तिके साथ इस व्रतको करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो अन्तमें भगवान् विष्णुके परम धामको ही प्राप्त होगा। [अध्याय ५०]
५४-अविघ्नव्रत
अध्याय ५१ ] अगस्त्य-गीता १०७
अगस्त्य-गीता
[ नासदीय सूक्त—व्याख्या ]
भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! दुर्वासा मुनिके कहे हुए इस उत्तम धरणीव्रतको सुनकर सत्यतपा उसी क्षण हिमालयके संनिकट एक ऐसे पवित्र स्थानपर चले गये, जहाँ पुष्पभद्रा नामकी नदी, चित्रशिला नामक प्रसिद्ध पहाड़ तथा भद्रवटसंज्ञक वटका वृक्ष था। उन मुनिने वहीं अपना सुन्दर आश्रम बना लिया। भविष्यमें सत्यतपाके द्वारा वहाँ एक बहुत बड़ी विचित्र लीला सम्पन्न होगी।
भगवती पृथ्वीने कहा— प्रभो! आप सनातन पुरुष हैं। तपोमय! इस व्रतको मैंने कई हजार कल्प पहले किया था। मैं तो उसे सर्वथा भूल ही गयी थी। परंतु आज आपकी कृपासे वह पुरानी बात मुझे याद आ गयी। परम प्रभो! जातिस्मरता प्राप्त होने—पूर्वजन्मोंकी बात स्मरण आ जानेके कारण मेरे मनको बड़ी शान्ति मिल रही है। भगवन्! मैं जानना चाहती हूँ कि अगस्त्य मुनि राजा भद्राश्वके भवनपर पुनः कब आये और उनकी आज्ञासे राजाने फिर क्या किया? वह सब आप मुझे बतानेकी कृपा करें।
भगवान् वराह बोले— राजा भद्राश्व सदा श्वेत अश्व (उजले घोड़े)-पर ही चढ़ते थे। जब अगस्त्य ऋषि दूसरी बार उनके यहाँ आये तो उन्होंने उन्हें उत्तम आसनपर बैठाया और पहलेसे भी बढ़कर उनकी पूजा की और पूछा—'भगवन्! वह कौन-सा ऐसा कर्म है, जिसे करनेसे संसारसे मुक्ति मिल सकती है। अथवा देहधारी एवं बिना देहवाले—सभी प्राणियोंके लिये कौन-सा कर्म वैध है, जिसका सम्पादन कर लेनेपर उनके सामने शोक नहीं आ सकता।'
अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! सावधानीसे सुनो। यह कथा दृष्ट एवं अदृष्ट—दोनों लोकोंसे सम्बद्ध है। यह बात उस समयकी है, जब कि दिन, रात, नक्षत्र, दिशाएँ, आकाश, देवता एवं सूर्य—इन सबका नितान्त अभाव था। उस क्षण पशुपाल नामक एक पुरुष शासन कर रहे थे। एक समयकी बात है—पशुओंकी रक्षा करते समय उनके मनमें पूर्वी समुद्र देखनेकी उत्कण्ठा जगी और वे तुरंत चल पड़े। उस महासागरके तटपर एक वन था और वहाँ बहुत-से सर्प निवास करते थे। वहाँ आठ वृक्ष थे और एक स्वच्छन्दगामिनी नदी थी। तिरछे एवं ऊपरकी ओर गमन करनेवाले अन्य प्रधान पाँच पुरुष भी थे। एक विशिष्ट पुरुष था, जिसके प्रसादसे तेजके कारण चमकनेवाली एक स्त्री शोभा पा रही थी। उस समय हजार सूर्यों-जैसी आकृतिवाले उस महान् पुरुषको उस स्त्रीने अपने वक्षःस्थलपर स्थान दे रखा था। उस पुरुषके अधरपर तीन रंगवाले तीन विकार विराजमान थे। वही पुरुष उसका संचालक था। उसकी गति कहीं रुकती न थी। उसे देखकर वह स्त्री मौन हो गयी। तब वह प्रबन्धक पुरुष भी उस वनमें चला गया। उसके वनमें प्रविष्ट होते ही क्रूर स्वभाववाले आठ सर्प राजाके पास पहुँचे और उन प्रभुके चारों ओर लिपट गये। सर्पोंके आक्रमणसे राजा चिन्तित होकर सोचने लगे कि इनका संहार कैसे हो?
इतनेमें उनके सामने तीन वर्णवाला एक दूसरा पुरुष प्रकट हो गया। उसने श्वेत, रक्त एवं पीत—इन तीन रूपोंको धारण कर रखा था। उसने अपना नाम जानना चाहा और कहा—'मेरे लिये दूसरा स्थान चाहिये।' तब प्रधान पुरुषने पूछा—'कहाँ जानेका विचार करते हो? साथ ही उस
५५-शान्ति-व्रत
| १०८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ५२-५३ |
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पुरुषका नाम 'महत्' रख दिया। अब उस पुरुषने उन जगन्नियन्ता प्रभुके साथ रहनेकी स्वीकृति भी प्राप्त कर ली। तब राजाने कहा—'तुम्हें जगत्की जानकारी रखना आवश्यक है।' इसपर उस स्त्रीने कहा—'इस जगत्में तो मैं ओतप्रोत हूँ।' तब जो दूसरा पुरुष प्रकट हुआ था, उसने कहा—'तुम डरो मत।' इसके बाद वह वीर पुरुष राजाके पास जाकर स्वयं स्थित हो गया।
तदनन्तर दूसरे पाँच पुरुष आये और प्रधान राजाके चारों ओर खड़े हो गये। राजन्! उन डाकुओंने शस्त्र उठाकर प्रधान राजाको मारनेकी तैयारी कर ली। फिर डर जानेके कारण एक दूसरेमें वे लीन हो गये। उनके लीन होनेपर भी राजाका भवन विशेषरूपसे सुशोभित होने लगा। राजन्! फिर पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश—इन पाँच महाभूतोंने अपना एक समूह बनाया। उस समय वायुका रूप शीतल एवं सुखदायी था। अन्य भी चारों उत्तम गुण एवं प्रकाशसे सम्पन्न थे। ये भी राजभवनमें आये। तब उन प्रधान पुरुष पशुपालके सूक्ष्म रूपको देखकर तीन वर्णवाले पुरुषने उनसे कहा—'महाराज! मेरे कोई पुत्र नहीं है।' उस समय पशुपालने पूछा—'बतलाइये आपके लिये मैं क्या करूँ?' फिर तीन वर्णवाले पुरुषने उत्तर दिया—'हमलोग आपको बन्धनमें डालना चाहते थे। यद्यपि हमने प्रयत्न भी किया, किंतु असफल रहे। राजन्! ऐसी स्थितिमें अब हम आपके शरीरमें आश्रय पाना चाहते हैं। मुझपर आपकी पुत्र-भावना होनी चाहिये।'
राजन्! इस प्रकार तीन वर्णवाले पुरुषके कहनेपर राजा पशुपालने उससे फिर कहा—'मैं पुत्र ऐसा चाहता हूँ, जो दूसरोंका भी प्रबन्धक हो।' और उस तीन वर्णवाले पुरुषको अपना पुत्र मान लिया। पर उसमें उनकी आसक्ति न हुई।
[ अध्याय ५१]
अगस्त्य-गीतामें पशुपालका चरित्र
अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! इस प्रकार पशुपालसंज्ञक परम प्रभुने एक पुरुषका सृजन किया और उसे शासनकी आज्ञा दे दी। स्वतन्त्र होनेके कारण वह पुरुष राजा बन गया। उस पुत्रमें तीन रंग थे। उसने अहंकार नामक पुत्र उत्पन्न किया। उस पुत्रसे अवबोधस्वरूपिणी एक कन्या उत्पन्न हुई। उस कन्याने ज्ञान प्रदान करनेकी योग्यतावाले एक सुन्दर पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रके पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। उनमें सभी रूपोंका समावेश था और वे विषयोंको भोगनेकी रुचि रखते थे, जो इन्द्रिय कहलाये। अब सबने रहनेका एक सुन्दर भवन बना लिया। उनका वह मन्दिर ऐसा था, जिसमें नौ दरवाजे हुए और चारों ओर जानेवाला एक स्तम्भ हुआ। जलसे सम्पन्न हजारों नदियाँ उसे सुशोभित कर रही थीं। राजा पशुपाल साकार रूप धारणकर अब पुरुषके रूपमें विराजने लगे। वेद और छन्द उन्हें स्मरण हो आये। फिर उन वेदोंमें प्रतिपादित नियम एवं यज्ञ—इन सबकी उन्होंने व्यवस्था की।
राजन्! किसी समयकी बात है—राजा पशुपालके मनमें आनन्दके अभावका अनुभव हुआ। अब उन्होंने संसारकी सृष्टि करनेकी इच्छा की और योगमायाका आश्रय लेकर एक ऐसा पुत्र प्रकट किया, जिसके चार मुख, चार भुजाएँ, चार वेद और चार पथ हुए। महामते! समुद्र, वन और तृणसे लेकर हाथीप्रभृति पशुतकमें उनका प्रवेश है।
अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! प्रस्तुत कथा प्रायः मेरे, तुम्हारे तथा अखिल जन्तुओंके शरीरमें
५७-आरोग्य-व्रत
अध्याय ५४ ] उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप व्रत १०९
समान रूपसे चरितार्थ होती है। पशुपालसे* जिसकी उत्पत्ति हुई, उसके चार चरण और चार मुख थे। उन्हींको इस कथाका उपदेष्टा एवं प्रवर्तक कहा गया है। सत्यस्वरूप स्वर ही उसका पुत्र है। उसने जो कुछ कहा है, वह धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष—इन चारोंका साधन है। पुरुषोंका इन चारोंसे सम्बन्ध है। भक्तिपूर्वक उपासना करनेवालेको ये सुलभ हो जाते हैं। इनमें जो प्रथम धर्म है, उसका दूसरा रूप वृषभका है। उसके चार सींग हैं। उसीका अर्थ और काम भी अनुसरण करते हैं। चौथी मुक्ति है। जो भक्तिके साथ उसका आदर करता है, उसे वह परब्रह्म परमात्मा सुलभ हो जाता है। इस ब्रह्मका ही सनातन अंश मनुष्योंमें व्यक्त रूपसे विराजमान है। अतः मनुष्य प्रथम अवस्थामें ब्रह्मचारीके रूपमें रहे। दूसरी अवस्थामें धर्मका आश्रय लेकर सेवक-वर्गका भरण-पोषण करना चाहिये। तीसरी अवस्था वानप्रस्थ बतायी गयी है। इस अवस्थामें भी उसका अन्तःकरण धर्मयुक्त होना आवश्यक है।
इसके पश्चात् उस परब्रह्मने—'अहमस्मि' केवल मैं ही हूँ—यों कहा। फिर वह एक दूसरे ही चार, एक एवं दो प्रकारके रूपसे विराजने लगा। भिन्न प्रकारके उत्पन्न होनेके कारण उसकी भुजाएँ भी उसीका अनुसरण करने लगीं। सर्वप्रथम चार मुखवाले ब्रह्माने देखा कि कुछ प्रजाएँ नित्य और कुछ अनित्य हैं। राजन्! तब ब्रह्माके मनमें विचार उठा कि मैं कैसे पिताजीसे मिलूँ। क्योंकि मेरे पिताजी एक महान् पुरुष हैं। उनमें जो गुण हैं, वे उनकी इन संतानोंमें किसीमें भी दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। स्वरकी दृष्टिके प्रकरणमें एक ऐसी श्रुति है कि जो पिताके पुत्रका पुत्र है, उसे अपने पितामहके नामका संरक्षक होना चाहिये। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं है। कहीं भी ऐसा अवसर मिलना आवश्यक है, जहाँ पिताका भाव दीख पड़े।
अब मुझे क्या करना चाहिये—ब्रह्माजी यह सोच ही रहे थे कि परमपिता परमात्माके मनमें रोष आ गया। अब ब्रह्माने स्वर मथना आरम्भ किया, जिससे स्वरका सिर प्रकट हो गया। उसकी आकृति नारियलके फलके समान थी। ब्रह्माजीके प्रयाससे वह स्वर फिर विभक्त हो गया। अब वे प्राण, अपान, उदान, समान एवं व्यान रूपसे सामने आ गये। अब ब्रह्माने उन्हें ठहरनेका स्थान बता दिया।
इस प्रकार अथक परिश्रम करनेके पश्चात् जब समर्थ ब्रह्माने पुनः प्राणि-शरीरपर दृष्टि डाली तो उन्हें शरीरके भीतर अपने पिता परब्रह्म परमात्माकी झाँकी दृष्टिगोचर हुई। सम्पूर्ण प्राणियोंमें त्रसरेणुके समान सूक्ष्म रूप धारण कर वे सर्वत्र विराजमान थे। वे ही सर्वोपरि विराजमान एवं सर्वव्यापक हैं। सम्पूर्ण जगत्की सृष्टिसे सम्बन्ध रखनेवाला यह इतिहास अपना प्रथम स्थान रखता है। जो इसे तत्त्वसे जानता है, उसे उत्तम कर्म करनेकी योग्यता प्राप्त हो जाती है। [अध्याय ५२-५३]
उत्तम पति प्राप्त करनेका साधनस्वरूप व्रत
**राजा भद्राश्वने पूछा—**विप्रवर! विशुद्ध ज्ञानकी प्राप्तिके लिये पुरुषको किस देवताकी आराधना करनी चाहिये और उनके आराधनकी कौन-सी विधि है? मुझे यह बतानेकी कृपा कीजिये।
**अगस्त्यजी कहते हैं—**राजन्! भगवान् विष्णु ही सदा सभीके द्वारा—किमधिकं देवताओंद्वारा भी आराध्य हैं। अब इनके पूजनका प्रकार बताता हूँ, जिससे वर-प्राप्ति हो सकती है।
* यहाँ पशुपाल परब्रह्म परमात्मा तथा चार मुखवाले ब्रह्मा हैं।
१९० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५५
देवताओं, मुनियों एवं मानवों—प्रायः सभीके लिये यह रहस्यकी बात है—भगवान् नारायण ही सर्वोपरि देवता हैं। उन्हें प्रणाम करनेपर प्राणी क्लेश नहीं पाता। राजन्! सुना जाता है—महात्मा नारदजीने पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके इस व्रतको अप्सराओंको बतलाया था।
