भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३२२ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १७८-१७१

भगवान् वराह कहते हैं— वसुंधरे! मन, वाणी अथवा कर्म किसी प्रकारसे भी पाप-कर्ममें रुचि रखना अपराध है। दन्तधावन न करने, राजान्न खाने, शवस्पर्श करने, सूतकवाले व्यक्तिका जल ग्रहण करने एवं उसका स्पर्श तथा मल, मूत्र, आदि क्रियाओंसे भी अपराध बन जाते हैं। अवाच्यवाणी बोलना, अभक्ष्य-भक्षण करना, पिण्याक (हींग)-को भोजनमें सम्मिलित करना, दूसरेके मलिन वस्त्र, नीले रंगवाला वस्त्र धारण करना, गुरुसे असत्य भाषण, पतित व्यक्तिका अन्न खाना तथा भोजन न देनेका भय उत्पन्न करना—ये सब सेवापराध हैं। उत्तम अन्न स्वयं खा लेना, बत्तक आदिका मांस खाना और देव-मन्दिरमें जूता पहनकर जाना भी अपराध है। देवताकी आराधनामें जिस फूलको शास्त्रमें निषिद्ध माना गया है, उसे काममें लेना, निर्माल्यको विग्रह (मूर्ति)-परसे हटाये बिना ही अस्त-व्यस्त होकर अँधेरेमें भगवान्‌की पूजा करना भी अपराध है। मदिरा पीना, अन्धकारमें इष्टदेवताको जगाना, भगवान्‌की पूजा एवं प्रणाम न करके सांसारिक काममें प्रवृत्त हो जाना—ये सभी अपराध हैं। वसुधे! इस प्रकारके तैंतीस अपराधोंको मैंने स्पष्ट कर दिया। इन अपराधोंसे युक्त पुरुष परम प्रभु श्रीहरिका दर्शन नहीं पा सकता। यदि वह दूर रहकर भी पूजा एवं नमस्कार करे तो उसका वह कर्म राक्षसी माना जाता है।

क्रमशः इनकी शुद्धिका प्रकार यह है—मैले वस्त्रसे दूषित व्यक्ति एक रात, दो रात अथवा तीन रातोंतक वस्त्र पहने ही स्नान करे और पञ्चगव्य पिये तो उसकी शुद्धि हो जाती है। नीला वस्त्र पहननेके पापसे बचनेके लिये मानव गोमयद्वारा अपने शरीरको भलीभाँति मले और 'प्राजापत्य' व्रत करे तो वह पवित्र हो जाता है। गुरुके प्रति बने हुए पापसे मुक्तिके लिये दो 'चान्द्रायण' व्रत करनेका विधान है। लोग पतितका अन्न खा लेनेपर 'चान्द्रायण'* और 'पराक' व्रत† करनेसे शुद्ध होते हैं। जूता पहनकर मन्दिरमें जानेवाला मानव 'कृच्छ्रपाद' व्रत और दो दिन उपवास करे। फूल तथा नैवेद्यके अभावमें भी पञ्चामृतसे भगवान्‌का स्नान एवं स्पर्श करके नमस्कार करनेकी विधि है। मदिरा-पानके पापसे शुद्ध होनेके लिये ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यको चाहिये कि चार 'चान्द्रायण' व्रत तथा बारह वर्षोंतक तीन 'प्राजापत्य' व्रत करे।

अथवा 'सौकरवक्षेत्र'में जाकर उपवास एवं गङ्गामें स्नान करे। उसके प्रभावसे प्राणी शुद्ध हो सकता है। ऐसे ही मथुरामें भी स्नान-उपवास करनेसे शुद्धि सम्भव है। जो मनुष्य इन दोनों तीर्थोंका उक्त प्रकारसे एक बार भी सेवन करता है, वह अनेक जन्मोंके किये हुए पापोंसे मुक्त हो जाता है। इन तीर्थोंमें स्नान, जलपान तथा भगवान्‌के ध्यान-धारणा, कीर्तन, मनन-श्रवण एवं दर्शन करनेसे भी पातक पलायन कर जाते हैं।

**पृथ्वीने पूछा—**सुरेश्वर! मथुरा और सूकर—ये दोनों ही तीर्थ आपको अधिक प्रिय हैं। पर यदि इनसे भी बढ़कर कोई अन्य तीर्थ हो तो अब उसे बतानेकी कृपा कीजिये।

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुधे! छोटी-


* चान्द्रायण-व्रतके अनेक भेद हैं, जैसे 'पिपीलिका', 'यवमध्य', 'शिशुचान्द्रायण' आदि। शुक्लपक्षकी प्रतिपदासे ग्रासवृद्धिपूर्वक अमावास्याको सर्वथा उपवास रहना 'यवमध्य' सर्वोत्तम चान्द्रायण है।
† १२ दिनोंका सर्वथा उपवास 'पराकव्रत' है। यतात्मनोऽप्रमत्तस्य द्वादशाहमभोजनम्। पराको नाम कृच्छ्रोऽयं सर्वपापापनोदनः॥ (मनु० ११। २१५)