वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७८-१७९ ] शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य [ ३२१
है। साम्बके प्रश्न करनेपर सूर्यने जो प्रवचन किया, वही प्रसङ्ग 'भविष्यपुराण'के नामसे प्रख्यात पुराण बन गया। यहाँ साम्बने 'कृष्णगङ्गा'के दक्षिण तटपर मध्याह्नके सूर्यकी प्रतिमाकी प्रतिष्ठा की। जो मनुष्य प्रातः, मध्याह्न और अस्त होते समय इन सूर्यदेवका यहाँ दर्शन करता है, वह परम पवित्र होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।
इसके अतिरिक्त सूर्यकी एक दूसरी उत्तम प्रातःकालीन विख्यात प्रतिमा भगवान् 'कालप्रिय' नामसे प्रतिष्ठित हुई। तदनन्तर पश्चिमभागमें 'मूलस्थान'में अस्ताचलके पास 'मूलस्थान'नामक प्रतिमाकी प्रतिष्ठा हुई। इस प्रकार साम्बने सूर्यकी तीन प्रतिमाएँ स्थापित कर उनकी प्रातः, मध्याह्न एवं संध्या—तीनों कालोंमें उपासनाकी भी व्यवस्था की*। देवि! साम्बने 'भविष्यपुराण'में निर्दिष्ट विधिके अनुसार भी अपने नामसे प्रसिद्ध एक मूर्तिकी यहाँ स्थापना करायी। मथुराका वह श्रेष्ठ स्थान 'साम्बपुर'के नामसे प्रसिद्ध है। सूर्यकी आज्ञाके अनुसार वहाँ रथ-यात्राका प्रबन्ध हुआ। माघ मासकी सप्तमी तिथिके दिन जो सम्पूर्ण राग-द्वेषादि द्वन्द्वोंसे मुक्त मानव उस दिव्य स्थानमें रथ-यात्राकी व्यवस्था करते हैं, वे सूर्यमण्डलका भेदन कर परमपद प्राप्त करते हैं। देवि! साम्बके शापका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें बतलाया। इसके श्रवणसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।
[ अध्याय १७७]
शत्रुघ्नका चरित्र, सेवापराध एवं मथुरामाहात्म्य
भगवान् वराह कहते हैं—देवि! प्राचीन समयकी बात है—मथुरामें लवण नामक एक राक्षस था। ब्राह्मणोंकी रक्षाके लिये महात्मा शत्रुघ्नने उसका वध किया था। उस स्थानकी बड़ी महिमा है। मार्गशीर्षकी द्वादशी तिथिके अवसरपर वहाँ संयमपूर्वक पवित्र रहकर स्नान करना और शत्रुघ्नके चरित्रका वर्णन करना चाहिये। लवणासुरके वध करनेसे शत्रुघ्नको अपने शरीरमें पापकी आशङ्का हो गयी थी। उसे दूर करनेके लिये उन्होंने सुस्वादु अन्नोंसे ब्राह्मणोंको तृप्त किया था। इस समाचारसे भगवान् श्रीरामको अत्यन्त आनन्द मिला था। अतः अपनी सेनाके साथ अयोध्यासे यहाँ आकर उन्होंने इसके उपलक्ष्यमें महान् उत्सव किया। अगहन मासके शुक्ल पक्षकी दशमी तिथिके दिन भगवान् राम मथुरा पहुँचे थे और वहाँ एकादशी तिथिके पुण्य-अवसरपर उपवास करके 'विश्रान्ति-तीर्थ'में सपरिवार स्नान कर महान् उत्सव मनाया। फिर ब्राह्मणोंको तृप्त करके स्वयं भोजन किया। उस दिन जो वहाँ उत्सव मनाता है, वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पितरोंके साथ दीर्घ कालतक अर्थात् प्रलयपर्यन्त स्वर्गलोकमें निवास करता है।
* 'वराहपुराण'का यह साम्बोपाख्यान या 'सूर्योपासनाध्याय' बड़े महत्त्वका है। इसमें सूर्यभगवान्के अत्यन्त दिव्य स्तोत्र 'साम्बपञ्चाशिका'-स्तुति तथा कोणार्क, उज्जयिनी एवं मुल्तानके प्राचीन भव्य सूर्य-मन्दिरोंका भी संकेत है, जिनकी प्रतिनिधिभूत अर्चाएँ मथुरामें प्रतिष्ठित थीं। इस विषयमें अल्बरूनीके 'Indica' p. 298 का—'Multān was originally called Kāśyapapura, then Hamsapur, then Bagpur, then Sambapur and then Mulsthān' यह कथन बड़े महत्त्वका है, जिसमें मुल्तान नगरके पूर्वनाम 'काश्यपपुर' या सूर्यपुर, फिर साम्बपुर तथा मूलस्थान आदि निर्दिष्ट हैं। इसीके खण्ड १ पृष्ठ ११६-७ पर अल्बरूनीने इसके मन्दिर तथा प्रतिमाध्वंसकी कथाका—'Jalam Iben shaiban, the userper, broke the idol into pieces and killed its priests.' आदि शब्दोंमें विस्तृत वर्णन किया है।