भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 330

अध्याय १७७ ] साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत ३१९

करना ही चाहता था कि सहसा आकाशवाणी हुई—'ऐसा दुःसाहस मत करो; क्योंकि तुम दोनोंके पाप सर्वथा धुल गये हैं। जहाँ स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने सुखपूर्वक लीला की है तथा जो स्थान उनके चरणके चिह्नसे चिह्नित है, वह तो ब्रह्मलोकसे भी श्रेष्ठ है। दूसरी जगहके किये हुए पाप इस तीर्थमें आते ही नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य 'गङ्गा-सागर'में एक बार स्नान करनेसे ब्रह्महत्या-जैसे पापसे छूट जाता है। पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, उन सभी तीर्थोंमें स्नान करनेसे जो फल मिलता है, वैसा ही फल 'पञ्चतीर्थ'में स्नान करनेसे मिल जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। शुक्ल और कृष्णपक्षकी एकादशियोंको विश्रान्ति-तीर्थमें, द्वादशीको 'सौकरव' तीर्थमें, त्रयोदशीको नैमिषारण्यमें, चतुर्दशीको प्रयागमें तथा कार्तिकी एकादशीको पुष्करमें स्नान करना चाहिये। इससे सारे पाप दूर हो जाते हैं।'

भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे! इस प्रकारकी आकाशवाणीको सुनकर पाञ्चालने सुमन्तुसे पूछा—'मुने! आप मुझे यह बतानेकी कृपा करें कि मैं आगमें प्रवेश करूँ या 'त्रिरात्र', 'कृच्छ्र' या 'चान्द्रायण' व्रत करूँ?'

मुनिने आकाशवाणीकी बातोंपर विश्वासकर उसे शुद्ध धर्माचरणका आदेश दिया। देवि! जो मनुष्य श्रद्धासे इस माहात्म्यका श्रवण एवं पठन करेगा, वह कभी भी पापसे लिप्त नहीं हो सकता, साथ ही उसके सात जन्म पहलेके भी किये हुए पाप दूर भाग जाते हैं और वह जरा-मरणसे मुक्त होकर स्वर्गलोकको चला जाता है।

[ अध्याय १७५-१७६ ]

साम्बको शाप लगना और उनका सूर्याराधन-व्रत

भगवान् वराह कहते हैं—शुभाङ्गि! अब मैं श्रीकृष्णकी कथाका वह अद्भुत प्रसङ्ग कहता हूँ, जो द्वारकापुरीमें घटित हुआ था। साथ ही साम्बके शापकी बात भी सुनो। एक बार जब भगवान् सानन्द द्वारकामें विराजमान थे तो नारदमुनि वहाँ पधारे। श्रीभगवान्ने उन्हें आसन, अर्घ्य, पाद्य मधुपर्क एवं गौ समर्पण किये। तदनन्तर मुनिने उन्हें यह सूचना दी—कि 'मैं आपसे एकान्तमें कुछ कहना चाहता हूँ और एकान्तमें उन्होंने कहा—'प्रभो! आपका नवयुवक पुत्र साम्ब बड़ा वाग्मी, रूपवान्, परम सुन्दर तथा देवताओंमें भी आदर पानेवाला है। देवेश्वर! आपकी देवतुल्य हजारों स्त्रियाँ भी उसको देखकर क्षुब्ध हो जाती हैं। आप साम्बको और उन देवियोंको यहाँ बुलाकर परीक्षा करें कि वस्तुतः क्षोभ है या नहीं।'

इसके पश्चात् सभी स्त्रियाँ तथा साम्ब श्रीकृष्णके सामने आये और हाथ जोड़कर बैठ गये। क्षणभरके बाद साम्बने पूछा—'प्रभो! आपकी क्या आज्ञा है?' वस्तुतः साम्बकी सुन्दरताको देखकर श्रीकृष्णके सामने ही उन स्त्रियोंके मनमें क्षोभ उत्पन्न हो गया था।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—'देवियो! अब तुम सभी उठो और अपने स्थानको जाओ।' श्रीकृष्णकी आज्ञा पाकर वे देवियाँ अपने-अपने स्थानको चली गयीं। पर साम्ब वहीं बैठे रहे। उनके शरीरमें कँपकँपी बँध रही थी। श्रीकृष्णने कहा—'नारदजी! स्त्रियोंका स्वभाव बड़ा ही विलक्षण है।'

नारदजीने कहा—'प्रभो! इनकी इस प्रवृत्तिसे सत्यलोकमें भी आपकी निन्दा हो रही है, अतः