वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय ५६
आप कच्छप एवं नृसिंह आदि अनेक अवतार धारण कर चुके हैं। पर आपके अवतार लेनेकी यह बात भी मायिक ही है, तथ्य नहीं।^१ नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध, कल्कि, वरेश, शम्भु एवं विबुधारिनाशन आदि नामोंसे सम्बोधित होनेवाले भगवन्! आपको मेरा निरन्तर प्रणाम है। विष्णो ! आप स्वयं आदि यज्ञपुरुष हैं। यज्ञकी सामग्री हवि आदि आपका ही रूप है। पशु, ऋत्विक् और घृत—ये सब आप ही हैं। कमलनेत्र! मैं आपकी शरणमें आया हूँ, इस संसारसागरसे मेरा उद्धार कीजिये।
स्तुतिके अन्तमें परम प्रभु प्रसन्न हुए। वे एक कुबड़े ब्राह्मणका वेष धारणकर वहाँ आये। उनके वहाँ पधारते ही आमका वृक्ष भी वैसा ही कुबड़ा बन गया। उन राजाको बड़ा आश्चर्य हुआ कि ऐसे विशाल वृक्षका यह छोटा रूप कैसे हो गया—फिर सोचा कि परम प्रभुकी संनिधिका यह परिणाम है। फिर उन्होंने ब्राह्मण-वेषधारी प्रभुको प्रणाम किया। साथ ही कहा—'भगवन्! आप परम पुरुष परमात्मा हैं। अवश्य ही मुझपर कृपा करनेके लिये आपका यहाँ पधारना हुआ है। हरे! अब आप अपने वास्तविक स्वरूपका दर्शन करानेकी कृपा कीजिये।'
जब राजाने इस प्रकार भगवान् श्रीहरिसे प्रार्थना की, तो वे शङ्ख, चक्र एवं गदा हाथमें लिये हुए सौम्य रूप धारणकर उनके सामने विराजमान हो गये और यह वचन कहा—'राजेन्द्र! तुम्हारे मनमें जो भी इच्छा हो, वह मुझसे माँग लो।' भगवान् श्रीहरिके यों कहनेपर राजाकी आँखें प्रसन्नतासे खिल उठीं। साथ ही कहा—'देवेश! आप मुझे मोक्ष देनेकी कृपा करें।' राजाकी ऐसी बात सुनकर पुनः श्रीभगवान् बोले—'राजन्! मेरे यहाँ आनेपर इस विशाल आम्रके वृक्षमें जो कुब्जत्व आ गया है, इसके परिणामस्वरूप यह स्थान कुब्जाम्रक (ऋषिकेशका नामान्तर) तीर्थके नामसे प्रसिद्ध होगा। इस उत्तम तीर्थमें ब्राह्मण अथवा पशु-पक्षी आदि योनिवाले भी यदि अपने शरीरका त्याग करेंगे तो उनको ले जानेके लिये पाँच सौ दिव्य विमान उपस्थित होंगे और वहाँके उन योगियोंकी मुक्ति हो जायगी।'
महाराज! इस प्रकार कहकर भगवान् जनार्दनने शङ्खके अग्रभागसे राजाका स्पर्श किया। केवल स्पर्श होते ही उन नरेशको परम निर्वाण पद प्राप्त हो गया। अतएव तुम भी उन परम प्रभुकी शरण ग्रहण करो, जिससे शोक करनेके योग्य पद तुम्हें पुनः प्राप्त न हो सके। जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर यह चरित्र पढ़ेगा, उसे भगवान् श्रीहरि धर्म एवं मोक्ष प्रदान करेंगे। राजन्! जो इस परम पवित्र शुभ-व्रतको करेगा, उसे इस संसारमें सम्पूर्ण सुख-सम्पत्ति और भोग सुलभ होंगे एवं आयु समाप्त होनेपर वह भगवान्में लीन हो जायगा।
[ अध्याय ५५]
धन्यव्रत
अगस्त्यजी कहते हैं— राजन्! इसके बाद अब उत्तम धन्यव्रत बताता हूँ, जिसके प्रभावसे निर्धन व्यक्ति भी यथाशीघ्र धन्यवादका पात्र हो सकता है। यह नक्तव्रत^२ है। अगहनमासके शुक्लपक्षकी प्रतिपदा तिथिको यह व्रत करना चाहिये। इस व्रतमें अग्निस্বরূপ भगवान् विष्णुकी पूजाका विधान है। 'ॐ वैश्वानराय नमः', 'ॐ अग्नये नमः', 'ॐ हविर्भुजाय नमः',
१. द्रष्टव्य—'अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया॥' (गीता ४।६)
२. जिस व्रतमें दिनभर व्रत करके रातमें चार घड़ीके बाद भोजन किया जाता है, उसे 'नक्तव्रत' कहते हैं।