वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय ५५ ] शुभ-व्रत १११
पूस, माघ एवं फाल्गुन—इन चार महीनोंमें ऐसे ही नियमोंका पालन करना समुचित है। उपवास करके पूजा सम्पन्न करे। फिर विद्वान् पुरुष चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ एवं आषाढ़—इन चार महीनोंमें उसी तरह संयमपूर्वक व्रत करे। इस चौमासेमें ब्राह्मणोंके लिये प्रीतिपूर्वक पात्रसहित सत्तू दान करना चाहिये। श्रावण, भाद्रपद और आश्विन—इन तीन महीनोंमें अगहनमासमें तैयार होनेवाले धानको बाँटनेका विधान है। इन तीन मासोंकी अवधि कार्तिक आरम्भ होनेके पूर्वतक मानी जाती है। इन महीनोंमें भी पूर्व-जैसे ही उपवास करके पूजा करनेका नियम है। दशमीके दिन संयमशील एवं पवित्र रहे। एकादशीके दिन बुद्धिमान् व्यक्ति मासके नामका उच्चारण करके भक्तिके साथ भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। द्वादशीके दिन व्रतको समाप्त करे।
राजन्! एकादशीके दिन पर्वत एवं पातालके रूपसे अङ्कित पृथ्वीकी सुवर्णमयी प्रतिमाके पूजन एवं दानका विशेष महत्त्व है। भगवान् श्रीहरिके सामने उस प्रतिमाको स्थापितकर उसे दो सफेद वस्त्रोंसे ढक दे, पासमें बीज बिखेर दे और रातमें जागरण करे। फिर प्रातःकाल चौबीस ब्राह्मणोंको आमन्त्रितकर प्रत्येक ब्राह्मणको गाय, दो वस्त्र, सुवर्णमयी अँगुठी तथा कुण्डल आदि आभूषण दे। राजन्! यदि व्रती पुरुष राजा है तो वह प्रत्येक ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार भरण-पोषणकी व्यवस्था कर दे और दक्षिणामें सुवर्णसे बनी हुई पृथ्वीकी प्रतिमा, दो गौ और दो वस्त्र दे। अथवा अपनी सम्पत्तिके अनुसार चाँदीकी पृथ्वी बनवाये और भगवान् श्रीहरिको स्मरण करते हुए उसे ब्राह्मणोंको अर्पण कर दे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंको भोजन, छाता और खड़ाऊँ भी दे। तत्पश्चात् प्रार्थना करे—‘भगवान् कृष्ण, दामोदर, श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हो जायें।’ राजन्! इस व्रतके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। फिर भी एक प्रसङ्ग सुनाता हूँ।
सत्ययुगमें एक ब्रह्मवादी राजा थे। उन्होंने ब्रह्माजीसे पुत्र-प्राप्तिका उपाय पूछा। तब ब्रह्माजीने उन्हें यह व्रत बता दिया और राजा इस व्रतको करनेमें संलग्न हो गये। राजन्! व्रत समाप्त हो जानेपर विश्वात्मा श्रीहरि राजाके सामने पधारे और कहा—‘राजन्! तुम मुझसे वर माँगो।’
राजाने कहा—‘देवेश! मुझे ऐसा पुत्र देनेकी कृपा कीजिये, जो वैदिक मन्त्रोंका पूर्ण जानकार, दूसरोंका यज्ञ करानेवाला, स्वयं यज्ञ करनेमें तत्पर, कीर्तिसम्पन्न, दीर्घायु, असंख्य सद्गुणोंसे युक्त, ब्राह्मणोंमें निष्ठा रखनेवाला तथा शुद्ध अन्तःकरणसम्पन्न हो तथा जहाँ पहुँच जानेपर फिर सोच करनेका अवसर सामने नहीं आता, वह मोक्ष प्रदान कर दे।’ इसपर श्रीहरि ‘एवमस्तु’—कहकर अन्तर्धान हो गये। अब राजाके घर समयानुसार पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम ‘वत्सश्री’ रखा गया। वह वेद-वेदाङ्गका पूर्ण जानकार था। भगवान् विष्णुके प्रसादस्वरूप उस प्रतापी पुत्रको पाकर राजा तपस्या करनेके विचारसे निकल पड़े। वे हिमालय पर्वतपर इन्द्रियोंको वशमें करके तथा निराहार रहकर भगवान् विष्णुकी आराधना करते हुए इस प्रकार स्तुति करने लगे।
राजाने कहा—क्षर एवं अक्षर—अखिल जगत् जिनका रूप है, जो क्षीरसागरमें शयन करते हैं, देहधारियोंके लिये परम पद, इन्द्रियोंके अविषय, विश्वकी रक्षा करनेवालोंमें सर्वश्रेष्ठ तथा जलमय आकृति बनाये हुए हैं, उन भक्तोंकी याचना पूर्ण करनेवाले प्रभुकी मैं स्तुति करता हूँ। देवताओं एवं दानवोंके निरन्तर प्रार्थना करनेपर सृष्टि करनेके विचारसे आपने इस जगत्की रचना की है। भगवन्! आप सदा एक कूटस्थ रूपसे आसीन रहकर इच्छामात्रसे संसारकी सृष्टि करते हैं। प्रभो!