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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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१०६ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५०

भी पूजन करें। फिर 'ॐ दामोदराय नमः' कहकर सभी अङ्गोंकी एक साथ पूजा करनी चाहिये।

इस प्रकार पूजाकर प्रतिमाके सामने चार कलश रखकर उनमें रत्न डालकर उन्हें उजले चन्दनसे लेपकर पुष्पमालासे अलङ्कृत तथा श्वेत वस्त्रसे आवेष्टितकर और उनपर तिलपूर्ण ताँबेका पात्र रखे। महाराज! फिर उनमें चारों समुद्रकी कल्पना करे। फिर उनके मध्यभागमें भगवान् श्रीहरिकी प्रतिमा स्थापितकर विधिवत् पूजा करनी चाहिये। उस दिन रातमें जागरणकर भगवान्‌की मानसिक पूजाकर वैष्णव-यज्ञका अनुष्ठान करे। बहुत-से योगी पुरुष सोलह दलवाले चक्रमें योगीश्वर प्रभुकी अर्चना करते हैं। इस प्रकार पूजनका कार्य समाप्त हो जानेपर प्रातः चार समुद्रोंकी भावनासे कलशोंको चार ब्राह्मणको दान कर दे। प्रतिमा पाँचवें वेदज्ञ ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। दो अथवा चार प्रतिमाएँ भी देनेकी विधि है। यदि दान ग्रहण करनेवाले ब्राह्मण पञ्चरात्र-आगमके आचार्य हों तो सर्वोत्तम है; उन्हें देनेपर हजार व्रतोंका फल प्राप्त होता है। जो इस व्रतके रहस्यको स्पष्ट बतानेमें कुशल हैं तथा मन्त्रोच्चारणपूर्वक विधि सम्पन्न कराते हैं, ऐसे व्यक्तिको दान करनेसे वह करोड़ गुणा फल देता है। अपने गुरुके रहते दूसरेका आश्रय लेनेवाले और उसकी पूजा करनेवालेकी दुर्गति होती है। उसके किये हुए किसी दानका कोई फल नहीं, अतः प्रयत्न करके सर्वप्रथम गुरुका सम्मान करना चाहिये। इसके बाद दूसरेको दे। गुरु पढ़ा-लिखा हो अथवा कुछ भी न जानता हो, फिर भी उसे भगवान् श्रीहरिका स्वरूप जानना चाहिये। गुरु चाहे उत्तम मार्गका अनुसरण करता है अथवा अधम मार्गका; किंतु शिष्यके लिये एकमात्र वही गति है। जो व्यक्ति पहले गुरुका सम्मानकर फिर मूर्खताके कारण पीछे उसके प्रतिकूल व्यवहार करता है, वह पतित होता है और करोड़ युगोंतक उसे नरककी यातना भोगनी पड़ती है।

इस प्रकार दानकर द्वादशीके दिन भगवान् विष्णुकी पुनः विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिये। फिर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और उन्हें अपनी शक्तिके अनुसार दक्षिणा दे। इसका नाम 'धरणीव्रत' है। पूर्वकालमें दक्षप्रजापतिने इस व्रतका आचरण किया था। फलस्वरूप वे प्रजापतिके पदपर प्रतिष्ठित हुए और अन्तमें मुक्त होकर सनातन श्रीहरिमें लीन हो गये। हैहयवंशी कृतवीर्य नामक नरेशने भी यह व्रत किया था, जिसके प्रभावसे उसे कार्तवीर्य नामक पुत्र प्राप्त हुआ। अन्तमें वह भी सनातन श्रीहरिके लोकमें चला गया। शकुन्तलाने भी इसी प्रकार यह व्रत किया था, जिससे वह चक्रवर्ती राजा भरतकी माता बनी। यों ही प्राचीन समयमें अनेक चक्रवर्ती राजाओंने उक्त विधिसे यह व्रत किया है और इसके प्रतापसे वे प्रमुख चक्रवर्ती हो गये हैं—यह बात वेदोंमें बतायी गयी है। प्राचीन समयमें पातालमें डूबकर कालक्षेप करती हुई पृथ्वीने भी इस उत्तम व्रतको किया था। तभीसे यह व्रत धरणीव्रतके नामसे प्रसिद्ध हुआ। पृथ्वीद्वारा यह व्रत सम्पन्न होते ही भगवान् श्रीहरिने परम संतुष्ट होकर उसी समय वराहका रूप धारण किया और इस प्रकार उसे ऊपर उठा लाये, जैसे नौका जलमें डूबते हुए प्राणीको बचा लेती है। मुने! इस धरणीव्रतका स्वरूप मैंने तुम्हें बता दिया। जो श्रेष्ठ पुरुष इस प्रसङ्गको सुनेगा अथवा भक्तिके साथ इस व्रतको करेगा, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो अन्तमें भगवान् विष्णुके परम धामको ही प्राप्त होगा। [अध्याय ५०]