भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२०संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७७

अब साम्बका परित्याग करना ही उचित है। भगवन्! संसारमें आपकी तुलना करनेवाला दूसरा कौन पुरुष है? आप ही इसे कर सकते हैं।'

वसुंधरे! नारदके इस कथनपर श्रीकृष्णने साम्बको रूपहीन होनेका शाप दे दिया, जिससे साम्बके शरीरमें कुष्ठ-रोग हो गया और उनके शरीरसे दुर्गन्धयुक्त रक्त गिरने लगा। अब उनका शरीर ऐसा दिखायी पड़ने लगा, मानो कोई छिन्न-भिन्न अङ्गवाला पशु हो। फिर नारदजीने ही साम्बको शापसे छूटनेके लिये सूर्यकी आराधनाका उपदेश दिया और साथ ही कहा—'जाम्बवतीनन्दन! तुम्हें वेद और उपनिषदोंमें कहे हुए मन्त्रोंका उच्चारण करके विधिके अनुसार सूर्य-नमस्कार करना चाहिये। इससे वे संतुष्ट हो जायेंगे।' फिर सूर्यसे तुम्हारा समुचित संवाद होगा, जिस प्रसङ्गको लेकर 'भविष्यपुराण' निर्मित होगा। उसे मैं ब्रह्माजीके लोकमें जाकर उनके सामने सदा पाठ करूँगा। फिर सुमन्तुमुनि मर्त्यलोकमें मनुके सामने उसका कथन करेंगे। इस प्रकार उसका सभी लोकोंमें प्रचार-प्रसार होगा।'

साम्बने कहा—'प्रभो! मेरी स्थिति तो ऐसी है, मानो मांसका एक पिण्ड हो। फिर उदयाचलपर मैं जा ही कैसे सकता हूँ। यह आपकी ही कृपा है कि मुझे यह दुःख भोगना पड़ रहा है, नहीं तो तत्त्वतः मैं बिल्कुल दोषरहित था।'

नारदजी बोले—'साम्ब! उदयाचलपर जाकर सूर्यकी आराधना करनेसे जैसा फल मिलता है, वैसा ही फल मथुराके 'षट्सूर्य-तीर्थ'पर सुलभ हो जाता है। यहाँ भगवान् सूर्यकी प्रतिमाओंका प्रातः, मध्याह्न एवं सायंकालमें जो पूजा करता है, वह तुरंत ही साम्राज्य-जैसा फल प्राप्त कर सकता है। प्रातः, मध्याह्न और सायं—इन तीनों पवित्र समयोंमें सूर्यमन्त्रका जप तथा उच्चस्वरसे उनके स्तोत्रपाठसे सारे पाप धुलकर कुष्ठ आदि रोगोंसे भी मुक्ति मिल जाती है।'

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! मुनिवर नारदके ऐसा कहनेपर महाबाहु साम्बने श्रीकृष्णसे आज्ञा प्राप्त करके भुक्तिमुक्ति फल देनेवाली मथुरामें आकर देवर्षि नारदकी बतायी विधिके अनुसार प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें उन षट्सूर्योंकी पूजा एवं दिव्य स्तोत्रद्वारा उपासना आरम्भ कर दी। भगवान् सूर्यने भी योगबलकी सहायतासे एक सुन्दर रूप धारण कर साम्बके सामने आकर कहा—'साम्ब! तुम्हारा कल्याण हो! तुम मुझसे कोई वर माँग लो। मेरे कल्याणकारी व्रत एवं उपासनापद्धतिके प्रचारके लिये भी इसे करना परम आवश्यक है। मुनिवर नारदने तुम्हें जो स्तोत्र बताया है और जिसे तुमने मेरे सामने व्यक्त किया है, उस तुम्हारी 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुतिमें वैदिक अक्षरों एवं पदोंसे सम्बद्ध पचास श्लोक हैं। वीर! नारदजीद्वारा निर्दिष्ट इन श्लोकोंद्वारा तुमने जो मेरी स्तुति की है, इससे मैं तुमपर पूर्ण संतुष्ट हो गया हूँ।'

वसुधे! यह कहकर भगवान् सूर्यने साम्बके सम्पूर्ण शरीरका स्पर्श किया। उनके छूते ही साम्बके सारे अङ्ग सहसा रोगमुक्त होकर चमक उठे। फिर तो वे ऐसे विद्योतित होने लगे, मानो दूसरे सूर्य ही हों। उसी समय याज्ञवल्क्यमुनि माध्यन्दिन-यज्ञ करना चाहते थे। भगवान् सूर्य साम्बको लेकर उनके यज्ञमें पधारे और वहाँ साम्बको 'माध्यन्दिन-संहिता'का अध्ययन कराया। तबसे साम्बका भी एक नाम 'माध्यन्दिन' पड़ गया। 'वैकुण्ठक्षेत्र'के पश्चिमभागमें यह यज्ञ सम्पन्न हुआ था। अतएव इस स्थानको 'माध्यन्दिनीय' तीर्थ कहते हैं। वहाँ स्नान एवं दर्शन करनेके प्रभावसे मानव समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता