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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३१६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १७५-१७६

चुका। प्रभो! आपको नमस्कार है।' जो विज्ञ मनुष्य श्रद्धासे सम्पन्न होकर जिस-किसी भी भाद्रपद मासमें भगवान् वामनकी इस प्रकार आराधना करेगा, उसे सफलता अवश्य प्राप्त होगी।''

ब्राह्मणने पुनः कहा—“जहाँ यमुना और सरस्वती नदीका सङ्गम हुआ है, उस 'सारस्वत' तीर्थपर जो इस विधिके साथ श्रद्धापूर्वक यह व्रत करता है, उसे सौ गुना फल प्राप्त होता है। मैंने भी श्रद्धाके साथ उस तीर्थका सेवन किया है और क्षेत्रसंन्यासीके रूपमें वहाँ बहुत दिनोंतक निवास किया है, जिससे तुमलोग मुझे अभिभूत नहीं कर पाये। इस तीर्थकी महिमा तथा इस व्रतका माहात्म्य सुननेसे तुमलोगोंका भी कल्याण होगा।''

**भगवान् वराह कहते हैं—**वसुंधरे! वह ब्राह्मण इस प्रकार कह ही रहा था कि आकाशमें दुन्दुभियाँ बज उठीं और पुष्प-वृष्टि होने लगी, साथ ही उन प्रेतोंको लेनेके लिये चारों ओर विमान आकर खड़े हो गये। देवदूतने प्रेतोंसे कहा—'इस ब्राह्मणके साथ वार्तालाप करने, पुण्यमय चरित्र सुनने तथा तीर्थकी महिमाका श्रवण करनेसे अब तुमलोग प्रेतयोनिसे मुक्त हो गये। अतः प्रयत्नपूर्वक संत-पुरुषके साथ सम्भाषण करना चाहिये।'

इस प्रकार देवतीर्थमें अभिषेक करने तथा सरस्वती-सङ्गमके पुण्यसम्पर्कमात्रसे उन दुरात्मा प्रेतोंको अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो गया और उस तीर्थकी महिमाके श्रवणमात्रसे वे मुक्तिके भागी हो गये। तबसे यह स्थान 'पिशाचतीर्थ'के नामसे विख्यात हुआ। उन पाँचों प्रेतोंको मुक्ति देनेवाला यह प्रसङ्ग सम्पूर्ण धर्मोंका तिलक है। जो परम भक्तिके साथ तत्परतापूर्वक इस चरित्रको पढ़ता अथवा सुनता है तथा इसपर श्रद्धा करता है, वह भी प्रेत नहीं होता।

[ अध्याय १७४]


ब्राह्मण-कुमारीकी मुक्ति

**भगवान् वराह कहते हैं—**देवि! अब कृष्ण (मानसी)-गङ्गासे* सम्बन्धित एक दूसरा प्रसङ्ग सुनो। एक समय श्रीकृष्णद्वैपायनमुनिने मथुरामें एक दिव्य आश्रम बनाकर बारह वर्षोंतक यमुनाकी धारामें नियमपूर्वक अवगाहनका नियम बनाया। अतः वहाँ चातुर्मास्यके लिये अनेक वेद-तत्त्वज्ञ एवं उत्तम व्रतोंके पालन करनेवाले मुनियोंका आना-जाना बना रहता। वे उनसे श्रौत, स्मार्त-पुराणादिकी अनेक शङ्काएँ पूछते और मुनि उनकी शङ्काका निराकरण करते। वहीं 'कालञ्जर' नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है, जिसके प्रधान देवता शिव हैं। उनका दर्शन करनेसे ही 'कृष्णगङ्गा' में स्नान करनेका फल प्राप्त होता है।

इसी बीच ध्यानयोगमें सदा संलग्न रहनेवाले मुनिवर व्यास एक बार हिमालय पर्वतपर गये और बदरिकाश्रममें वे कुछ समयके लिये ठहर गये। उन त्रिकालदर्शी सिद्ध मुनिने अपने ज्ञाननेत्रसे 'कृष्णगङ्गा'के तटका एक बड़ा आश्चर्यजनक दिव्य दृश्य देखा, जो इस प्रकार है। नदीके उस तटपर 'पाञ्चाल'कुलका 'वसु' नामक एक ब्राह्मण रहता था। दुर्भिक्षसे पीड़ित होनेके कारण वह अपनी स्त्रीको साथ लेकर दक्षिणा-पथको गया


* 'सोमतीर्थ' और 'वैकुण्ठतीर्थ' के बीच 'कृष्ण-गङ्गा' स्थान है।