वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१९
महान् यशस्वी राजकुमार भी स्नान कर मङ्गलद्रव्योंसहित राजद्वारपर उपस्थित हुआ। द्वारपालने राजाके पास पहुँचकर इसकी सूचना दी और कहा—‘महाराज! आपके दर्शनकी लालसासे राजकुमार दरवाजेपर उपस्थित हैं।’ उसकी बात सुनकर कोसलनरेश बोले—‘कञ्चुकिन्! मेरे साधुवादी पुत्रको यहाँ शीघ्र लाओ।’
नरेशके ऐसा कहनेपर उनकी आज्ञाके अनुसार द्वारपालने राजकुमारका वहाँ प्रवेश करा दिया। विनीत एवं शुद्धहृदय राजकुमारने पिताके महलमें जाकर उनके चरणोंमें सिर झुकाकर प्रणाम किया। पिताने भी आनन्दपूर्वक राजकुमारको ‘जयजीव’ कहकर दीर्घजीवी होनेका आशीर्वाद दिया और उन्होंने हँसकर अपने पुत्र राजकुमारसे कहा—‘शुभोदय! मैंने पहले तुमसे जो पूछा था, वह बात बताओ।’ तब राजकुमारने अपने पितासे कहा—‘महाराज! इसके बतलानेसे किसी अच्छे फलकी सम्भावना नहीं है, राजेन्द्र! यदि आप इसे सुननेके लिये उत्सुक ही हैं तो मेरे साथ ‘कुब्जाम्रक’ तीर्थमें चलनेकी कृपा करें। मैं इसे वहाँ चलकर आपको बतला दूँगा।’
सुनयने! उस समय राजाने पुत्रकी बात सुनकर उससे प्रेमपूर्वक कहा—‘बेटा! बहुत ठीक।’ फिर जब राजकुमार वहाँसे चला गया तो राजाने अपने उपस्थित मन्त्रिमण्डलसे मीठे स्वरमें कहा—‘मन्त्रियो! आपलोग मेरी निश्चित की हुई एक बात सुनें, इस समय हम ‘कुब्जाम्रक’ तीर्थमें जाना चाहते हैं, इसकी आपलोग शीघ्र व्यवस्था कर दें। शीघ्राति-शीघ्र हाथी, घोड़े, रथ आदि जुतवाये जायें।’ उस समय राजाकी बात सुननेके पश्चात् मन्त्रियोंने उत्तर दिया—‘महाराज! आप इन सबोंको तैयार ही समझें।’
इसके बाद बड़े पुत्रकी अनुमतिसे राजाने अपने छोटे पुत्रको राज्यपर अभिषिक्त कर दिया और राजधानीसे चलकर सम्पूर्ण द्रव्यों तथा अन्तःपुरकी स्त्रियोंके साथ वे लोग बहुत दिनोंके बाद ‘कुब्जाम्रक’ नामक तीर्थमें पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने उस तीर्थके नियमोंका पालन करते हुए अन्न-वस्त्र, सुवर्ण-गौ, हाथी-घोड़े और पृथ्वी आदि बहुत-से दान किये। इस प्रकार बहुत दिन व्यतीत हो जानेपर एक दिन राजाने राजकुमारसे पूछा—‘वत्स! अब वह गोपनीय बात बताओ। तुमने कुल, शील और गुणोंसे सम्पन्न मेरी इस निर्दोष सुन्दरी पुत्रवधूका क्यों परित्याग कर दिया है?’ इसपर राजकुमारने कहा—‘इस समय आप शयन करें, प्रातःकाल यह सब बातें मैं आपको बतला दूँगा।’
रात बीत जानेके बाद प्रातःकाल सूर्योदय होनेपर राजकुमारने गङ्गामें स्नानकर रेशमी वस्त्र धारण करके विधिपूर्वक मेरी पूजा की। तत्पश्चात् उस गुरुवत्सल राजकुमारने पिताकी प्रदक्षिणा कर यह वचन कहा—‘पिताजी! आइये, हमलोग वहाँ चलें, जहाँकी आप गोपनीय बातें पूछ रहे हैं। इसके बाद राजा, राजकुमार और कमलके समान नेत्रोंवाली वह राजकुमारी—सभी उस निर्माल्यकूटके पास पहुँचे, जहाँ वह पुरानी घटना घटी थी। राजपुत्र उस स्थानपर पहुँचकर अपने पिताके दोनों चरणोंको पकड़कर कहने लगा—‘महाराज! पूर्वजन्ममें मैं एक नेवला था और यहींसे थोड़ी ही दूरपर एक केलेके वृक्षके नीचे मेरा निवास था। एक दिन कालके चंगुलमें फँसकर मैं इस ‘निर्माल्य-कूट’ पर चला आया, जहाँ सुगन्धित द्रव्यों और विविध पुष्पोंको खाती