वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २१८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १२६ |
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परस्पर अकृत्रिम और अपूर्व स्नेह था, वह सहसा कहाँ चला गया? तुम लोग परस्पर अब सर्वथा विरुद्ध कैसे हो गये? पुत्र! यह राजकुमारी कार्यकुशल, सुन्दर स्वभाववाली एवं धर्मनिष्ठ है। आजसे पहले इसने हमारे परिवारमें भी कभी किसीको अप्रिय वचन नहीं कहा है, अतः तुम्हें इसका परित्याग कदापि नहीं करना चाहिये। तुम राजा हो, तुम्हारा राजधर्म ही मुख्य धर्म है और उसका पालन स्त्रीके सहारे ही हो सकता है। अहो! लोगोंका यह कथन परम सत्य ही है कि 'स्त्रियोंके द्वारा ही पुत्र एवं कुलका संरक्षण होता है।'
पृथ्वि! उस समय राजपुत्रने पिताकी बात आदरपूर्वक सुन ली और उनके दोनों चरणोंको पकड़कर वह कहने लगा—''पिताजी, आपकी पुत्रवधूमें कहीं कोई भी दोष नहीं है, किंतु इसने बार-बार रोकनेपर भी मेरे देखते-ही-देखते एक नेवलेको मार डाला। उसे सामने मरा पड़ा देखकर मुझे क्रोध आ गया और मैंने कह दिया कि 'अब न तो तुम मेरी पत्नी हो और न मैं तुम्हारा पति।' महाराज! बस इतना ही कारण है, और कुछ नहीं।'' पृथ्वि! इस प्रकार अपने पतिकी बात सुनकर प्राग्ज्योतिषपुरकी उस कन्याने भी अपने श्वशुरको सिर झुकाकर प्रणाम किया और कहने लगी—'इन्होंने एक सर्पिणीको जिसका कोई भी अपराध न था तथा जो अत्यन्त भयभीत थी, मेरे सैकड़ों बार मना करनेपर भी उसे मार डाला। सर्पिणीकी मृत्यु देखकर मेरे मनमें बड़ा क्षोभ और दुःख हुआ, पर मैंने इनसे कुछ भी नहीं कहा। बस यही इतनी-सी ही बात है।'
वसुंधरे! उन कोसलदेशके राजाने अपने पुत्र और पुत्रवधूकी बात सुनकर सभाके बीचमें ही उन दोनोंसे बड़ी मधुर वाणीमें कहना आरम्भ किया। वे बोले—'पुत्रि! इस राजकुमारने तो सर्पिणीको मारा और तुमने नेवलेको, फिर इस बातको लेकर तुमलोग आपसमें क्यों क्रोध कर रहे हो? यह तो बतलाओ। पुत्र! नेवलेके मर जानेपर तुम्हें क्रोध करनेका क्या कारण है? अथवा राजकुमारी! यदि सर्पिणी मर गयी तो इसमें तुम्हारे क्रोधका क्या कारण है?'
उस समय कोसलनरेशको आनन्द देनेवाले उस यशस्वी राजकुमारने पिताकी बात सुनकर मधुर स्वरमें कहा—'महाराज! इस प्रश्नसे आपका क्या प्रयोजन है? आप इसे न पूछें। आपको जो कुछ पूछना हो, वह इस राजकुमारीसे ही पूछिये।' पुत्रकी बात सुनकर कोसलनरेशने कहा—'पुत्र! बताओ। तुम दोनोंके बीच स्नेहविच्छेदका क्या कारण है? पुत्रोंमें जो योग्य होनेपर भी अपने पिताके पूछनेपर गोपनीय बात छिपा लेते हैं, वे अधम ही हैं, उन्हें तप्त-बालुकामय घोर रौरव नरकमें गिरना पड़ता है। किंतु जो शुभ अथवा अशुभ सभी बातोंको पिताके पूछनेपर बता देते हैं—ऐसे पुत्रोंको वह दिव्य गति मिलती है, जिसे सत्यवादी लोग पाते हैं। अतएव पुत्र! तुम्हें मुझसे वह बात अवश्य बतलानी चाहिये, जिसके कारण गुणशालिनी पत्नीके प्रति तुम्हारी प्रीति समाप्त हो गयी है।'
पिताकी यह बात सुनकर कोसलवासियोंके आनन्दको बढ़ानेवाले उस राजकुमारने जनसमाजमें स्नेह-सनी वाणीसे कहा—'पिताजी! यह सारा समाज यथायोग्य अपने-अपने स्थानपर पधारे, कल प्रातःकाल जो आवश्यक बात होगी, मैं आपसे निवेदन करूँगा।' रात्रिके समाप्त होनेपर प्रातःकाल दुन्दुभियोंके शब्दोंसे तथा सूत, मागध एवं वन्दीजनोंकी वन्दनाओंसे कोसलनरेश जगाये गये। इतनेमें ही कमलके समान आँखोंवाला वह