अप्सराओंने पूछा—नारदजी! आप ब्रह्माजीके पुत्र हैं। हमें उत्तम पति पानेकी अभिलाषा है। भगवान् नारायण हमारे प्राणपति हो सकें, इसके लिये आप हमलोगोंको कोई व्रत बतानेकी कृपा करें।
नारदजी कहते हैं—प्रायः सबके लिये कल्याणदायक नियम है कि प्रश्न करनेके पहले विनयपूर्वक प्रणाम करे। पर तुमलोगोंने इस नियमका पालन नहीं किया; क्योंकि तुम्हें युवावस्थाका गर्व है। फिर भी तुमलोग देवाधिदेव भगवान् विष्णुके नामका कीर्तन करो। उनसे वर माँगो—‘प्रभो! आप हमारे स्वामी होनेकी कृपा करें।’ इससे तुम्हारा सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होगा—इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिये। एक व्रत भी बताता हूँ, जिसे करनेसे भगवान् श्रीहरि स्वयं वर देनेके लिये उद्यत हो जाते हैं। चैत्र और वैशाखमासके शुक्लपक्षमें जो द्वादशी तिथि है, उस दिन यह व्रत करना चाहिये। रातमें विधिवत् भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि भगवान्की प्रतिमाके ऊपर लाल फूलोंसे एक मण्डल बनवाये। नृत्य, गीत एवं वाद्यके साथ रातमें जागरण करे।
‘ॐ भवाय नमः’, ‘ॐ अनङ्गाय नमः’, ‘ॐ कामाय नमः’, ‘ॐ सुशास्त्राय नमः’, ‘ॐ मन्मथाय नमः’, तथा ‘ॐ हरये नमः’ कहकर क्रमशः भगवान्के सिर, कटि, भुजा, उदर एवं चरण आदिकी पूजा करे। फिर भगवान्को प्रणामकर रात्रि-जागरणकी विधि सम्पन्न करके प्रातःकाल भगवान्की वह प्रतिमा वेद-वेदाङ्गके जानकार ब्राह्मणको दान कर दे।
अप्सराओ! इस प्रकार व्रत करनेपर इच्छानुकूल भगवान् विष्णु अवश्य पतिरूपमें तुम्हें प्राप्त होंगे। इसके पश्चात् ईखके पवित्र रस तथा मल्लिका आदिके फूलोंसे उन देवेश्वरकी पूजा करना। सुन्दरियो! तुमने मुझे प्रणाम किये बिना जो प्रश्न किया है, उससे अष्टावक्रद्वारा तुम्हारे उपहासपर शाप भी मिलेगा। फलस्वरूप गोपलोग तुम्हें हर लेंगे।
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कहकर देवर्षि नारदजी उसी क्षण वहाँसे चले गये। उन अप्सराओंने व्रतकी विधि सम्पन्न की। फलस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि उनपर संतुष्ट होकर उनके पति हुए।
[अध्याय ५४]
शुभ-व्रत
[ कुब्जाम्रेश्वर-ऋषीकेश-माहात्म्य ]
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब मैं व्रतोंमें उत्तम शुभसंज्ञक व्रतका वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो। महाभाग! इसके प्रभावसे भगवान् विष्णुका दर्शन सुलभ हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। मार्गशीर्षमासके प्रथम दिन इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। इसमें दशमीको एक समय भोजन करनेका नियम है। उस दिन स्नान करके दोपहरमें भगवान् विष्णुकी पूजा करे। एकादशीके दिन उपवासकर ब्राह्मणोंको विधिके साथ यव देना चाहिये। उस समय दान, होम एवं अर्चन—इन सभी क्रियाओंमें सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। राजेन्द्र! अगहन,
५८-पुत्रप्राप्ति-व्रत
अध्याय ५५ ] शुभ-व्रत १११
पूस, माघ एवं फाल्गुन—इन चार महीनोंमें ऐसे ही नियमोंका पालन करना समुचित है। उपवास करके पूजा सम्पन्न करे। फिर विद्वान् पुरुष चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ एवं आषाढ़—इन चार महीनोंमें उसी तरह संयमपूर्वक व्रत करे। इस चौमासेमें ब्राह्मणोंके लिये प्रीतिपूर्वक पात्रसहित सत्तू दान करना चाहिये। श्रावण, भाद्रपद और आश्विन—इन तीन महीनोंमें अगहनमासमें तैयार होनेवाले धानको बाँटनेका विधान है। इन तीन मासोंकी अवधि कार्तिक आरम्भ होनेके पूर्वतक मानी जाती है। इन महीनोंमें भी पूर्व-जैसे ही उपवास करके पूजा करनेका नियम है। दशमीके दिन संयमशील एवं पवित्र रहे। एकादशीके दिन बुद्धिमान् व्यक्ति मासके नामका उच्चारण करके भक्तिके साथ भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। द्वादशीके दिन व्रतको समाप्त करे।
राजन्! एकादशीके दिन पर्वत एवं पातालके रूपसे अङ्कित पृथ्वीकी सुवर्णमयी प्रतिमाके पूजन एवं दानका विशेष महत्त्व है। भगवान् श्रीहरिके सामने उस प्रतिमाको स्थापितकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे ढक दे, पासमें बीज बिखेर दे और रातमें जागरण करे। फिर प्रातःकाल चौबीस ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर प्रत्येक ब्राह्मणको गाय, दो वस्त्र, सुवर्णमयी अँगुठी तथा कुण्डल आदि आभूषण दे। राजन्! यदि व्रती पुरुष राजा है तो वह प्रत्येक ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार भरण-पोषणकी व्यवस्था कर दे और दक्षिणामें सुवर्णसे बनी हुई पृथ्वीकी प्रतिमा, दो गौ और दो वस्त्र दे। अथवा अपनी सम्पत्तिके अनुसार चाँदीकी पृथ्वी बनवाये और भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए उसे ब्राह्मणोंको अर्पण कर दे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भोजन, छाता और खड़ाऊँ भी दे। तत्पश्चात् प्रार्थना करे—‘भगवान् कृष्ण, दामोदर, श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो जायें।’ राजन्! इस व्रतके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। फिर भी एक प्रसङ्ग सुनाता हूँ।
