वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५५
देवताओं, मुनियों एवं मानवों—प्रायः सभीके लिये यह रहस्यकी बात है—भगवान् नारायण ही सर्वोपरि देवता हैं। उन्हें प्रणाम करनेपर प्राणी क्लेश नहीं पाता। राजन्! सुना जाता है—महात्मा नारदजीने पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके इस व्रतको अप्सराओंको बतलाया था।
अप्सराओंने पूछा—नारदजी! आप ब्रह्माजीके पुत्र हैं। हमें उत्तम पति पानेकी अभिलाषा है। भगवान् नारायण हमारे प्राणपति हो सकें, इसके लिये आप हमलोगोंको कोई व्रत बतानेकी कृपा करें।
नारदजी कहते हैं—प्रायः सबके लिये कल्याणदायक नियम है कि प्रश्न करनेके पहले विनयपूर्वक प्रणाम करे। पर तुमलोगोंने इस नियमका पालन नहीं किया; क्योंकि तुम्हें युवावस्थाका गर्व है। फिर भी तुमलोग देवाधिदेव भगवान् विष्णुके नामका कीर्तन करो। उनसे वर माँगो—‘प्रभो! आप हमारे स्वामी होनेकी कृपा करें।’ इससे तुम्हारा सम्पूर्ण मनोरथ सिद्ध होगा—इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिये। एक व्रत भी बताता हूँ, जिसे करनेसे भगवान् श्रीहरि स्वयं वर देनेके लिये उद्यत हो जाते हैं। चैत्र और वैशाखमासके शुक्लपक्षमें जो द्वादशी तिथि है, उस दिन यह व्रत करना चाहिये। रातमें विधिवत् भगवान् श्रीहरिकी पूजा करे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि भगवान्की प्रतिमाके ऊपर लाल फूलोंसे एक मण्डल बनवाये। नृत्य, गीत एवं वाद्यके साथ रातमें जागरण करे।
‘ॐ भवाय नमः’, ‘ॐ अनङ्गाय नमः’, ‘ॐ कामाय नमः’, ‘ॐ सुशास्त्राय नमः’, ‘ॐ मन्मथाय नमः’, तथा ‘ॐ हरये नमः’ कहकर क्रमशः भगवान्के सिर, कटि, भुजा, उदर एवं चरण आदिकी पूजा करे। फिर भगवान्को प्रणामकर रात्रि-जागरणकी विधि सम्पन्न करके प्रातःकाल भगवान्की वह प्रतिमा वेद-वेदाङ्गके जानकार ब्राह्मणको दान कर दे।
अप्सराओ! इस प्रकार व्रत करनेपर इच्छानुकूल भगवान् विष्णु अवश्य पतिरूपमें तुम्हें प्राप्त होंगे। इसके पश्चात् ईखके पवित्र रस तथा मल्लिका आदिके फूलोंसे उन देवेश्वरकी पूजा करना। सुन्दरियो! तुमने मुझे प्रणाम किये बिना जो प्रश्न किया है, उससे अष्टावक्रद्वारा तुम्हारे उपहासपर शाप भी मिलेगा। फलस्वरूप गोपलोग तुम्हें हर लेंगे।
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! इस प्रकार कहकर देवर्षि नारदजी उसी क्षण वहाँसे चले गये। उन अप्सराओंने व्रतकी विधि सम्पन्न की। फलस्वरूप स्वयं भगवान् श्रीहरि उनपर संतुष्ट होकर उनके पति हुए।
[अध्याय ५४]
शुभ-व्रत
[ कुब्जाम्रेश्वर-ऋषीकेश-माहात्म्य ]
अगस्त्यजी कहते हैं—राजन्! अब मैं व्रतोंमें उत्तम शुभसंज्ञक व्रतका वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो। महाभाग! इसके प्रभावसे भगवान् विष्णुका दर्शन सुलभ हो जाता है, इसमें कोई संदेह नहीं। मार्गशीर्षमासके प्रथम दिन इस व्रतको आरम्भ करना चाहिये। इसमें दशमीको एक समय भोजन करनेका नियम है। उस दिन स्नान करके दोपहरमें भगवान् विष्णुकी पूजा करे। एकादशीके दिन उपवासकर ब्राह्मणोंको विधिके साथ यव देना चाहिये। उस समय दान, होम एवं अर्चन—इन सभी क्रियाओंमें सदा भगवान् श्रीहरिके नामोंका कीर्तन करना चाहिये। राजेन्द्र! अगहन,