भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ५० ] धरणीव्रत १०५

जा सकता है। इसमें कोई संशय नहीं। इसीलिये मेरे मुखसे निकल गया, 'यह सारा जगत् वञ्चित हो गया है।' मैंने केवल भक्तिकी बात कही है। भगवान् विष्णुके सम्मुख दूसरेके जलाये दीपकको प्रज्वलित कर देनेमात्रसे ऐसा फल प्राप्त हुआ है। अब जो मैंने मूर्ख होनेकी बात कही, इसका अभिप्राय इतना ही है कि भगवान्‌के मन्दिरमें दीप-दान करनेके महत्त्वको ये लोग नहीं जानते। मैंने ब्राह्मणों और राजाओंको धन्यवाद इसलिये दिया है कि जो अनेक प्रकारके यज्ञोंद्वारा भक्तिके साथ उक्त विधिसे श्रीहरिकी उपासना करते हैं, वे धन्यवादके पात्र होते हैं। मुझे उन प्रभुके अतिरिक्त इस जगत्‌में अन्य कुछ भी नहीं दीखता, अतः मैंने अपनेको भी धन्य कहा। इस स्त्रीको तथा तुम्हें धन्य बतानेका कारण यह है कि यह एक वैश्यके घर सेविका थी और तुम भी सेवाका ही कार्य करते थे। स्वामीके चले जानेपर तुमलोगोंने भगवान्‌के मन्दिरमें दीपकको प्रज्वलित रखा। अतः यह स्त्री और इससे बढ़कर तुम धन्यवादके पात्र हो। प्रह्लादके शरीरमें आसुर भावनाके बीज थे, फिर भी परमपुरुष परमात्माको छोड़कर उनकी दृष्टिमें अन्य कोई सत्ता न थी, अतः मैंने उन्हें धन्य कहा है। ध्रुवका जन्म राजाके घरमें हुआ था। बचपनमें ही वे वनमें चले गये और वहाँ भगवान् विष्णुकी आराधनाकर सर्वोत्कृष्ट सुन्दर स्थान प्राप्त किया। महाराज! इसलिये मैंने ध्रुवको भी साधु कहा है।

अगस्त्यजीसे राजा भद्राश्वने संक्षेपूपसे उपदेश देनेकी प्रार्थना की थी; अतः मुनिने कहा—'राजन्! अब कार्तिककी पूर्णिमाका पर्व आ गया है। मैं पुष्करक्षेत्र जा रहा हूँ'—यों कहकर वे चल पड़े। पुष्कर जाते समय ही वे राजा भद्राश्वके महलपर रुके थे और उन मुनिवरने राजाको वहीं द्वादशीव्रत करनेका उपदेश दिया था। चलते समय मुनि राजाको पुत्र-प्राप्तिका आशीर्वाद दे गये।

राजा भद्राश्वने भी भगवान् पद्मनाभकी द्वादशीका व्रत किया। फलतः वे पुत्र-पौत्र और उत्तम-से-उत्तम भोगोंसे सम्पन्न होकर अन्तमें भगवान् पद्मनाभके धामको प्राप्त हुए। [अध्याय ४९]


धरणीव्रत

दुर्वासाजी कहते हैं—अगस्त्यजी पुष्कर तीर्थमें जाकर पुनः राजा भद्राश्वके भवनपर ही वापस आ गये। मुनिको अपने यहाँ आये देखकर उन राजाके मनमें महान् हर्ष हुआ। उन धार्मिक नरेशने उन्हें आसनपर बैठाया और पाद्य एवं अर्घ्य आदिसे पूजा कर कहने लगे—'भगवन्! आपके आदेशानुसार आश्विनमासकी द्वादशीकी व्रतविधिका मैंने अनुष्ठान किया। अब कार्तिक-मासमें यह व्रत करनेसे जो पुण्य होता है, वह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।'

अगस्त्यजी बोले—राजन्! कार्तिकमासकी विधिपूर्वक द्वादशी-व्रतके और फलकी बात मैं तुमसे कहता हूँ, तुम उसे सावधान होकर सुनो। व्रतीको मेरे द्वारा पहले बताये विधानके अनुसार संकल्प करके स्नान करना चाहिये। फिर भगवान् नारायणकी 'ॐ सहस्रशिरसे नमः', 'ॐ पुरुषाय नमः', 'ॐ विश्वरूपिणे नमः', 'ॐ ज्ञानास्त्राय नमः', 'ॐ श्रीवत्साय नमः', 'ॐ जगद्ग्रसिष्णवे नमः', 'ॐ दिव्यमूर्तये नमः' तथा 'ॐ सहस्रपादाय नमः'—इन मन्त्रोंद्वारा क्रमशः सिर, भुजा, कण्ठ, अस्त्रों, हृदयदेश, उदर, कटिभाग तथा चरणदेशकी पूजा करनी चाहिये। विद्वान् पुरुष अनुलोम-क्रमसे