सत्ययुगमें एक ब्रह्मवादी राजा थे। उन्होंने ब्रह्माजीसे पुत्र-प्राप्तिका उपाय पूछा। तब ब्रह्माजीने उन्हें यह व्रत बता दिया और राजा इस व्रतको करनेमें संलग्न हो गये। राजन्! व्रत समाप्त हो जानेपर विश्वात्मा श्रीहरि राजाके सामने पधारे और कहा—‘राजन्! तुम मुझसे वर माँगो।’
राजाने कहा—‘देवेश! मुझे ऐसा पुत्र देनेकी कृपा कीजिये, जो वैदिक मन्त्रोंका पूर्ण जानकार, दूसरोंका यज्ञ करानेवाला, स्वयं यज्ञ करनेमें तत्पर, कीर्तिसम्पन्न, दीर्घायु, असंख्य सद्गुणोंसे युक्त, ब्राह्मणोंमें निष्ठा रखनेवाला तथा शुद्ध अन्तःकरणसम्पन्न हो तथा जहाँ पहुँच जानेपर फिर सोच करनेका अवसर सामने नहीं आता, वह मोक्ष प्रदान कर दे।’ इसपर श्रीहरि ‘एवमस्तु’—कहकर अन्तर्धान हो गये। अब राजाके घर समयानुसार पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘वत्सश्री’ रखा गया। वह वेद-वेदाङ्गका पूर्ण जानकार था। भगवान् विष्णुके प्रसादस्वरूप उस प्रतापी पुत्रको पाकर राजा तपस्या करनेके विचारसे निकल पड़े। वे हिमालय पर्वतपर इन्द्रियोंको वशमें करके तथा निराहार रहकर भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए इस प्रकार स्तुति करने लगे।
राजाने कहा—क्षर एवं अक्षर—अखिल जगत् जिनका रूप है, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं, देहधारियोंके लिये परम पद, इन्द्रियोंके अविषय, विश्वकी रक्षा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा जलमय आकृति बनाये हुए हैं, उन भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। देवताओं एवं दानवोंके निरन्तर प्रार्थना करनेपर सृष्टि करनेके विचारसे आपने इस जगत्की रचना की है। भगवन्! आप सदा एक कूटस्थ रूपसे आसीन रहकर इच्छामात्रसे संसारकी सृष्टि करते हैं। प्रभो!
६०-राजा भद्राश्वका प्रश्न और नारदजीके द्वारा<br>विष्णुके आश्चर्यमय स्वरूपका वर्णन
११२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५६
आप कच्छप एवं नृसिंह आदि अनेक अवतार धारण कर चुके हैं। पर आपके अवतार लेनेकी यह बात भी मायिक ही है, तथ्य नहीं।^१ नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि, वरेश, शम्भु एवं विबुधारिनाशन आदि नामोंसे सम्बोधित होनेवाले भगवन्! आपको मेरा निरन्तर प्रणाम है। विष्णो ! आप स्वयं आदि यज्ञपुरुष हैं। यज्ञकी सामग्री हवि आदि आपका ही रूप है। पशु, ऋत्विक् और घृत—ये सब आप ही हैं। कमलनेत्र! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये।
स्तुतिके अन्तमें परम प्रभु प्रसन्न हुए। वे एक कुबड़े ब्राह्मणका वेष धारणकर वहाँ आये। उनके वहाँ पधारते ही आमका वृक्ष भी वैसा ही कुबड़ा बन गया। उन राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसे विशाल वृक्षका यह छोटा रूप कैसे हो गया—फिर सोचा कि परम प्रभुकी संनिधिका यह परिणाम है। फिर उन्होंने ब्राह्मण-वेषधारी प्रभुको प्रणाम किया। साथ ही कहा—'भगवन्! आप परम पुरुष परमात्मा हैं। अवश्य ही मुझपर कृपा करनेके लिये आपका यहाँ पधारना हुआ है। हरे! अब आप अपने वास्तविक स्वरूपका दर्शन करानेकी कृपा कीजिये।'
जब राजाने इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे प्रार्थना की, तो वे शङ्ख, चक्र एवं गदा हाथमें लिये हुए सौम्य रूप धारणकर उनके सामने विराजमान हो गये और यह वचन कहा—'राजेन्द्र! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, वह मुझसे माँग लो।' भगवान् श्रीहरिके यों कहनेपर राजाकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। साथ ही कहा—'देवेश! आप मुझे मोक्ष देनेकी कृपा करें।' राजाकी ऐसी बात सुनकर पुनः श्रीभगवान् बोले—'राजन्! मेरे यहाँ आनेपर इस विशाल आम्रके वृक्षमें जो कुब्जत्व आ गया है, इसके परिणामस्वरूप यह स्थान कुब्जाम्रक (ऋषिकेशका नामान्तर) तीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगा। इस उत्तम तीर्थमें ब्राह्मण अथवा पशु-पक्षी आदि योनिवाले भी यदि अपने शरीरका त्याग करेंगे तो उनको ले जानेके लिये पाँच सौ दिव्य विमान उपस्थित होंगे और वहाँके उन योगियोंकी मुक्ति हो जायगी।'
महाराज! इस प्रकार कहकर भगवान् जनार्दनने शङ्खके अग्रभागसे राजाका स्पर्श किया। केवल स्पर्श होते ही उन नरेशको परम निर्वाण पद प्राप्त हो गया। अतएव तुम भी उन परम प्रभुकी शरण ग्रहण करो, जिससे शोक करनेके योग्य पद तुम्हें पुनः प्राप्त न हो सके। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर यह चरित्र पढ़ेगा, उसे भगवान् श्रीहरि धर्म एवं मोक्ष प्रदान करेंगे। राजन्! जो इस परम पवित्र शुभ-व्रतको करेगा, उसे इस संसारमें सम्पूर्ण सुख-सम्पत्ति और भोग सुलभ होंगे एवं आयु समाप्त होनेपर वह भगवान्में लीन हो जायगा।
[ अध्याय ५५]
धन्यव्रत
अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! इसके बाद अब उत्तम धन्यव्रत बताता हूँ, जिसके प्रभावसे निर्धन व्यक्ति भी यथाशीघ्र धन्यवादका पात्र हो सकता है। यह नक्तव्रत^२ है। अगहनमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतमें अग्निस্বরূপ भगवान् विष्णुकी पूजाका विधान है। 'ॐ वैश्वानराय नमः', 'ॐ अग्नये नमः', 'ॐ हविर्भुजाय नमः',
१. द्रष्टव्य—'अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥' (गीता ४।६)
