वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १७५-१७६ ] ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति ३१७
और शिवनदीके दक्षिणतटवर्ती एक नगरमें ब्राह्मणी-वृत्तिसे रहने लगा। वहाँ उसके पाँच पुत्र और एक तिलोत्तमा नामकी कन्या उत्पन्न हुई। कन्याका विवाह उसने किसी ब्राह्मणके साथ कर दिया। फिर वह ब्राह्मण सपत्नीक कालधर्मको प्राप्त हो गया। उस समय वह 'तिलोत्तमा' कन्या ही माता-पिताकी हड्डियाँ लेकर तीर्थयात्रियोंके साथ मथुरा आयी; क्योंकि उसने पुराणोंमें सुना था कि जिसकी हड्डी मथुराके 'अर्द्धचन्द्र'तीर्थमें गिरती है, वह सदा स्वर्गमें निवास करता है।' यह पुत्री उस ब्राह्मणकी सबसे छोटी संतान थी, जो विवाहके कुछ ही काल बाद विधवा हो गयी थी।
उन्हीं दिनों 'कान्यकुब्ज'के राजाने मथुराके गर्तैश्वर महादेवके लिये एक 'अन्न-सत्र' खोल रखा था, जहाँ निरन्तर भोजन-वितरण होता रहता था। उस नरेशके यहाँ नृत्य-गान भी होता था। यहाँ गणिकाओंके दुश्चक्रमें पड़कर वह कन्या भी उसी कर्ममें लग गयी और थोड़े ही दिनोंके बाद वह भी उस राजाकी परिजन बन गयी।
भगवान् वराह कहते हैं—वसुंधरे ! उस 'वसु' ब्राह्मणके कनिष्ठ पुत्रका नाम पाञ्चाल था, जो बड़ा रूपवान् था। वह कुछ व्यापारियोंके साथ अनेक देशों, राज्यों, पर्वतों और नदियोंको पारकर यात्रा करते हुए मथुरा पहुँचा तथा वहीं रहने लगा। एक दिन प्रातःकाल कुछ पुरुषोंके साथ स्नान करनेके लिये वहाँके उत्तम 'कालञ्जर' तीर्थमें गया और स्नानकर श्रेष्ठ वस्त्र एवं अलङ्कारोंसे अलङ्कृत होकर धनके गर्वमें एक यानपर बैठकर देवताका दर्शन करनेके लिये 'त्रिगर्तेश्वर' महादेवके स्थानपर पहुँचा। वहाँ उसकी दृष्टि 'तिलोत्तमा' पर पड़ी, जिसे देखकर वह सर्वथा मुग्ध हो गया। फिर उसने उस कन्याकी धाईके द्वारा उसे कपड़ोंकी गाँठ, सैकड़ों सुवर्णके आभूषण तथा रत्नोंके हार भेंट किये। अब वह आसक्तिके कारण प्रायः उसीके घर रहता और जब आधा पहर दिन चढ़ जाता तब अपनी छावनीपर जाता तथा समीपके 'कृष्णगङ्गोद्भव' तीर्थमें स्नान करता, इस प्रकार छः महीने बीत गये। एक बार जब वह सुमन्तुमुनिके आश्रमके पास स्नान कर रहा था तो मुनिकी दृष्टि उसपर पड़ गयी। उसके शरीरमें कीड़े पड़ गये थे, जो रोम-कूपोंसे निकलकर जलमें गिर रहे थे। पर स्नान कर लेनेके बाद वह सर्वथा नीरोग हो गया। जब मुनिने इस प्रकारका दृश्य देखा तो उससे पूछा—'सौम्य ! तुम कौन हो, तुम्हारे पिता कौन हैं? कहाँके रहनेवाले हो, तुम्हारी कौन-सी जाति है तथा तुम दिन-रात किस काममें व्यस्त रहते हो? यह सब तुम मुझे बताओ।'
पाञ्चालने कहा—'मैं एक ब्राह्मणका बालक हूँ और मेरा नाम 'पाञ्चाल' है। इस समय मैं व्यापार-कार्यसे दक्षिण भारतसे यहाँ आया हूँ और प्रातःकाल यहाँ स्नानकर 'त्रिगर्तेश्वर 'महादेवका दर्शन करता हूँ। फिर कालञ्जर-क्षेत्रमें आकर आपके चरणोंका दर्शन करता हूँ। तत्पश्चात् छावनीमें लौट जाता हूँ।'
मुनिने कहा—'ब्राह्मण ! तुम्हारे शरीरमें मैं प्रतिदिन एक महान् आश्चर्यकी बात देखता हूँ। तुम्हारा शरीर स्नानके पहले कृमिपूर्ण और स्नान कर लेनेपर स्वच्छ एवं प्रकाशमय बन जाता है। तुम किसी पाप-प्रपञ्चमें पड़े हो, जो इस तीर्थमें स्नान करनेके प्रभावसे दूर हो जाता है। अब तुम सोच-विचारकर उसका पता लगाकर मुझे बताओ।'
इसपर पाञ्चालने उस कन्याके घर जाकर उससे एकान्तमें आदरपूर्वक पूछा—'सुभगे ! तुम किसकी पुत्री हो और तुम्हारा कौन-सा देश है?