२. जिस व्रतमें दिनभर व्रत करके रातमें चार घड़ीके बाद भोजन किया जाता है, उसे 'नक्तव्रत' कहते हैं।
अध्याय ५७ ] कान्तिव्रत [ ११३
'ॐ द्रविणोदाय नमः', 'ॐ संवर्ताय नमः' तथा—'ॐ ज्वलनाय नमः'—इन मन्त्रवाक्योंका उच्चारण करके अग्निमय भगवान् श्रीहरिके चरण, उदर, वक्षःस्थल, भुजाएँ, सिर तथा सर्वाङ्गकी क्रमशः पूजा करनी चाहिये। इस विधानसे देवाधिदेव भगवान् जनार्दनकी अर्चना करनेके पश्चात् उनके सामने एक हवनकुण्ड बनवानेकी विधि है। विद्वान् पुरुष इन्हीं उक्त मन्त्रोंद्वारा उस कुण्डमें हवन करे। इस व्रतमें यवान्न और घृतसे युक्त भोजन करनेकी बात कही गयी है। यह व्रत ऐसा ही कृष्णपक्षमें भी होता है। चार महीनेतक इसे करना चाहिये। चैत्रसे आषाढ़तक चार महीनोंमें घृतयुक्त खीर तथा श्रावणसे कार्तिकतक सत्तूका भोजन करनेका नियम है। इस प्रकार एक वर्षमें यह व्रत समाप्त होता है। व्रत पूरा हो जानेपर विद्वान् पुरुष अग्निदेवकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाये और दो लाल वस्त्रोंसे उसे आच्छादितकर लाल फूलसे पूजा करे और लाल चन्दन एवं कुङ्कुमका अनुलेपन करे। फिर ब्राह्मणकी पूजा करे। उसे दो वस्त्र अर्पण करे और वह प्रतिमा उस ब्राह्मणको दे दे। तदनन्तर यह मन्त्र पढ़कर प्रार्थना करे—‘भगवन्! इस ‘धन्य’ नामक व्रतको सम्पन्न करनेसे मैं धन्य हो गया, मेरा कर्म धन्य हो गया तथा मेरी चेष्टा धन्य हो गयी। अब मुझे सदा सुख-शान्ति सुलभ हो जाय।’ इस प्रकार कहकर वह श्रेष्ठ प्रतिमा एवं शक्तिके अनुसार धनराशि देनेका विधान है। जिसके पास भोग्य वस्तुका अत्यन्त अभाव है, वह पुरुष भी यदि इस धन्यव्रतको करता है, तो वह तुरंत धन्य होनेका अधिकारी हो जाता है। केवल इस व्रतके करनेसे ही व्यक्ति इस जन्ममें सौभाग्य एवं प्रचुर धन-धान्यसे सम्पन्न हो जीवन्मुक्त हो जाता है। जो भी व्यक्ति इस प्रसङ्गको सुनेगा अथवा भक्तिके साथ पढ़ेगा, वे दोनों इस लोकमें उसी क्षण धन्य हो जायँगे। ऐसा सुना जाता है कि पूर्व कल्पमें महात्मा कुबेरका जन्म शूद्रयोनिमें हुआ था। उस समय उन्होंने इस व्रतको किया था और इसीके फलस्वरूप वे धनके स्वामी बन गये।
[ अध्याय ५६ ]
कान्तिव्रत
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब कान्ति नामक व्रतको बताता हूँ। पहले चन्द्रमाने यह व्रत किया था, जिसके फलस्वरूप उन्हें पुनः कान्ति सुलभ हो गयी। प्राचीन कालकी बात है। दक्ष प्रजापतिके शापसे चन्द्रमाको राजयक्ष्मा नामक रोग हो गया। तब उन्होंने यह व्रत किया और वे फिर तत्क्षण कान्तिमान् बन गये। राजेन्द्र! यह नक्तव्रत है। इसे कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन करना चाहिये। इसमें बलराम और श्रीकृष्णकी पूजा होती है। इस तिथिमें ये दोनों देवता दो कलावाले चन्द्रमामें विराजते हैं। अतः चन्द्रमाको विष्णुका उत्तम रूप माना जाता है। बुद्धिमान् पुरुष ‘ॐ बलदेवाय नमः’ कहकर उनके चरणोंकी तथा ‘ॐ केशवाय नमः’ से सिरकी अर्चना करे। सुव्रत! फिर आगे कहे जानेवाले मन्त्रको पढ़कर उन्हें अर्घ्य देना चाहिये। भगवन्! आप अमृतरूप हैं, ब्रह्माने आपका सम्मान किया है, यज्ञलोकके आप अध्यक्ष हैं। परमात्मन्! इस समय आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। अतः आपको नमस्कार है।* व्रती
* नमोऽस्त्वमृतरूपाय स वै विधिवराय च। यज्ञलोकाधिपतये सोमाय परमात्मने॥ (५७। ६)
६१-भगवान् नारायण-सम्बन्धी आश्चर्यका वर्णन
| १९४ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ५८ |
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ब्राह्मण रातमें घृतसे युक्त यवान्न भोजन करे। (यह भी चौमासेका व्रत है) फाल्गुनसे लेकर चार महीनेतक इस व्रतको करनेवाला पुरुष पवित्रतापूर्वक रहकर खीर भोजन करे। कार्तिक-मासमें यवान्नके आहारपर रहे और अगहनी चावलसे बने हुए हव्यद्वारा हवन करे। आषाढ़ आदि चार महीनोंमें तिलका हवन करना चाहिये। इसी प्रकार तिलका भोजन भी करना चाहिये। फिर वर्ष पूरा हो जानेपर चन्द्रमाकी एक सोनेकी प्रतिमा बनवाकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे आच्छादित करे। उसपर उजले फूल चढ़ाकर श्वेत चन्दनसे अनुलेपनकर तथा भलीभाँतिसे पूजा करके ब्राह्मणको दे दे, अथवा वर्षभर व्रतकर चन्द्रमाकी चाँदीकी ही मूर्ति बनवाये और दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादितकर उसकी श्वेत पुष्पों एवं श्वेत चन्दनसे पूजा करे। ऐसे ही ब्राह्मणकी भी पूजाकर उसे वह प्रतिमा दान कर दे। ब्राह्मणको प्रतिमा अर्पण करते समय व्रती मन-ही-मन मन्त्र पढ़े—'नारायण! आप चन्द्रमाके रूपमें पधारे हैं। आपको मेरा नमस्कार। भगवन्! आपकी कृपासे मैं भी इस लोकमें कान्तिमान्, सर्वज्ञ एवं प्रियदर्शन बन जाऊँ।'^१ राजन्! उक्त प्रतिमाको दानकर मनुष्य तत्क्षण कान्ति प्राप्त कर लेता है। बहुत पहले स्वयं चन्द्रमाने यह व्रत किया था। व्रत पूर्ण हो जानेपर स्वयं भगवान् श्रीहरि उनपर संतुष्ट हो गये और उनका यक्ष्मा रोग दूरकर उन्हें 'अमृता'^२ नामकी कला प्रदान की। महाभाग चन्द्रमाने उस कलाको द्वितीयाके बाद सदा अपनेमें स्थान दिया। उन्हें यह कला तपके प्रभावसे ही उपलब्ध हुई है। इतना ही नहीं, वे सोम और द्विजराज भी कहलाने लगे। शुक्लपक्षकी द्वितीया तिथिके दिन सोमरस पीनेवाले दोनों अश्विनीकुमारोंका कीर्तन करना चाहिये। ये दोनों शुक्लपक्षकी द्वितीयाके चन्द्रमामें शेष और विष्णु नामसे विख्यात होकर सुशोभित होते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। राजेन्द्र! भगवान् विष्णु परम पुरुष परमात्मा हैं। उनसे रिक्त कोई देवता नहीं है। वे ही अनेक नाम धारणकर सर्वत्र (सभी देवताओंके रूपमें) विराजित हैं।
[अध्याय ५७]
सौभाग्य-व्रत
**अगस्त्यजी कहते हैं—**राजन्! अब उस सौभाग्य-व्रतको सुनो, जिसके आचरणसे स्त्री एवं पुरुषोंको शीघ्र सौभाग्यकी प्राप्ति होती है—भाग्यका उदय हो जाता है। फाल्गुनमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिको नक्तव्रतके रूपमें कर्ताको पवित्र एवं सत्यवादी होकर उपवास करना चाहिये। इस व्रतमें लक्ष्मीसहित भगवान् श्रीहरिकी अथवा उमासहित महाभाग शंकरकी पूजाका विधान है। जो लक्ष्मी हैं, वही गिरिजा हैं और जो श्रीहरि हैं, वे ही तीन नेत्रवाले हर भी हैं—सम्पूर्ण वेदशास्त्रों एवं पुराणोंमें यही बात सुस्पष्ट निर्दिष्ट है। किंतु जो ग्रन्थ इसके विपरीत यह कहता है कि 'विष्णुसे रुद्र भिन्न हैं, वह किसी अच्छे कविका प्रबन्ध हो सकता है, पर उसे 'शास्त्र' कदापि नहीं कहा जा सकता। अतः विष्णु रुद्रके ही स्वरूप हैं और लक्ष्मी गौरीकी
१. कान्तिमानपि लोकेऽस्मिन् सर्वज्ञः प्रियदर्शनः। त्वत्प्रसादात्सोमरूपिन्नारायण नमोऽस्तु ते॥ (५७।१२)
२. अमृता मानदा पूषा तुष्टिः पुष्टीरतिर्धृतिः। शशिनी चन्द्रिका कान्तिर्ज्योत्स्ना श्रीः प्रीतिरङ्गदा॥
पूर्णा पूर्णामृता कामदायिन्यः शशिनः कलाः॥ (शारदातिलक २।१२-१३)
इस तन्त्रवचनानुसार 'अमृता', शुक्लपक्षकी द्वितीयाकी चन्द्रकला है।
६२-सत्ययुग, त्रेता और द्वापर आदिके गुणधर्म
अध्याय ५९ ] अविघ्नव्रत १९५
ही अन्यतम प्रतिकृति हैं—यही कहना समुचित है। जो इन दोनोंमें भेद बतलाता है, वह निकृष्ट है।'
राजेन्द्र! फिर व्रती पुरुष यत्नपूर्वक लक्ष्मीसहित श्रीहरिकी भलीभाँति पूजा करे। उन परम प्रभुके पूजनके मन्त्र यों हैं—'ॐ गम्भीराय नमः, ॐ सुभागाय नमः, ॐ देवदेवाय नमः, ॐ त्रिनेत्राय नमः, ॐ वाचस्पतये नमः, ॐ रुद्राय नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा क्रमशः उनके दोनों चरण, कटिभाग, उदर, मुख, सिर एवं सभी अङ्गोंकी पूजा करनी चाहिये। इस विधिके अनुसार पूजाकर मेधावी मनुष्य लक्ष्मीसहित विष्णुकी और गौरीसहित शंकरकी पुष्प-चन्दन आदि उपचारोंद्वारा पूजा करे। तदनन्तर मूर्तिके सामने मधु एवं घृतसे हवन करना चाहिये। महाराज! यदि सर्वोत्तम सौभाग्य पानेकी कामना हो तो तिल और घृतसे हवन कराये। इस दिन बिना नमक तथा घृतके शुद्ध गेहूँसे तैयार किया हुआ भोजन पृथ्वीपर ही बैठकर करना चाहिये। कृष्णपक्षके लिये भी यही विधि बतायी जाती है। आषाढ़से लेकर आश्विनतकके चार महीनोंमें यह व्रत प्रतिपदा तिथिके दिन होता है और द्वितीयाको पारण करनेकी विधि है। इन महीनोंमें यह व्रत यावान्नसे करना चाहिये। राजन्! इसके पश्चात् कार्तिकसे पूसतक—तीन मासोंमें व्रती पुरुष पवित्रतापूर्वक संयमसे रहकर श्यामाक (साँवा)-का भोजनमें उपयोग करे। नरेश! फिर माघमासके शुक्लपक्षकी तृतीया तिथिके दिन बुद्धिमान् पुरुष अपनी शक्तिके अनुसार पार्वती-शंकर तथा लक्ष्मी-नारायणकी सुवर्णमयी प्रतिमा बनवाकर किसी सत्पात्र एवं विद्वान् ब्राह्मणको अर्पण कर दे। जिसके पास अन्नका अभाव हो, वेदका जो पारगामी विद्वान् हो, जो सदा दूसरोंका उपकार करता हो, जिसके आचरण पवित्र हों तथा विशेष रूपसे विष्णुमें भक्ति रखता हो, ऐसे ब्राह्मणको वह प्रतिमा देनी चाहिये। साथ ही दानमें छः पात्र भी देनेकी विधि है। एकसे लेकर छः तक वे पात्र क्रमशः मधु, घृत, तिलका तैल, गुड़, लवण एवं गायके दूधसे पूर्ण हों। इन पात्रोंके दान करनेके प्रभावसे व्रत करनेवाला व्यक्ति स्त्री अथवा पुरुष—कोई भी हो, वह अन्य सात जन्मोंमें सुन्दर सद्भाग्यशाली और परम दर्शनीय हो जाता है।
[ अध्याय ५८ ]
अविघ्नव्रत
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! सुनो। अब मैं 'विघ्नहर' नामक व्रतको बतलाता हूँ। इसके विधिपूर्वक आचरण करनेसे पुरुष विघ्नोंद्वारा पराभूत—बाधित या तिरस्कृत नहीं होता। इसके प्रारम्भिक ग्रहणकी विधि इस प्रकार है। फाल्गुनमासकी चतुर्थीको दिनमें उपवास रहकर चार घड़ी रात बीतनेपर भोजन करे। प्रातःपारणामें तिल लेने चाहिये। उस दिन तिलसे ही हवन करे तथा तिल ही ब्राह्मणको दान भी दे। इसी प्रकार चार मासतक इसका अनुष्ठानकर पाँचवें महीनेमें (आषाढ़की) चतुर्थीको सुवर्णमयी गणेशकी प्रतिमाकी भलीभाँति पूजाकर खीर एवं तिलसे भरे हुए पाँच पात्रोंके साथ उसे ब्राह्मणको दे देनी चाहिये। इस प्रकार इस व्रतका अनुष्ठानकर मनुष्य सम्पूर्ण विघ्नोंसे छुटकारा पा जाता है। अपने अश्वमेध यज्ञमें विघ्न पड़नेपर राजा सगरने इसी व्रतका अनुष्ठानकर, अश्वको प्राप्तकर यज्ञ सम्पन्न किया था। त्रिपुरासुरसे युद्धके समय भगवान् रुद्रने भी इसी व्रतके प्रभावसे त्रिपुरासुरका वध किया था। मैंने भी समुद्रपानके समय यही व्रत किया था।
| ११६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय ६१ |
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परंतप! पूर्वसमयमें तप एवं ज्ञानकी इच्छावाले अन्य अनेक राजाओंने विघ्न दूर करनेके लिये इस व्रतका आचरण किया था। इस व्रतके दिन पुण्यात्मा पुरुष विघ्न समाप्त होनेके निमित्त ‘ॐ शूराय नमः, ॐ धीराय नमः, ॐ गजाननाय नमः, ॐ लम्बोदराय नमः, ॐ एकदंष्ट्राय नमः'—इन मन्त्रोंका उच्चारण कर गणेशजीकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करे और इन्हीं मन्त्रोंद्वारा हवन भी करे। केवल इसी व्रतके करनेसे मानव सभी विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। गणेशजीकी प्रतिमा दान करनेसे तो उसके जीवनकी सारी अभिलाषाएँ ही पूरी हो जाती हैं।
[ अध्याय ५९]
शान्ति-व्रत
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब तुम्हें 'शान्ति-व्रत' का उपदेश करता हूँ। इसके आचरणसे गृहस्थोंके घरमें सदा शान्ति-सन्मति बनी रहती है। सुव्रत! कार्तिकमासके शुक्लपक्षकी पञ्चमी तिथिके दिनसे आरम्भकर एक वर्षपर्यन्त व्रतीको अत्यन्त उष्ण भोजनका त्याग करना चाहिये तथा प्रदोषकालमें शेषशायी श्रीहरिकी सम्यक् प्रकारसे पूजा करनी चाहिये। ‘ॐ अनन्ताय नमः', ‘ॐ वासुकये नमः', ‘ॐ तक्षकाय नमः', ‘ॐ कर्कोटकाय नमः', ‘ॐ पद्माय नमः', ‘ॐ महापद्माय नमः', ‘ॐ शङ्खपालाय नमः', ‘ॐ कुटिलाय नमः'—इन मन्त्रोंके द्वारा भगवान् विष्णुके शय्यास्वरूप शेषनागके क्रमशः दोनों चरण, कटिभाग, उदर, छाती, कण्ठ,दोनों भुजाएँ, मुख एवं सिरकी विधि-पूर्वक पृथक्-पृथक् पूजा करनी चाहिये। फिर भगवान् विष्णुको लक्ष्यकर सभी अङ्गोंको दूधसे भी स्नान कराये। तत्पश्चात् श्रद्धालु साधकको भगवान्के सामने तिलमिश्रित दूधसे हवन करना चाहिये।
इस प्रकार एक वर्ष पूराकर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और सुवर्णमयी शेषनागकी प्रतिमा बनाकर ब्राह्मणको दान दे। राजन्! जो पुरुष इस प्रकार यह व्रत भक्तिपूर्वक करता है, उसे निश्चय ही शान्ति सुलभ हो जाती है, साथ ही उसे सर्पोंसे भी भय नहीं होता। [ अध्याय ६० ]
काम-व्रत
अगस्त्यजी कहते हैं—राजेन्द्र! अब मैं ‘काम-व्रत' कहता हूँ, सुनो। इस व्रतके प्रभावसे मनमें उठी कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। यह व्रत पौष-मासके शुक्लपक्षमें होता है तथा यह व्रत एक वर्षपर्यन्त चलता है। इसमें पञ्चमी तिथिके दिन भोजनकर षष्ठीके दिन फलाहारपर रह जाय। अथवा यह भी नियम है कि बुद्धिमान् पुरुष षष्ठीके दिन दोपहरमें फलाहार करे और रातमें मौन होकर ब्राह्मणोंके साथ शुद्ध भात खाय या केवल फलाहारपर ही व्रत करे। षष्ठीको पूरा दिनभर उपवास रहकर सप्तमी तिथिमें पारणा करनी चाहिये। इसमें भगवान् कार्तिकेयकी पूजा-कर हवन करना चाहिये। इस प्रकार एक वर्ष-पर्यन्त व्रत करे। षडानन, कार्तिकेय, सेनानी, कृत्तिकासुत, कुमार और स्कन्द—इन नामोंसे विष्णु ही प्रतिष्ठित हैं। अतः उनके इन नामोंसे ही उनकी पूजा करनी चाहिये। व्रत समाप्त होनेपर ब्राह्मणको भोजन कराये और षण्मुखकी सुवर्णमयी प्रतिमा ब्राह्मणको दे। वस्त्रसहित प्रतिमा ब्राह्मणको देते समय व्रती इस प्रकार प्रार्थना करे—'भगवान् कार्तिकेय! आपकी कृपासे मेरी सम्पूर्ण कामनाएँ सिद्ध हो जायँ।' फिर ब्राह्मणको
६३-कलियुगका वर्णन
अध्याय ६२ ] आरोग्य-व्रत ११७
लक्ष्य कर कहे—'ब्राह्मण देवता! मैं भक्तिपूर्वक यह प्रतिमा देता हूँ, आप कृपापूर्वक इसे स्वीकार करें।' इस प्रकारके दानमात्रसे व्रतीके इस जन्मकी समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं। संतानहीनको पुत्र, धनकी इच्छावालेको धन तथा राज्य छिन जानेवालेको राज्य सुलभ हो सकता है—इसमें कुछ भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। महाराज! इस व्रतका पूर्व समयमें ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए राजा नलने अनुष्ठान किया था। उस समय वे ऋतुपर्णके राज्यमें निवास करते थे। नृपवर! प्राचीन कालके बहुत-से अन्य प्रधान नरेशोंने भी हाथसे राज्य निकल जानेपर कामनासिद्धिके लिये इस व्रतका आचरण किया था। [ अध्याय ६१ ]
आरोग्य-व्रत
अगस्त्यजी कहते हैं—महाराज! अब आरोग्य नामक एक दूसरा परमपवित्र व्रत बताता हूँ, जिसके प्रभावसे सम्पूर्ण पाप भस्म हो जाते हैं। इस व्रतमें आदित्य, भास्कर, रवि, भानु, सूर्य, दिवाकर एवं प्रभाकर—इन सात नामोंसे भगवान् सूर्यकी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। इस व्रतमें षष्ठी तिथिके दिन भोजनकर सप्तमीको प्रातःकाल भगवान् भास्करकी पूजा करते हुए उपवास करना चाहिये। फिर अष्टमी तिथिको भोजन करे, यही इस व्रतकी विधि है। इस प्रकार पूरे एक वर्षतक जो भगवान् सूर्यकी पूजा करता है, उसे इस जन्ममें आरोग्य, धन तथा धान्य सुलभ हो जाते हैं और परलोकमें वह उस पवित्र स्थानपर पहुँचता है, जहाँ जाकर पुनः संसारमें जन्म नहीं लेना पड़ता।
प्राचीन समयकी बात है, अनरण्य नामके महान् प्रतापी राजा थे, जिनके वशमें सम्पूर्ण पृथ्वी थी। राजन्! उन महाभाग नरेशने यह व्रत किया तथा उस दिन भगवान् भास्करकी पूजा भी की, जिसके फलस्वरूप भगवान् सूर्य उनपर प्रसन्न हो गये और राजा अनरण्यको उन्होंने उत्तम आरोग्य प्रदान कर दिया।
राजा भद्राश्वने पूछा—राजन्! आपने राजाके आरोग्य होनेकी बात कही तो क्या इसके पूर्व वे रोगी थे? भला, वे सार्वभौम राजा रोगग्रस्त कैसे हो गये?
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! राजा अनरण्य चक्रवर्ती सम्राट् थे; साथ ही वे अत्यन्त रूपवान् एवं यशस्वी भी थे। एक समयकी बात है—वे परम पराक्रमी राजा दिव्य मानसरोवरपर गये, जहाँ देवताओंका निवास है। वहाँ उन्हें सरोवरके बीचमें एक बड़ा-सा श्वेत कमल दीखा। उस कमलपर अँगूठेकी आकृतिके बराबर एक दिव्य पुरुष बैठे थे, जिनका शरीर बड़ा तेजःपूर्ण था। उनकी दो भुजाएँ थीं और वे लाल वस्त्रोंसे आच्छादित थे। उस कमलको देखकर राजा अनरण्यने अपने सारथिसे कहा—'तुम किसी प्रकार इस कमलको ले आनेका प्रयत्न करो। कारण, जब मैं इसे अपने सिरपर धारण करूँगा, तब संसारमें मेरी बड़ी प्रतिष्ठा होगी, अतः देर मत करो।'
राजन्! अनरण्यके ऐसा कहनेपर सारथि उस सरोवरमें घुसा। फिर उस कमलको लेनेके लिये आगे बढ़ा और उसे स्पर्श करना चाहा, इतनेमें वहाँ बड़े उच्च स्वरसे हुंकारकी ध्वनि हुई। उस शब्दके प्रभावसे सारथिके हृदयमें आतङ्क छा गया। वह जमीनपर गिरा और उसके प्राण निकल गये तथा राजा भी कुष्ठग्रस्त, बलहीन एवं विवर्ण
११८ संक्षिप्त श्रीवराहपुराण [ अध्याय ६२
हो गये। अपनी ऐसी स्थिति देखकर राजा—‘यह क्या हुआ?’ इस चिन्तामें पड़ गये और वहीं रुके रहे। इतनेमें ही महान् तपस्वी ब्रह्मपुत्र बुद्धिमान् वसिष्ठजी वहाँ आ गये और उन्होंने राजा अनरण्यसे पूछा—‘राजन्! तुम यहाँ कैसे पहुँचे तथा तुम्हारे शरीरकी ऐसी स्थिति कैसे हुई? अब मैं तुम्हारे लिये क्या करूँ? यह बताओ।’
राजन्! वसिष्ठजीके इस प्रकार पूछनेपर अनरण्यने उनसे कमलसम्बन्धी सम्पूर्ण वृत्तान्तका वर्णन किया। राजाकी बात सुनकर मुनिने कहा—‘राजन्! तुम साधु थे, पर तुम्हारे मनमें असाधुता आ गयी। इसीलिये तुमपर कुष्ठरोगका आक्रमण हो गया है।’ मुनिके ऐसा कहनेपर राजाने हाथ जोड़कर काँपते हुए पूछा—‘विप्रवर! मैं साधु या असाधु कैसे हूँ और मेरे शरीरमें यह कोढ़ कैसे हो गया? यह सब आप बतानेकी कृपा करें।’
वसिष्ठजी बोले—राजन्! इस ‘ब्रह्मोद्भव’ कमलकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। इसके दर्शनकी बड़ी भारी महिमा है। इससे सम्पूर्ण देवता प्रसन्न हो सकते हैं। राजन्! छः महीनेके भीतर कभी भी जनता इस सरोवरमें यह कमल देख लिया करती है। जो मनुष्य केवल इसका दर्शन करके जलमें पैर रख देता है, उसके सम्पूर्ण पाप भाग जाते हैं तथा वह पुरुष निर्वाणपदका अधिकारी हो जाता है; क्योंकि जलमें दीखनेवाली यह ब्रह्माजीकी प्रारम्भिक मूर्ति है। इस मूर्तिका दर्शनकर जो जलमें प्रवेश करता है, उसकी संसारसे मुक्ति हो जाती है। राजन्! तुम्हारा सारथि इस विग्रहको देखकर जलमें चला गया और जानेपर उसने इसे लेनेकी भी चेष्टा की। नरेश! इसका कारण यह था कि तुम्हारे मनमें लोभ उत्पन्न हो गया था एवं तुम्हारी बुद्धि नष्ट हो चुकी थी। इसीका परिणाम है कि तुम कोढ़ी बन गये हो। तुमने इनका दर्शन कर लिया है, जिसके कारण साधुकी श्रेणीमें आ गये। नरेश! साथ ही इस कमलको पानेके लिये तुम्हारे मनमें जो मोह उत्पन्न हो गया, इस कारण मैंने तुम्हें असाधु कहा।
देवताओंका भी कथन है कि ‘मानसरोवरके ब्रह्मपद्म नामक कमलपर (ब्रह्मरूपमें) भगवान् श्रीहरि आकर विराजते हैं। उनका दर्शनकर हम उस ब्रह्मपदको पा जायँगे, जहाँसे पुनः संसारमें आना नहीं पड़ता है। राजन्! यही कारण है कि तुम्हारे अङ्गमें कुष्ठ हो गया। इस कमलपर स्वयं भगवान् श्रीहरि सूर्यका रूप धारण करके विराजते हैं। वस्तुतः विचार किया जाय तो यह सनातन परब्रह्म परमात्माका ही रूप है। ‘मैं इसको अपने सिरपर धारण करूँ, जिससे मेरी प्रसिद्धि हो जाय’ तुमने ऐसी भावना लेकर इसे प्राप्त करनेके लिये सारथिको भेजा। यह बेचारा सारथि तो उसी क्षण अपने प्राणोंसे हाथ धो बैठा और तुम्हारी देह कुष्ठरोगसे व्याप्त हो गयी। अतएव महाराज! तुम भी यह आरोग्य नामक व्रत करो। इस व्रतके करनेसे तुम कुष्ठरोगसे छुटकारा पा जाओगे।
ऐसा कहकर वसिष्ठजी राजाके पाससे चले गये। राजाने भी उनकी बात सुनकर प्रतिदिन उस सरोवरपर जाने और वहाँ ब्रह्माजीके दर्शन करनेका नियम बना लिया और फिर वे शीघ्र ही कुष्ठमुक्त होकर स्वस्थ एवं कृतार्थ हो गये।
[अध्याय ६२]